रविवार, 18 दिसंबर 2011

प्रयोगशालाओं की जांच में नहीं होता कोलेस्ट्रॉल का सही आकलन

दिल्ली की जांच प्रयोगशालाओं (पैथ लैब) की रिपोर्ट अपडेट नहीं होती। राजधानी के हृदय रोग विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे अधिक उल्लंघन बैड व गुड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा दर्शाने में सामने आता है। जांच रिपोर्ट के एक ओर गुड व बैड कोलेस्ट्रॉल की जो न्यूनतम/अधिकतम मात्रा आज दर्शाई जा रही है, वह वर्षों पुरानी है।

फोर्टिस एस्कॉर्ट के वरिष्ठ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विनय सांघी के अनुसार, जांच प्रयोगशालाओं को लेकर भारत में कोई स्पष्ट मानक नहीं है। कोलेस्स्ट्रॉल को लेकर तो कोई मानक ही तय नहीं है। पूरी दुनिया में अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन और अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी द्वारा तय मानक ही चलते हैं। इन दोनों संस्थाओं द्वारा वर्षों पूर्व तय किए गए मानक ही राजधानी दिल्ली सहित पूरे देश के प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट में दर्शाया जाता है। 

कोई मरीज जब डॉक्टर के कहने पर जांच कराने जाता है तो उसकी रिपोर्ट में एक ओर न्यूनतम व अधिकतम की सीमा दर्शाई गई होती है, जिसके आधार पर मरीज खुद को स्वस्थ्य मान लेता है जबकि आज की जीवनशैली व परिस्थितियों में बेहद बदलाव आ चुका है। 

डॉक्टर द्वारा इलाज की सलाह पर मरीज खुद को जांच रिपोर्ट के आधार पर सामान्य बताते हैं, लेकिन वास्तव में बीमारी की शुरुआत उनमें हो चुकी होती है। यदि ऐसे मरीज सही समय पर इलाज ले लें तो हृदय की धमनियों में रुकावट, हृदयाघात और लकवा जैसी स्थितियों से बच सकते हैं, लेकिन गलत रिपोर्ट के कारण वह सही समय पर इलाज नहीं ले पाते। 

अमेरिका में विशेषज्ञ की हैसियत से काम कर चुके डॉ. विनय सांघी के अनुसार, वर्तमान में प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट में लो डेंसिटी कोलेस्ट्रॉल की मात्रा १०० से १५० एमजी परसेंट तक दर्शाई गई होती है जबकि यह ७० से कम होना चाहिए। 

इसी तरह टोटल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा रिपोर्ट में २५० से ३०० एमजी परसेंट दर्शाई गई होती है जबकि यह १८० से नीचे होनी चाहिए। डॉ. सांघी के अनुसार, लो डेंसिटी कोलेस्ट्रॉल यदि अधिक होगा तो धमनियों में ब्लॉकेज, हार्टअटैक और लकवा का अटैक आ सकता है। 

वहीं हाई डेंसिटी कोलेस्ट्रॉल एक सफाईकर्मी की तरह है तो धमनियों की सफाई करता है। इसकी मात्रा ५० एमजी परसेंट से अधिक होनी चाहिए, लेकिन लैब की रिपोर्ट पर ४०-४५ दर्ज होता है। प्रयोगशाला प्रबंधकों को चाहिए कि वह इस रिपोर्ट को या तो अपडेट करते रहें या फिर कुछ लिखे ही नहीं। इससे मरीजों में दुविधा की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी। 

इस बारे में दिल्ली के बड़े प्रयोगशालाओं में शुमार एक के प्रबंधक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जब सरकार का इस बारे में कोई दिशानिर्देश ही नहीं है तो जो चल रहा है वह चल रहा है। यह हमारी जिम्मेवारी नहीं है(नई दुनिया,दिल्ली,13.12.11)।

6 टिप्‍पणियां:

  1. डाक्टर कोई गलत साबित हुआ है आजतक. या फिर कोई लैब. भारत में.

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  2. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 19-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  3. एमजी परसेंट की बात समझ नहीं आयी।

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  4. आश्चर्य हो रहा है पढ़कर !

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  5. सचेत करती उपयोगी पोस्ट....
    सादर आभार...

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