बुधवार, 22 जून 2011

आयुर्वेदःविश्वास में है करिअर

21वीं सदी में भी आयुर्वेद ने अपना अस्तित्व नहीं खोया है। इसके उलट इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी एलोपैथी पूर्ण रूप से नहीं पहुंच पायी है, ऐसे क्षेत्रों में आयुर्वेद ने अपना विजयी परचम फहराया है। आयुर्वेद प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है। हालांकि एलोपैथी में तेजी से वृद्धि हो रही है। इसके बावजूद आयुर्वेद की लोकप्रियता में कोई खास फर्क नहीं पड़ा। हालांकि आयुर्वेद को अब भी बतौर करिअर चुनने से लोग हिचकिचाते हैं। ऐसा कतई नहीं है कि इसमें पर्याप्त आमदनी नहीं होती या फिर इसमें तरक्की के अवसर कम हैं। लेकिन साथ जुड़ी कुछ भ्रांतियां लोगों को इससे दूर रखती हैं। इसमें से मुख्य भ्रांति है संस्कृत का पूरा ज्ञान होना। छात्र यह सुनकर ही घबरा जाते हैं और किसी और क्षेत्र में करिअर खोजन की ठान लेते हैं। जबकि यह सिर्फ एक मिथ है जिसका सच्चाई से कोई सरोकार नहीं।
बहरहाल चिकित्सा के लिहाज से आयुर्वेद की तुलना नहीं की जा सकती। एलोपैथी के प्रशंसकों ने हमेशा आयुर्वेद में किसी न किसी तरह से नुक्स निकालने की कोशिश की है। लेकिन सरकारी मान्यता मिलने के बाद उन सबकी बोलती बंद हो चुकी है। यहां एलोपैथी प्रशंसकों से यह पूछा जा सकता है कि क्या छोटे से छोटे रोग में भी दवाई का सेवन बगैर रिस्क होता है? नहीं, ऐसा कतई नहीं होता। इसके विपरीत आयुर्वेद छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी बीमारी को बगैर साइड इफेक्ट के निजात दिलाने में सहायक होता है। देश-विदेश में आयुर्वेद के तेजी से बढ़ रहे संस्थान इस ओर इशारा करते हैं कि इसकी तरफ रुझान दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है।
आयुर्वेद में करिअर बनाने से पहले हमारे सामने मुख्य सवाल खड़ा होता है कि आखिर आयुर्वेद पद्धति है क्या? इस चिकित्सा पद्धति में किसी प्रकार का यंत्र या फिर तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसमें आहार, व्यायाम, जड़ी-बूटी व अन्य तकनीकों के जरिये रोगी का उपचार किया जाता है। हालांकि आयुर्वेद एलोपैथी की तरह तुरंत असर नहीं दिखाता। बावजूद इसके ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इस पर पूरा विश्वास करते हैं। असल में यह किसी भी रोग से सिर्फ निजात नहीं दिलाता बल्कि उसे जड़ से खत्म कर देता है। यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है। आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है कि जीवन, ऊर्जा, जल, वायु, अग्नि को मिलकर बना है। यदि किसी मानव में इनका असंतुलन होता है तो वह रोग की चपेट में आ जाता है। आयुर्वेद इस असंतुलन को व्यवस्थित करता है। रोगियों के आहार में बदलाव किये जाते हैं।
अन्य चिकित्सा पद्धति की तरह आयुर्वेद में भी विशेषज्ञता पायी जा सकती है। इसके लिए अलग-अलग विधाएं उपलब्ध है। इन विधाओं में काया चिकित्सा (इंटरनल मेडिसिन), बाल चिकित्सा (पेड्रियाट्रिक्स), ग्रह विद्या (साइकिएट्री), ऊध्र्वांग चिकित्सा (ऑटो राइनोलैरिंगलॉजी), शल्य चिकित्सा (सर्जरी), दमस्त्र चिकित्सा (टॉक्सीकोलॉजी), जरा चिकित्सा (गेरेंटोरोलॉजी), वृश्य चिकित्सा (ऐफ्रडिजिऐक) आदि शामिल हैं। हालांकि ये सभी शाखाएं अब तक सभी कालेजों तक नहीं पहुंच पायी हैं। लेकिन यह तय है कि तेजी बढ़ती इनकी मांग के चलते जल्द ही इनका विस्तार हो जाएगा। सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन में विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों और उपक्षेत्रों को मान्यता दी गई है।
आयुर्वेद के कोर्स के लिए बाकायदा छात्र को प्रवेश परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना पड़ता है जिसके बाद उन्हें आयुर्वेद में करिअर बनाने के अवसर प्राप्त होते हैं। इसके लिए न्यूनतम योग्यता 10+2 जीव विज्ञान के साथ अन्य विज्ञान विषयों में उत्तीर्ण होना जरूरी है। बैचलर ऑफ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी या आयुर्वेदाचार्य के कोर्स में प्रवेश चयन परीक्षा के आधार पर दिया जाता है। हालांकि कुछ संस्थान 10+2 के अंकों के आधार पर भी दाखिला दे देते हैं। यह कोर्स 5 वर्ष का होता है जिसमें डेढ़ वर्ष की इंटर्नशिप भी शामिल है। यही नहीं इसमें कुछ ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्सेज भी उपलब्ध हैं। आयुर्वेद में करिअर बनाने के दौरान यह ध्यान रखें कि किसी फर्जी संस्थान से कोर्स न करें। क्योंकि यह मान्यता प्राप्त नहीं होते और आपको आयुर्वेद चिकित्सक के रूप में मान्यता हासिल नहीं हो सकती।
चिकित्सा विज्ञान को बतौर करिअर चुनने से पहले यह जानें कि क्या आप इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त हैं? इस क्षेत्र में करिअर बनाने से पहले यह जान लें कि क्या आप इस क्षेत्र में खुद को फिट कर पाते हैं? दरअसल यह प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति हैं जहां आपको प्राचीन काल की जानकारी होना अनिवार्य है। यह प्राचीन परम्पराओं व आस्था से जुड़ी हुई है। यदि आप इसकी अच्छाइयों व बुराइयों से अवगत नहीं हैं तो आपके लिए इस क्षेत्र में करिअर बनाना सही नहीं होगा। साथ ही आपका सहनशील होना भी अनिवार्य है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि अब आयुर्वेद को प्राथमिकता दी जाने लगी है। हालांकि अभी भी सरकार को इस क्षेत्र के विकास के लिए कड़ी मेहनत करने की जरूरत है। कई क्षेत्रों में अब तक इसका विकास नहीं हो पाया है। लेकिन हम इस बात को नकार नहीं सकते कि विदेशों में भी इसके प्रति रुचि बढ़ती जा रही है। तमाम एलोपैथी अस्पतालों में आयुर्वेदिक इलाज भी किये जा रहे हैं। विदेशों में भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सकों की मांग में बढ़ोतरी हो रही है। इसलिए हम कह सकते हैं कि इसमें रोजगार की संभावना बढ़ती जा रही है। इस क्षेत्र को करिअर के रूप में अपनाने वाले आयुर्वेदिक चिकित्सक बनने के अलावा आयुर्वेदिक औषधिक निर्माता कंपनियों के आर एंड डी विभागों में विभिन्न रोगों के लिए प्रभावी औषधि तैयार कर सकते हैं, शोध वैज्ञानिक तथा आयुर्वेदिक कालेजों में अध्यापन जैसे विकल्पों को चुन सकते हैं। चूंकि अब आयुर्वेद के क्षेत्र में विकास हो रहा है। सो, आयुर्वेदिक दवाइयों के बाजार का विस्तार भी तेजी से होता नजर आ रहा है। डिग्री के आधार पर आयुर्वेदिक औषधियों के विक्रय का लाइसेंस प्राप्त किया जा सकता है। यहां यह बताना जरूरी है कि कुछ राज्यों में सिविल अस्पतालों में, सरकारी अस्पतालों में कम से कम एक आयुर्वेदिक चिकित्सक नियुक्त करना अनिवार्य है। अंतत: विशेषज्ञ बनने के बाद आप अपना क्लिनिक खोल उसमें खुद प्रैक्टिस कर सकते हैं(जी एस नंदिनी,दैनिक ट्रिब्यून,22.6.11)।

7 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन जानकारी .अलबत्ता कुछ हिंदी पर्याय खटके जैसे "साइकिएत्रि "के लिए "ग्रह-चिकित्सा ".पूछा जा सकता है मनोरोग -चिकित्सा या मनोरोग -वेद क्यों नहीं .टोक्सिकोलोजी ,विषविज्ञान चिकित्सा क्यों नहीं?एफ्रो -दिज़ियेक कामोद्दीपन या कामोद्दीपक चिकित्सा क्यों नहीं ? गौर करें इन हिंदी पर्यायों पर .शुक्रिया अच्छी जानकारी के लिए

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  2. हमें हमारी पद्धतियों पर भरोसा रखना चाहिए।
    हमारे भाई साहब ने मुज़फ़्फ़रपुर से बी.डी.एम.एस. के डिग्री ली, पर अंग्रेज़ी दवाइयां प्रेस्क्राइब करते हैं।

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  3. इस विषय में रुचि रखने और इसे केरियर के रुप में अपनाने की सोच रखने वाले युवाओं के लिये अत्यन्त उपयोगी जानकारी ।
    स्वास्थ्य-सुख में पूछे गये लहसुन से सम्बन्धित प्रश्न का उत्तर मैं देरी से दे पाया हूँ । कृपया आप समय निकालकर उसे वहीं देख सकते हैं । धन्यवाद सहित...

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  4. एक और क्षमा...
    श्री राधारमणजी सा.
    उत्तर देरी से दे पाने के लिये क्षमा चाहता हूँ आपके प्रश्न के संदर्भ में लहसुन से वैसे तो गर्मियों के मौसम में लोगों को प्रायः परहेज करते ही देखा है किन्तु यदि किसी को इससे गर्मी या चक्कर जैसी शिकायत न लगे तो इसे हमेशा लेते रहा जा सकता है । इसके दो उपाय और भी हैं 1. भोजन के समय घी में भुनी हुई गुली आराम से ली जा सकती है और 2. किसी भी रुप में यदि गुली लेना भारी लगे तो गार्लिक पर्ल्स मेडिकेटेड टेबलेट भी ली जा सकती है । धन्यवाद सहित...

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