शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

बचिए अंधाधुंध एंटीबायोटिक से

डब्ल्यूएचओ द्वारा मनाये जाने वाले वि स्वास्थ्य दिवस (सात अप्रैल) की इस बार की थीम 'एंटी माइक्रोबीयल रेसिस्टेंस' के खतरे से लोगों को आगाह कराना है। इसके प्रति सरकार, चिकित्सक, दवा निर्माताओं, दवा विक्रेताओं और मरीजों को जागरूक करने के कार्यक्रम में चलाये जा रहे हैं। हमारे देश में भी फर्जी चिकित्सकों और मरीजों में जानकारी के अभाव से इन दवाओं का अनावश्यक प्रयोग बढ़ गया है, जिसका भविष्य में दुष्प्रभाव यह पड़ेगा कि बीमार होने पर कोई दवा असर नहीं करेगी। मरीज लम्बे समय तक बीमार रहें गे औ र रोगों के प्रसार पर शीघ्र नियंतण्रनहीं पाया जा सकेगा। उत्तर प्रदेश के मरीजों में एंटीबायोटिक दवाओं के असर को लेकर किये गये एक अध्ययन के नतीजे भी भविष्य के इस खतरे की ओर संकेत कर रहे हैं।

हो सकता है आपको वायरल फीवर हो और डाक्टर एंटीबायोटिक की हैवी डोज दे, फिर भी आपको आराम न मिले। यानी आप भी प्रदेश के सौ में से उन अस्सी लोगों में शामिल हैं, जिनके शरीर पर एंटीबायोटिक का असर नहीं पड़ता। इसकी वजह ज्यादा व गलत तरीके से एंटीबायोटिक का सेवन करना है। संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में उत्तर प्रदेश के मरीजों पर किये गये अध्ययन की रिपोर्ट इस खतरनाक सच का खुलासा करती है। माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर डाक्टर टी एन ढोल बताते हैं कि प्रदेश के लोगों में अपनी मर्जी से एंटी माइक्रोबीयल ड्रग (एंटीबायोटिक, एंटी फंगल,पैरासाइटिक और एंटी वायरल) लेने की प्रवृत्ति इतनी बढ़ गयी है कि उन पर दवाओं का वांछित असर नहीं होता है। जैसे एंटीबायोटिक मेडिसिन सिप्रोफ्लॉक्ससिन का ड्रग रेसिस्टेंस अस्सी फीसद पाया गया। इसका मतलब यह हुआ कि सौ लोगों को सिप्रोफ्लॉक्ससिन की डोज देने पर मात्र 20 लोगों पर ही इसका असर होता पाया गया। बाकी 80 लोगों ने गैर जानकारी में जरूरत न होने पर भी इस दवा का सेवन कर अपने शरीर में इस दवा के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न कर ली थी। अध्ययन में एंटीबायोटिक जेन्टामाइसिन का असर सौ में मात्र 60 लोगों में पाया गया। एक समय आम प्रयोग की सामान्य दवा बन चुकी एम्पीसिलिन व पेन्सिलिन के प्रति सौ फीसद रेसिसटेंस पाया गया यानी ये दवाएं प्रदेश के लोगों पर पूरी तरह बेअसर हो गयी हैं। चिकित्सकों द्वारा खूब इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक ईएसबीएल भी अब मात्र बीस फीसद लोगों पर असर करती है। यह अध्ययन बताता है कि किस तरह लोग अपनी आधी- अधूरी जानकारी से भविष्य के लिए ऐसा संकट खड़ा कर रहे हैं, जिसको दूर करने का कोई उपाय नहीं है। अगर एंटीबायोटिक दवा के प्रति शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बन जाएगी तो जरूरत पड़ने पर छोटी सी बीमारी भी जानलेवा बन सकती है। दवा विक्रेता अमित केसरवानी बताते हैं कि पेट गड़बड़ होने पर लोग नारफ्लाक्स टीजेड खरीदने आते हैं। अगर चोट लगने से घाव हो गया या एक-दो दिन फीवर रहता है तो बिना चिकित्सक की सलाह लिए खुद ही एंटीबायोटिक दवा खरीद लेते हैं। वह बताते हैं कि सिप्रोफ्लॉक्ससिन, नारफ्लाक्स टीजेड, ओफ्लाक्सासिन, राक्सिथ्रोमाइसिन जैसी एंटीबायोटिक को लोग मनमर्जी से खरीद कर इस्तेमाल करते हैं। यही नहीं, चिकित्सकों के परचे पर भी एंटीबायोटिक जरूर होती है। इस विषय में एक एमडी (मेडिसिन) डिग्रीधारी चिकित्सक अपनी मजबूरी बताते हुए कहते हैं कि बुखार से पीड़ित मरीज को केवल पैरासिटामॉल लिखें तो उसे लगता है कि ये तो वह अपने से खाकर ठीक हो सकता है। इसलिए एंटीबायोटिक भी लिखते हैं ताकि उसे फीस देना न अखरे(रेखा सिन्हा,राष्ट्रीय सहारा,लखनऊ,7.4.11)।

दैनिक भास्कर,अमृतसर संस्करण(7.4.11) में रविंदर शर्मा की यह रिपोर्ट भी देखिएः
70 साल पहले खोजी गई एंटीबायटिक दवाओं का अब इंसान के साथ-साथ जानवरों पर भी असर घटने लगा है। इसके चलते विश्व में 4.40 लाख मल्टी ड्रग टीबी संक्रमित हो गए हैं। मरीजों पर एंटीबायटिक का असर कम होने के चलते विश्व में हर साल 1,50,000 से अधिक मौतें हो रही हैं।

विश्व स्वास्थ्य आर्गेनाइजेशन ने इसे गंभीरता से लेते हुए इस बार विश्व स्वास्थ्य दिवस को एंटीबायटिक को समर्पित किया है। डब्लूएचओ ने विश्व स्वास्थ्य दिवस का मोटो ‘नो एक्शन टू डे-नो क्योर टू मारो’ रखा है। इसका मतलब है कि अगर इस संबंध में हम आज गंभीर नहीं हुए तो आने वाले समय में हमें पछताना पड़ेगा।

आईसीयू के मरीजों पर असर
अस्पतालों में दाखिल मरीजों विशेषकर बहुत लंबे समय तक आईसीयू में रहने वालों पर एंटीबायटिक का असर नहीं होता। इसके चलते कोई भी दवा उन पर असर नहीं करती, जिससे कई बार मरीज की मौत भी हो जाती है।

क्लोरोकुनीन व आर्टीसीमिन असरहीन
मलेरिया की रोकथाम और इसके इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली क्लोरोकुनीन का असर लगभग खत्म हो गया है। इस कारण मलेरिया का इलाज सरकार के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन गई है। लोगों की तरफ से आर्टीसीमिन का ज्यादा देर तक सेवन करने के कारण ही इसका भी असर खत्म हो चुका है।

केमिस्ट से दवा लेना घातक
अकसर कुछ लोग बीमार होने पर खुद ही कैमिस्ट के पास दवा लेने पहुंच जाते हैं। कैमिस्ट भी बिना पर्ची मरीज को एंटीबायटिक व अन्य दवाओं का लिफाफा थमा देते हैं। इस तरह दवाई लेना सेहत के लिए ही नहीं, बल्कि जिंदगी के लिए भी खतरनाक हो सकती है।

पशुओं पर भी असर-हीन होने लगा एंटीबायटिक
इंसानों के साथ-साथ पशुओं पर भी एंटीबायटिक दवाओं का असर घटने लगा है। इसका कारण दवाओं की गुणवत्ता का सही नहीं होना है। इसके चलते पशुओं को होने वाली बीमारियां इंसानों को भी होने लगी हैं। मेडिकल शिक्षा और शोध विभाग के डायरेक्टर डा. जयकिशन ने कहा कि इस पर रोक लगाने के लिए इंफेक्शन कंट्रोल कमेटी और एंटीबायटिक कमेटी का गठन किया जाना चाहिए। जिसमें नेता, दवाओं के निर्माता, लोग, मरीज, डाक्टर, नर्सें और फार्मासिस्ट शामिल हों।

क्या है एंटीबायटिक ?
एंटीबायटिक अर्थात एंटी माइक्रो-बॉयोलॉजी की शोध से गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों को मौत के मुंह से निकाला जा सकता है। बैक्टिरिया, फंगस, परजीवी कीड़ों और वायरस वाली बीमारियों से पीड़ितों के इलाज के लिए एंटीबायटिक दवा दी जाती हैं। एंटीबायटिक की सही मात्रा और निर्धारित समय तक लेने से मरीज को बहुत फायदे मिलते हैं।

इसी अखबार में करनाल से प्रवीण अरोड़ा की रिपोर्ट भी चिंताजनक हैः
इन दिनों लोग एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक सेवन कर रहे हैं। मामूली खांसी, जुकाम में भी एंटीबायोटिक दवा ले रहे हैं। अपने आप ही केमिस्ट से एंटीबायोटिक दवा खरीदकर ले ली जाती है, यानि कि डाक्टर की सलाह की भी जरूरत नहीं समझी जाती। यही नहीं कई डाक्टर भी रोगियों को एंटीबायोटिक दवा ही लिखकर देते हैं। जाने अनजाने लोग एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक सेवन कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि एंटीबायोटिक दवाओं के अधिक सेवन से धीरे-धीरे दवाओं का शरीर पर असर होना कम हो जाता है, जोकि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सवाल यह पैदा होता है झ्रिक इसके लिए जिम्मेदार कौन है। वे डाक्टर जो बिना रोगी को जांचे एंटीबायोटिक दवा दे रहे हैं या फिर वे लोग जो अपनी मर्जी से कोई न कोई एंटीबायोटिक का सेवन कर रहे हैं। वे ये भी जानने का प्रयास नहीं करते हैं कि इन दवाओं का उनके शरीर पर क्या असर होता है।

डाक्टर नहीं करते मरीज की कल्चर रिपोर्ट
रोगी पर एंटीबायोटिक दवा का असर पता करने के लिए कल्चर रिपोर्ट की सुविधा है, लेकिन कई डाक्टर इस सुविधा का प्रयोग नहीं करते। रोगी को पांच, सात व दस दिन की दवा देने के बाद भी असर न होने के बाद भी कल्चर रिपोर्ट नहीं करवाई जाती है। कई डाक्टर तो कल्चर रिपोर्ट करवाकर यह जान लेते हैं कि किस वजह से शरीर पर एंटीबायोटिक दवा का असर क्यों नहीं हो रहा है।

एंटीबायोटिक लेने की स्टेज से पहले ही हो जाते हैं आदी: करनाल सिविल अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डा. संजीव ग्रोवर के अनुसार अधिक एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन करने से बीमारी के कीटाणुओं पर दवा का असर कम हो जाता है। व्यक्ति एंटीबायोटिक लेने की स्टेज से पहले ही इतनी एंटीबायोटिक दवा का सेवन कर चुका होता है, जिससे बॉडी एंटीबायोटिक की रिस्सटेंट हो चुकी होती है। जब एंटीबायोटिक दवा की जरूरत होती है तब तक उस दवा का असर रोगी के शरीर पर कम होता है। इसके लिए फिर नई व महंगी दवा का प्रयोग किया जाता है।

बरतें एहतियात
एंटीबायोटिक दवा का सेवन करने से पहले डाक्टर की सही सलाह का अनुसरण करें एंटीबायोटिक दवा का अधिक सेवन हानिकारक है, इसलिए एंटीबायोटिक दवा का गलत प्रयोग नहीं होना चाहिए। यदि दवा का असर नहीं हो रहा है तो कल्चर रिपोर्ट जरूर करवा लें। गला खराब, वायरल इंफेक्शन, खांसी, जुकाम में एकदम से एंटीबायोटिक का सेवन नहीं करना चाहिए।

एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक सेवन करने से बॉडी उस दवा की रिस्सटेंट हो जाती है, जोकि गलत है। लोगों को डाक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक दवा का सेवन नहीं करना चाहिए-डा. वंदना भाटिया, सिविल सर्जन करनाल

नवभारत टाइम्स में नीतू सिंह की रिपोर्ट भी देखिएः
नजफगढ़ में रहने वाले राजेंद्र सिंह को पिछले साल सर्दी , जुकाम हुआ था। उन्होंने डॉक्टर को दिखाया तो पता लगा कि गले में बैक्टीरियल इन्फेक्शन हो गया है , इसलिए डॉक्टर ने पांच दिन की ऐंटिबायॉटिक लिख दी।

पांच दिन दवा खाने के बाद राजेंद्र डॉक्टर के पास नहीं गए। चूंकि उन्हें तबियत पूरी तरह ठीक नहीं लग रही थी इसलिए वही ऐंटिबायॉटिक तीन दिन और खा ली। उसके बाद उनके घर में ही नहीं , आस - पड़ोस में भी किसी को वायरल होता तो वो वहीं ऐंटिबायॉटिक लेने की सलाह दे डालते। बिना यह जाने कि इन्फेक्शन वायरल है या बैक्टीरियल , जबकि वह काफी पढ़े - लिखे और पेशे से टीचर हैं।

इसी तरह रोहिणी में रहने वाली आशिमा को जॉन्डिस हुआ। डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने एक आयुर्वेदिक और एक एलोपैथी की दवा लेने की सलाह दी , क्योंकि इनके अलावा जॉन्डिस की कोई दवा अब तक उपलब्ध नहीं है। एक हफ्ते तक तबियत में सुधार नहीं हुआ तो उनका पूरा परिवार डॉक्टर को कोसने लगा। सब अपने - अपने अनुभव बताने लगे कि मेरे फलां जानकार ने जॉन्डिस होने पर जिस डॉक्टर को दिखाया था उसने पहले दिन से ही इतनी तगड़ी - तगड़ी एंटीबायोटिक्स दीं कि दो दिन में ही आराम हो गया। हालांकि आशिमा ने अपने डॉक्टर की ही दवा जारी रखी और वह उसी से ठीक हो गईं , हां वक्त जरूर लगा।

ये दोनों मामले सिर्फ एक उदाहरण हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक यहां 90 पर्सेंट लोग इसी तरह के एटिट्यूड वाले हैं। उन्हें लगता है कि एक जैसी दिखने वाली हर किसी की बीमारी का एक ही इलाज है और जो डॉक्टर जितनी जल्दी तगड़ी दवाई लिखकर तुरंत ठीक कर देता है वही सबसे जानकार है।

लोगों की मानसिकता से डॉक्टर भी कम प्रभावित नहीं है , खासतौर से नए डॉक्टर। यही वजह है कि तमाम जरूरी दवाओं के प्रति तेजी से प्रतिरोधक उत्पन्न होने लगे हैं , जो कि इनको निष्क्रिय बना रहे हैं।

मेदांता मेडिसिटी के एक्सपर्ट डॉ . राजीव पारख कहते हैं कि बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी ऐंटिबायॉटिक लेना फायदे के बजाय नुकसान पहुंचा सकता है। आर्टमिस हॉस्पिटल के एक्सपर्ट डॉ . अनिल ढल कहते हैं कि ऐंटिबायॉटिक का सबसे ज्यादा दुरुपयोग वायरल के मामलों में देखा जाता है , जबकि वायरल इन्फेक्शन में ऐंटिबायॉटिक दवाओं से कोई फायदा नहीं होता , उलटे ये समस्या को और बढ़ा सकती हैं।

ऐसे में बिना बीमारी की सही स्थिति जाने कोई भी दवा लेना खतरनाक हो सकता है। दिल्ली डेंटल काउंसिल के अध्यक्ष डॉ . अनिल चांदना कहते हैं कि दांतों या मसूढ़ों के इन्फेक्शन के मामले में अक्सर ऐसा देखा जाता है कि मरीज को पांच दिन की ऐंटिबायॉटिक लिखो तो वह उन्हें खाने के बाद अपनी मर्जी से तीन दिन और जरूर खा लेता है।

फॉलोअप के लिए भी तब आता है जब दोबारा तकलीफ हो। यह तरीका बहुत गलत है। दिल्ली हार्ट एंड लंग इंस्टिट्यूट के अध्यक्ष डॉ . के . के . सेठी कहते हैं कि समस्या के लिए डॉक्टर और आम लोग दोनों में जानकारी का अभाव जिम्मेदार है , उन्हें इस बारे में जागरूक करना चाहिए।

पिछले दिनों ऐंटिबायॉटिक रेजिस्टेंस का मामला दुनिया भर में काफी चर्चा का विषय रहा था। ऐसे में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने इस बार विश्व स्वास्थ्स दिवस के लिए इसी समस्या को थीम बनाकर इस बारे में जागरूकता अभियान छेड़ने का ऐलान किया है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. चिकित्सा में सबसे गम्भीर प्रश्न!!!

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  2. चिकित्सा जगत की यह एक बड़ी समस्या है -अन्टीबायोतिक औषधियों से रोगाणुओं की सहनशीलता!

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  3. इस मामले में जनता ही नहीं , चिकित्सक भी उतने ही लापरवाह और गैर जिम्मेदार हैं ।

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