शुक्रवार, 15 जून 2012

माइग्रेन का यौगिक उपचार

समय-समय पर उठने वाले इस अत्यंत तीव्र सरदर्र्द की विशेषता यह है कि दर्द आधे सिर में ही होता है तथा अक्सर इसके साथ उल्टियाँ और ठीक से दिखाई न देने की तकलीफें शामिल हैं। यह पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक होता है। माना जाता है कि माइग्रेन का दर्द स्वचालित तंत्रिकाओं के असंतुलन के कारण सिर में मौजूद रक्तनलिकाओं के फैलने से होता है। ये तंत्रिकाएँ नलिका का आकुंचन बनाए रखकर सिर के रक्त प्रवाह को नियंत्रित करती है। नलिकाओं के फैलने से उनकी भित्ति में स्थित पीड़ा संवेदी तंतु उत्तेजित हो दर्द उत्पन्न करते हैं। 

यह तथ्य अभी प्रमाणित नहीं हुआ है कि रोग अनुवांशिक है या व्यावहारात्मक विरासत है। सामान्यतः लगभग वयः संधि की उम्र से शुरू होकर मध्यवय के उत्तरार्द्ध तक माइग्रेन का दर्द समय-समय पर उठता रहता है। दर्द के दौर कुछ दिनों से लेकर कई महीनों तक के अंतराल से उठते हैं। अक्सर इनका संबंध भावनात्मक दबाव से अपूरित महत्वाकांक्षाओं या अनाभिव्यक्त लैंगिक समस्याओं से रहता है, जो चिढ़चिड़ापन व खीज उत्पन्न करते हैं।

सिर में दर्द एक बिन्दु से शुरू होकर धीरे-धीरे आधे सिर में (या कभी-कभी पूरे सिर में) फैल जाता है। दर्द अत्यंत तीव्र एवं प्रतिस्पंद करता हुआ महसूस होता है। व्यक्ति पसीने-पसीने होकर उल्टियाँ करने लगता है तथा प्रकाश एवं ध्वनि बर्दाश्त नहीं कर सकता। उसे अंधेरे शांत कमरे में बिस्तर पर पड़े रहना बेहतर लगता है। यह दौरा कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक चलता है तथा रोगी को लस्त एवं शक्तिहीन बना देता है।

तनावजन्य सरदर्द :
माइग्रेन एवं तनावजन्य सरदर्द दोनों ही मानसिक भावनात्मक तनाव से संबंधित हैं, अंतर इतना ही है कि माइग्रेन स्वसंचालित तंत्रिकाओं के मध्यम से तथा तनावजन्य सरदर्द कायिक तंत्रिकाओं के माध्यम से दर्द की अनुभूति उत्पन्न करता है। तनाव के कारण तंत्रिका तंतु सिर की त्वचा के नीचे की पतली मांसपेशियों को या ग्रीवा पृष्ठ की पेशियों को प्रेरित कर लगातार आकुंचित बनाए रहते हैं। इसके कारण उन पेशियों में दर्द की संवेदना उत्पन्न होती है। 

यौगिक उपचार
इन समस्याओं के निदान में मेडिकल साइंस की जो कमियाँ एवं खामियाँ हैं, यौगिक अभ्यास उन्हें दूर कर इलाज पद्धति को एक संपूर्णता प्रदान करते हैं। अक्सर सभी प्रकार के तनावजन्य और संवहनीय सरदर्द (माइग्रेन एवं पेशीय अतिसंकुचन सहित) मात्र यौगिक क्रियाओं द्वारा पूर्णतः उन्मूलित किए जा सकते हैं। आधुनिक शोधों से इस बात की पुष्टि होती है कि माइग्रेन के लक्षणों के प्रकट होने के कारणों या क्रियाविधि को समझना इतना सरल नहीं है। इसमें अनेक जटिल प्रक्रियाएँ शामिल हैं, जिनमें मस्तिष्क के रसायन एवं रक्त कणिकाओं से स्रावित होने वाले रसायन अन्योन्याश्रित तौर पर विकृत रूप से कार्य करने लगते हैं। 

सामान्य निरीक्षण से,आधुनिक शोधपत्रों से,लक्षणों से एवं आधुनिक चिकित्सा पद्धति की असफलता से यह बात स्पष्टतः साबित होती है कि इस मनोकायिक रोग की समुचित चिकित्सा एक अन्य स्तर से करने की आवश्यकता है जो शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक,प्राणिक और अन्य सूक्ष्म स्तरों तक इस विकृति को प्रभावित कर रोग को समूल नष्ट कर सके।। 

इस परिप्रेक्ष्य में,योग चिकित्सा इन सभी स्तरों को प्रभावित करने का एक सशक्त विकल्प बन कर हमारे सामने आती है।योग की क्रियाएं मस्तिष्क में सेरेटॉनिन-मेलेटॉनिन इत्यादि रसायनों के स्रवणचक्र को,उनकी मात्रा को एवं अनुपात को पुनर्व्यवस्थित करती हैं। वे व्यक्ति को संवेदनात्मक तौर पर अधिक संतुलित करती हैं। योग द्वारा प्राणशक्ति के प्रवाह के अवरोध दूर होते हैं और पूरे शरीर में प्राणों का संचार बेहतर तरीक़े से होना प्रारंभ हो जाता है। नेति एवं कुंजल माइग्रेन तथा अधिक सिरदर्द के उपचार हेतु दो आधारभूत हठयौगिक क्रियाएं हैं। यदि उनका अभ्यास माइग्रेन के दौर का पूर्वाभास होते ही कर लिया जाए,तो व्यक्ति को तुरंत आराम मिल जाता है। यह सर्वविदित है कि यदि माइग्रेन के रोगी को स्वतः उल्टियां हो जाएं तो लक्षण की तीव्रता घट जाती है। यह तथ्य इस बात की पुष्टि करता है कि कुंजल की कायो-मानसिक प्रतिक्रियाएं अनाभिव्यक्त तनावों को या भावनाओं को अचेतन मन से मुक्त करने में सक्षम है। रोग को जड़ से मिटाने केलिए इन क्रियाओं का दैनिक प्रातःकाल अभ्यास करना चाहिए। साथ ही,संलग्न अभ्यास क्रम का भी दो से तीन महीने तक अभ्यास करना चाहिए(स्वामी सत्यानंद सरस्वती का यह आलेख नई दुनिया के सेहत,जून द्वितीय,2012 परिशिष्ट में प्रकाशित है)। 


नोटःमाइग्रेन के संबंध में,इसी ब्लॉग पर पूर्व में प्रकाशित आलेख यहां हैं।

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उपयोगी जानकारी ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. उत्कृष्ट प्रस्तुति |
    आभार ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. अच्छी जानाकारी दी आपने और अच्छे उपचार बताए

    और जैसे आपने मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी की

    हिंदी के बीच इतने सारे शब्द अंग्रेज़ी के क्यों?
    राधारमण जी में अंग्रेज़ी शब्द डालता हूं क्यों की search engine आसानी से लेख ढूंड सके और ज्यादा लोग उससे लाभान्वित हो सके.
    धन्यवाद मुझे अच्छा लगा की किसी ने तो मेरे काम के बारे में मुझसे कुछ सवाल पूछा
    और कुमार जी में सोच रहा हू की Important Links menu add करू तो क्या में इस मेनू में आपकी साईट का नाम से सकता हूं.

    हिन्दी दुनिया ब्लॉग (नया ब्लॉग)

    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. लेकिन आज के लेख में ज्यादा ही हो गए अंग्रेज़ी के शब्द

      हटाएं
  4. बहुत ही अच्छी जानकारी...
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  5. भागमभाग जिन्‍दगी के कारण यह रोग लाजमी है पर हम सादा जीवन को अपनाकर इससे कुछ हद तक छुटकारा प्राप्‍त कर सकते है

    उत्तर देंहटाएं
  6. उपयोगी जानकारी आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  7. अच्छी जानकारी दी है .
    बचपन में सुनते थे , इसे आधासीसी या आंधासिसी कहते थे .
    ज़ाहिर है , नाम में ही लक्षण भी छिपे हैं .

    उत्तर देंहटाएं
  8. sach kaha ye rog mahilaaon me adhik paya jata hai. aur iska karan kewal ek tanaav hi nahi aajkal jo itna high temperature ho raha hai uske karan bhi ye rog nity-pratidin sataye rahta hai. aapka pura lekh padha lekin jo yog NETI AUR KUNJAL JO do HATHYAUGIK kriyaain batayi vo mujhe samajh nahi aayi. agar in par thoda vistar se bataye to kuchh padhne walo ko iska faayeda mil sake.

    aabhar.

    उत्तर देंहटाएं
  9. bahut hi upyogi jankari mili aur maine pranayam dwara ise dur kiya hai ab mujhe maigrane nahi hai

    उत्तर देंहटाएं
  10. इस रोग से पीडित दोस्त मित्रों को कहता हूं इसे आजमाने को।

    उत्तर देंहटाएं
  11. मेरी माता जी के ये परेशानी है आप की इस बीमारी से जुडी सभी पोस्ट उन्हें भेज देती हूं | एक और जानकारी के लिए धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं

एक से अधिक ब्लॉगों के स्वामी कृपया अपनी नई पोस्ट का लिंक छोड़ें।