बुधवार, 25 अगस्त 2010

डेंगू,मलेरिया और स्वाइन फ्लू

बारिश के साथ डेंगू का खतरा भी चार गुना बढ़ गया है। राजधानी सहित अन्य शहरों से डेंगू के साथ मलेरिया के मरीजों की भी सूचना मिल रही है। चिकित्सकीय भाषा में हालांकि डेंगू के लिए अभी तक कोई इलाज स्वीकृत नहीं किया गया है। इसके बावजूद कुछ साधारण सावधानियां इस्तेमाल कर बीमारी से बचा जा सकता है, जिसमें प्रमुख रूप से बुखार होने पर एस्प्रिन दवाओं का सेवन न करना माना गया है। इसके साथ ही साफ पानी के जमा न होने पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए।

डेंगू बुखार : मादा एडीस मच्छर के काटने का असर डेंगू बुखार के रूप में सामने आता है। डेंगू को मुख्य रूप से तीन प्रकार में विभाजित किया जा सकता है, जिसमें साधारण डेगू, हैमरेजिक और शॉक सिंड्रोम डेंगू प्रमुख हैं। रक्त में संक्रमण होने से पांच से छह दिन के अंदर यह बुखार अपना असर दिखाना शुरू करता है।

साधारण डेंगू -अचानक तेज बुखार के साथ सिर में दर्द। -मांसपेशियों के साथ जोड़ों में तेज खिंचाव व दर्द होना। -अत्यधिक कमजोरी का महसूस होना, भूख न लगना। -मुंह के लार्वा प्रभावित होने से स्वाद खत्म होना। -पेट में असहनीय दर्द का अनुभव होना, बिना किसी कारण -गला सूखने का एहसास होना, उपरोक्त के साथ शरीर में लाल व गुलाबी रंग के चकत्तों का बनना साधारण डेंगू के लक्षण हैं।

डेंगू हैमरेजिक फीवर नाक, मुंह व दांतों में रक्तस्राव के साथ तेज बुखार होना डेंगू हैमरेजिक बुखार के लक्षण हैं, इसमें मरीज के बुखार का स्तर 105 डिग्री फारेनहाइट तक भी जा सकता है, जिसका सीधा असर मस्तिष्क पर भी पड़ता है। डीएचएस पॉजीटिव जांच के बाद मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत होती है।

डेंगू शॉक सिंड्रोम डेंगू की गंभीर व तीसरी अवस्था को डेंगू शॉक सिंड्रोम कहा जाता है, जिसके तेज कंपकंपाहट के साथ मरीज को पसीने आते हैं। इस अवस्था में इलाज की देरी मरीज की जान ले सकती है। शॉक सिंड्रोम की स्थिति आने तक मरीज के शरीर पर लाल चकत्ते के दाग स्थाई हो जाते हैं, जिनमें खुजली भी होने लगती है।

क्या बरतें सावधानी -मादा एनाफिलिज मच्छर का म्यूटेशन (प्रजनन) क्योंकि साफ पानी में ही होता है, इसलिए घर के किसी भी कोने या बर्तन में साफ पानी को जमा न होने दें, इससे एक से दो दिन के बीच में ही मच्छर पनपने लगते हैं। -साफ पानी में मच्छरों के पैदा होने से बचाव के लिए गंबूश मछली या फिर कुनैन टैबलेट्स का प्रयोग किया जा सकता है। गंबूश मछलियां एडीस के लार्वा को खा जाती हैं।

-मादा मच्छर क्योंकि दिन में ही काटता है, इसलिए दोपहर में मच्छरों से बचाव पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए।

और जरूरी एहतियात -डेंगू बुखार में शरीर के रक्त में तेजी से प्लेटलेट्स का स्तर कम होता है, इसलिए बुखार में भूल कर भी एस्प्रीन दवाएं, डिस्प्रीन या फिर क्रोसिन नहीं देनी चाहिए, जबकि पैरासिटामोल का सेवन बुखार में सुधार ला सकता है।

-जरूरी नहीं हर तरह के डेंगू में प्लेटलेट्स चढ़ाए जाएं, केवल हैमरेजिक और शॉक सिंड्रोम डेंगू में प्लेटलेट्स की अनिवार्यता बताई गई है, जबकि साधारण डेंगू में जरूरी दवाओं के साथ मरीज को ठीक किया जा सकता है। इस दौरान ताजे फलों का जूस व द्रव्य चीजों का अधिक सेवन तेजी से स्थिति में सुधार ला सकता है।

मलेरिया मानसून की आम बीमारियों में दूसरा नाम मलेरिया का है। चालीस से पचास प्रतिशत मलेरिया का कारण प्लाज्मोडियम फैलसिपेरम को माना जाता है। मादा मच्छर एनाफिलीज के काटने से प्लाज्मोडियम मरीज की लाल रक्त कणिकाओं को तेजी से प्रभावित करता है। रक्त में पहुंच कर प्लाज्मोडियम 12 से 24 घंटे के बीच तेजी से सेल्स को प्रभावित करना शुरू कर देता है, जिसका असर थकान, तेज बुखार और नाक बहने के रूप में सामने आता है। बरसात के ठहरे हुए पानी को मादा एनाफिलीज की ब्रीडिंग के लिए सटीक माना जाता है।

लक्षण -श्वांस लेने में तकलीफ होना, तेजी से नाक का बहना। -बुखार का रुक-रुक कर आना, शरीर में कंपकंपाहट महसूस होना। -भूख का निरंतर कम होना व कमजोरी का बने रहना। -पेट में असहनीय दर्द होना आदि मलेरिया के प्रमुख लक्षण हैं।

जांच सिवियर और साधारण मलेरिया जांच के लिए रैपिड टैस्ट जांच को जरूरी बताया गया है, जिसमें रक्त में फैलसिपेरम प्लाज्मोडियम की उपस्थिति को आरबीसी के आधार पर गिना जाता है। हालांकि पीसीआर (पॉलिमेरेज चेन रिएक्शन) टेस्ट को भी सही माना जाता है।

क्लीनिकल बदलाव -केएफटी (किडनी फंक्शनिंग टेस्ट) में सीरम क्रेटाइन व ब्लूरूबिन का 3एमजी/डीएल से कम होना। -सिवियर एनेमिक पाया जाना, जिसमें रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्र 5 डीएल/एमजी से कम पाया जाना। -एक्यूट रेस्पायरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम जांच का पॉजिटिव आना। -हाइपोग्लीसीमिया की स्थिति, जिसमें प्लाज्मा ग्लूकोज की स्थिति 40एजी/डीएल से अधिक पाया जाना। -रक्तचाप वयस्क में 80 एमएमएचजी से अधिक होना तथा बच्चों में 70 एमएम एचजी से अधिक पाया जाना गंभीर अवस्था का लक्षण है।

इलाज साधारण मलेरिया में हालांकि क्लोरोक्वीनिन दवाई को जांच पॉजिटिव आने के बाद दिया जाता है, लेकिन वर्ष 2008 में मलेरिया अनुसंधान संस्थान द्वारा मलेरिया की वैक्सीन को भी लांच किया गया। क्लोरोक्वीन दवाई हालांकि फैलसिपेरम प्लाज्मोडियम ‘पी’ में अधिक कारगर नहीं मानी गई। इसलिए दवा से पहले मलेरिया प्लाज्मोडियम की जांच जरूरी है।

(उपरोक्त जानकारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के कम्यूनिटी मेडिसन विभाग के डॉ. बीर सिंह और गैस्ट्रोइंटोलॉजिस्ट डॉ. अमिताभ यादव द्वारा दी गई। )

क्या हो इस मौसम का आहार -तापमान में गिरावट के साथ ही विशेषज्ञ विटामिन सी को खाने में प्रमुखता की सलाह देते हैं, जिसके लिए आंवला व नीबू के साथ ही विटामिन सी की दवाओं को भी शामिल किया जा सकता है।

-बारिश के साथ मौसम में आद्रता के बने रहने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है, इसके लिए फलो के ताजे जूस को भोजन में शामिल किया जाना जरूरी है।

-साधारण भोजन के अलावा मानसून में 200 से 300 कैलोरी इंटेक किया जा सकता है, हालांकि इसके साथ ही शारीरिक श्रम को अनुपात बनाए रखना भी जरूरी है।

-हरी सब्जियों के अलावा, न्यूट्रिशियन व पाइथोन्यूट्रिट को शामिल किया जा सकता है।

-रसदार फलों का सेवन करें। आँवले का सेवन जरूर करें। यह विटामिन सी से भरपूर होता है। डिब्बा बंद आँवले का शरबत भी खरीद सकते हैं। डॉ. रितिका सामदार, डायटिशियन, मैक्स अस्पताल

घरेलू इलाजः स्वाइन फ्लू से बचने के उपाय रोज सुबह उठकर 5 तुलसी की पत्तियाँ धोकर खाएँ। गिलोय देशभर में बहुतायत से मिलता है। इसकी एक फुट लंबी डाल का हिस्सा, तुलसी की पाँच-छह पत्तियों के साथ 15 मिनट तक उबालें। स्वाद के मुताबिक सेंधा नमक या मिश्री मिलाएं। कुनकुना होने पर इस काढ़े को पीएं। यह आपकी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ा देगा।

हमदर्द, बैद्यनाथ या किसी अच्छी आयुर्वेदिक दवा कंपनी का गिलोय भी ले सकते हैं। महीने में एक या दो बार कपूर की गोली पानी के साथ लें। बच्चों को केले अथवा उबले हुए आलू में मिलाकर दे सकते हैं। याद रखें कपूर रोज नहीं लेना है, मौसम में एक बार या महीने में एक या दो बार ले सकते हैं। लहसुन की दो कलियां रोज सुबह खाली पेट कुनकुने पानी के साथ जरूर लें। इससे रोग प्रतिरोधक शक्ति में इजाफा होगा।

रात को सोते समय हल्दी का दूध अवश्य पीएं। थायमल, मेंथल, केर्फर (कपूर) को बराबर मात्र में मिला कर तैयार श्यू वायरल के घोल की बूंदों को अगर रुमाल या टिश्यू पेपर पर डालकर लोग सूंघें तो भीड़ में मास्क पहन कर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

पान के पत्ते पर दवा की तीन बूंदें डालकर 5 दिन तक दिन में दो बार खाने पर स्वाइन फ्लू से बचाव हो सकता है। 100 मि़ ली़ पानी में तीन ग्राम नीम, गिलोय, चिरैता के साथ आधा ग्राम काली मिर्च और एक ग्राम सोंठ का काढ़ा बना कर पीना भी काफी लाभदायक रहता है।

इन चीजों को पानी के साथ तब तक उबालना है जब तक वह 60 मिलिग्राम न रह जाए। इसे एक सप्ताह के लिए रोज सुबह खाली पेट पीने पर स्वाइन फ्लू से लड़ने के लिए शरीर में जरूरी परिरक्षण क्षमता (इम्यूनिटी) पैदा हो जाएगी।

त्रिफला, त्रिकाटू, मधुयास्ती और अमृता को समान मात्र में लेकर उसे एक चम्मच लेने से प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह दवा खाना खाने के बाद दो बार लेने से फायदा होगा।

कॉमन फ्लू वायरस से मुकाबला करने में होम्योपैथिक औषधियाँ चमत्कारिक रूप से असरकारक मानी जाती हैं। किसी योग्य चिकित्सक से दवा ले सकते हैं।

-ग्वारपाठे का एक चम्मच गूदा रोज पानी के साथ लें। इससे जोड़ों के दर्द कम होने से साथ-साथ रोगों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ेगी।

-दिन में कई बार अपने हाथ एंटिबायोटिक साबुन से जरूर धोएं। इसके लिए एल्कोलिक क्लींजर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

-रोज प्राणायाम करें। अपने फिटनेस लेवल को बढ़ा कर रखें ताकि किसी भी बैक्टीरिया अथवा वायरस के हमले का सामना कर सके। श्वास प्रणाली की कसरत से यह तंत्र मजबूत होता है। (प्रियंका,प्रस्तुतिःअरविंद ऋतुराज,हिंदुस्तान,दिल्ली,24.8.2010)

2 टिप्‍पणियां:

  1. pichali varsh mein bhi bahut pareshan thi.. lungs mein insfection hua tha to doctors ne swain flu batakar haalat aur khasta kar dee thi..
    Aapne bahut hi upyogi jaankari prastuti ki hai iske liye aabhar

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  2. "क्रोसिन नहीं देनी चाहिए, जबकि पैरासिटामोल का सेवन बुखार में सुधार ला सकता है।"
    क्रोसिन पैरासेटामॉल ही है ।

    आप लोग अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन एक सावधानी बरतें तो अच्छा होगा । समाचार पत्र और मीडिया बहुत सारी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी बिना किसी परीक्षण के छाप देती है ।

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