मंगलवार, 28 जून 2011

कैसे रूके लिंग-परिवर्तन?

पुरुषप्रधान भारतीय समाज में स्त्री जाति कहीं भी सुरक्षित नहीं है। अब तक हमने सुना था कि गर्भ में पहचान होने के बाद कन्या-भू्रण को वहीं मार दिया जाता था, जिसके बाद सरकार ने गर्भ में लिंग की पहचान करने वाले एम्नीयोसिंटेसिस जैसे परीक्षणों पर रोक लगा दी थी। अब दिल्ली के एक अंग्रेजी दैनिक ने रहस्योद्घाटन किया है कि किस प्रकार इंदौर (मध्य प्रदेश) में पांच वर्ष तक की बालिकाओं का लिंग परिवर्तन कराकर उन्हें बालकों में रूपांतरित किया जा रहा है। इसके लिए जो ऑपरेशन होता है उसमें करीब डेढ़ लाख रुपए तक का खर्च आता है। जाहिर है, यह ऑपरेशन एक अधूरे शरीर या व्यक्तित्व को एक सामान्य शरीर या व्यक्तित्व देने के लक्ष्य से किया जाता है। मगर इंदौर के कुछ अस्पतालों और क्लिनिकों में लालची डॉक्टर इसका दुरुपयोग करके बेटी पर बेटे को ज्यादा तरजीह देने वाले बीमार मानसिकता के लोगों की मनोकामना पूरी करने के लिए उनकी एक से पांच वर्ष तक की आयु की सामान्य कन्याओं का लिंग परिवर्तन करके उन्हें बालकों के रूप में रूपांतरित कर रहे हैं। अब तक सैकड़ों सामान्य बालिकाओं को बालक बनाया जा चुका है। ये बालक आगे चलकर संतान तो पैदा नहीं कर सकेंगे मगर वे नामर्द भी नहीं होंगे। अब तक थाईलैंड आदि देशों में पुत्र प्राप्ति के इच्छुक माता-पिता इलाज के लिए जाया करते थे ताकि वैज्ञानिक पद्धति से वहीं क्लीनिक में गर्भाधान कराकर शर्तिया लड़का पाया जा सके। मगर अब तो इंदौर में बालिकाओं को ही बालकों में बदलवाने की सुविधा बन गई है और दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के अभिभावक इंदौर की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। अब तक सिर्फ एक मामला ऐसा मिला है जिसमें एक बालक को कन्या बनवाया गया। ताज्जुब होता है कि हमारे देश में यह हो क्या रहा है और हमारा समाज जाहिल और लालची क्यों बनता जा रहा है? प्राकृतिक प्रक्रिया से लड़की के रूप में जगत में आई इन कन्याओं ने ऐसा क्या पाप किया है कि उन्हें बोझ मानकर उनके पूछे बिना ही उन्हें बालकों में तब्दील किया जारहा है? कल बड़ा होने पर जब वे अपने मां-बाप से उनके साथ हुए इस अत्याचार का जवाब मांगेंगी तो वे क्या कहेंगे? क्या ये मां-बाप अपने को उन अभागी कन्याओं की जगह रखकर देख सकते हैं जिनका लिंग बदला गया? पुत्र की चाह ने कुछ लोगों को शायद अंधा बना दिया है। वैसे ही कन्या-भ्रूण हत्याओं और लिंग-भेदभाव के कारण हरियाणा और पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्यों में पुरुष-स्त्री अनुपात बुरी तरह गड़बड़ा गया है। हरियाणा के कुछ समाजों में देश के दूसरे भागों से लड़कियां खरीदकर लाई जा रही हैं ताकि वधुओं की कमी पूरी की जा सके। जरा ऐसे समाज की कल्पना कीजिए जिसमें स्त्रियां न रहें और सर्वत्र नर मुंड ही मुंड दिखाई दें। एक मां, दादी-नानी, बुआ, ताई या चाची, बहन और बेटी, पत्नी या मित्र के बिना क्या यह दुनिया रहने लायक होगी? नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) ने अखबार की रिपोर्ट का संज्ञान लेकर इस पूरे कांड की जांच करने का राज्य सरकार को निर्देश दिया है। मगर लगता नहीं कि जांच से पूरा सच सामने आ पाएगा और दोषी डॉक्टरों और माता-पिताओं को दंडित किया जा सकेगा। आखिर लिंग-परीक्षण पर कानूनी रोक के बाद गर्भ में ही बालिकाओं को मार देने की घटनाएं बंद तो नहीं हुई हैं। स्त्री जाति के साथ हो रहे इस अमानुषिक अत्याचार से हर विवेकवान मनुष्य के मन में सिर्फ अपराधबोध ही पैदा नहीं होना चाहिए बल्कि मानसिकता में सुधार भी आना चाहिए। तभी बात बनेगी(संपादकीय,नई दुनिया,28.6.11)।

7 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा कि मानसिकता में सुधार आना चाहिए।

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  2. ऐसी सोच विकृत मानसिकता का ही परिचायक है...और हमारे समाज के गिरते स्तर का....पता नहीं कितना और गिरना है हमें....

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  3. ये माँ बाप तो कम से कम अपनी बच्चियों को जन्म लेने के बाद मार तो नहीं रहे है अभी टीवी पर रिपोर्ट देखी जिसमे बताया गया की राजेस्थान में पहले बच्चियों को गर्भ में ही मार दिया जाता था किन्तु सरकार ने जब बच्चियो के जन्म के बाद पैसे देने का प्रावधान किया तब लोगो ने बच्चियों की गर्भ में मारना बंद कर दिया अब वो लोग बच्ची को जन्म लेने के बाद पैसे लेते है और उसके बाद उन्हें मार देते है | अब ये सब कृत्य सारी सीमाओ को लाघते जा रहा है |

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  4. बेहद शर्मनाक अपराध है यह तो !

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