गुरुवार, 10 नवंबर 2011

पंचम दासःपोलियो के रामबाण इलाज की मान्यता के लिए भटकता एक धन्वंतरि पुत्र

क्षीर सागर मंथन में आयुर्वेद के जन्मदाता देव धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। जंगलों और पहाड़ों की कंदराओं की जड़ी बूटियों में "अमृत" ढूंढ़ने का सिलसिला बदस्तूर जारी है लेकिन धन्वंतरि के इन "बेटों" को आज पहचान पाने के लिए एड़ी-चोटी का पसीना एक करना पड़ता है। २४ अक्टूबर को हम एक बार फिर धन्वंतरि को याद करने की रस्म अदा कर लेंगे लेकिन पोलियो ठीक करने की रामबाण दवा खोजने वाले बिहार के ४७ वर्षीय पंचम कुमार दास जैसे धन्वंतरि पुत्र को पहचान कब मिलेगी, आयुर्वेद को बढ़ावा देने के सरकार के बड़े-बड़े दावों के बीच यह सवाल आज भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है। 

वे पिछले २२ साल से अपनी उस बेहद प्रभावी दवा के फार्मूले को सहेजते हुए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च सहित सरकारी शोध संस्थानों के चक्कर लगा रहे हैं लेकिन पूरे देश में घूम-घूम कर पोलियों के कई मरीजों को ठीक कर चुके पंचम दास अब भी गुमनामी के अंधरे में भटक रहे हैं। चिकित्सा शोध की देश की सर्वोच्च सरकारी संस्था आईसीएमआर की टीम ने दवा के प्रभाव को परखने के बाद वैद्य पंचम के दावे को सही भी पाया। लेकिन वह रिपोर्ट संस्थान की फाइलों में वर्षों से धूल फांक रहा है। इन संस्थानों में जाने पर उन्हें बार-बार यह तल्ख अहसास भी हुआ है कि सबकी रुचि उनके फॉर्मूले को हड़पने में ज्यादा है। समुद्र मंथन में अमृत के निकलने पर दानवों ने भी उसे देवों से छीनना चाहा था। इन संस्थानों में अपने अनुभव के बाद पंचम दास अपने फार्मूले को पेटेंट कराने का आवेदन करने का साहस भी नहीं जुटा पा रहे। कोई मल्टीनेशनल फार्मास्यूटिकल कंपनी कोई दवा या टीका लेकर आ जाए तो आईसीएमआर जैसे संस्थानों को बिना जरूरी शोध के भी उसे हरी झंडी देने की हड़बड़ी रहती है लेकिन पंचम दास की पोलियो की प्रभावी दवा को लेकर उनमें कोई तत्परता नहीं दिखती। 

नवरात्र के दौरान अभी अपने दस्तावेजों की पोटली लिए पंचम दास दिल्ली आए थे लेकिन वे अब उन संस्थानों में नहीं जाते। वे थक चुके हैं। दिल्ली में पोलियोग्रस्त ४ मरीजों को दवा देने आए पंचम दास ने नईदुनिया ऑफिस आकर अपनी व्यथा सुनाई। करीब ६ महीने पहले मुंबई के एक पोलियोग्रस्त आयुर्वेदिक डॉक्टर को अपनी दवा दे आए हैं। वह आयुर्वेदिक डॉक्टर अपने ऊपर दवा के प्रभाव को देख कर चमत्कृत हैं। वे बिहार में पोलियोग्रस्त दर्जनों लड़कियों का इलाज कर चुके हैं और उनका दावा है कि उनमें कई ऐसी होंगी जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दी हुई साइकिल तक चला रही होंगी। पंचम जड़ी बूटियों से कैंसर सहित अन्य रोगों की दवा की खोज भी करना चाहते हैं लेकिन पोलियो की दवा के अपने अनुभव के बाद उनके "अमृत" ढूंढ़ने के उत्साह ने जबाव दे दिया है। बिहार के फॉरबिसगंज के हरीपुर डाक गांव के वैद्य पंचम दास की दवा को १९९६ में ही आईसीएमआर की एक टीम परख चुकी है। टीम ने उनके दिए जांच सर्टिफिकेट में यह कहा है कि १० -१५ साल से पोलियोग्रस्त बच्चों पर भी यह दवा प्रभावी पाई गई। 

पत्रकार एम.जे. अकबर से लेकर पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. सी.पी. ठाकुर तक उनकी दवा को वैज्ञानिक मान्यता देने की पैरवी कर चुके हैं। बिहार के आरा में एसपी रह चुके राजेंद्र प्रसाद का बेटा अखिलेश इस दवा के प्रभाव का जीता-जागता प्रमाण है। १९९५ की शुरुआत में जब वे पोलियोग्रस्त अपने बेटे को पंचम दास के पास ले गए थे तो दास ने कहा था कि ६ महीने में दवा का प्रभाव सामने आएगा लेकिन २ महीने में ही जब वह ठीक होने लगा। उस समय से वह अपने पांव पर चल रहा है। लेकिन अंग्रेजी दवा पद्धति का समर्थन करने वाली सत्ता व्यवस्था ने पंचमदास को जो "विकलांग" बनाया है, वे चलने की अभी तक असफल कोशिश कर रहे हैं(धनंजय,नई दुनिया,दिल्ली,24.10.11)। 


 कल सुबह सात बजेः 


 क्या आपने कभी सोचा है दुखते हिप को रिप्लेस करने के बारे में?

9 टिप्‍पणियां:

  1. पंचम दास २२ साल से अपनी उस बेहद प्रभावी दवा के फार्मूले को सहेजते हुए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च सहित सरकारी शोध संस्थानों के चक्कर लगा रहे हैं लेकिन पूरे देश में घूम-घूम कर पोलियों के कई मरीजों को ठीक कर चुके पंचम दास अब भी गुमनामी के अंधरे में भटक रहे हैं।

    इसी रवैय्ये के चलते प्रतिभाएं विदेश चली जाती हैं।
    सरकार कोई भी हो लेकिन रवैया सबका एक ही रहता है।
    यह दुखद है।

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  2. दुखद स्थिति है। क्या वजह है कि इतने महत्वपूर्ण लोगों और संस्थानों की स्वीकृति मिलने के बावजूद भी पंचम दास जी उपेक्षित हैं? क्या आयुर्वेद से संबद्ध होना इस देश में इतना गलत है?

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  3. दुखद स्थिति है ... ये देश का दुर्भाग्य ही है की प्राचीन मान्य पद्धति आज लुप्त होती जा रही है क्योंकि अपने देश में ही उसे मान्यता नहीं मिलती ...

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  4. बड़ी दुखद घटना है !

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  5. काफी दुखद और शर्मनाक स्थिति है ....

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  6. कैसी विडंबना है इस देश की .... और अलुपेथी में और करोड़ों अरबों रूपये खपा रहा है और अपनी देसी पद्धति को नकार रहा है.

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  7. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 11-11-2011 को शुक्रवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  8. दुखद ...इसी लिए ऐसे प्रतिभाशाली लोग पलायन कर जाते हैं विदेश में ..

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  9. Kaha hai Pancham das ji?unka pata deejiye hame.koshish karna apna kaam hai aagey ishwar jane.
    sader,dr.bhoopendra singh
    govt.t.r.s.college,rewa mp

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