सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

विक्की डोनर बनने से पहले......

रक्तदान और अंगदान जैसे विषयों पर खुले में चर्चा होती है, लेकिन शुक्राणुदान के बारे में भारतीय समाज में अब तक केवल दबे शब्दों में ही चर्चा होती थी। मगर इस वर्ष इसी विषय पर प्रदर्शित 'विक्की डोनर' ने इस मुद्दे को सुर्ख़ियों में ला दिया। फिल्म में दिखाया गया कि हीरो विक्की (आयुष्मान खुराना) बेरोजगार है, लेकिन स्पर्म डोनेशन को ऐसा काम मानता है जिससे समाज में उसकी बदनामी हो सकती है। उसे लगता है कि बिना शादी के वह बाप बन जाएगा। दरअसल,उसकी यह सोच स्पर्म डोनेशन के बारे में हर आम भारतीय की सोच है। हमारे देश में स्पर्म डोनेशन अब भी टैबू के तौर पर देखा जाता है। दूसरी तरफ,कई दंपति ऐसे हैं जिन्हें संतान प्राप्ति के लिए शुक्राणु दानदाताओं का ही सहारा है। इसके बावजूद,देश में शुक्राणुओं की बैंकिंग की माकूल व्यवस्था नहीं है। निःसंतान दंपतियों को शुक्राणु दान हासिल करने के लिए फर्टिलिटी सेंटरों के सीमित विकल्पों पर ही समझौता करना पड़ता है। स्वस्थ एवं बुद्धिमान शुक्राणुदाताओं की आज भी भारी कमी है।  

दान की महत्ता काफी समय से समाज में प्रचलित है-रक्तदान, गुर्दादान, जिगर दान एवं मरणोपरांत नेत्र-दान। इन सभी दानों को आर्थिक दान के मुकाबले महादान का दर्जा प्राप्त है। शुक्राणुदान भी काफी समय से प्रचलन में है, पर शर्म, झिझक, सामाजिक तिरस्कार की भावना एवं "लोग क्या कहेंगे" का पूर्वाभाव होने के कारण शुक्राणुदाता हमेशा समाज में अदृश्य ही रहे हैं। शुक्राणुदान अन्य दानों से एक खास भिन्नता रखता है कि यहां दाता (देने वाला) एवं ग्रहिता (लेने वाला) ताउम्र एक-दूसरे से अंजान रहते हैं पर इसके बावजूद दोनों के मध्य अप्रत्यक्ष रूप से मानवीय रिश्तों से परे एक अटूट रिश्ता बनता है जो काबिले तारीफ है। इस तरह के दान से निसंतान दंपति को संतान सुख हासिल होता है। 

कौन हो सकते हैं विक्की-डोनर 
(1) उम्र २० से ४५ वर्ष 

(२) शारीरिक मानसिक एवं बौद्धि स्तर सामान्य 

(३) किसी भी प्रकार के अनुवांशिक रोग से मुक्त 

(४) गंभीर प्रकार की बीमारियां जैसे-एड्स "बी", एवं "सी" प्रकार के पीलिया, रक्त की बीमारियाँ एवं सेक्स संबंधित अन्य बीमारियां न हो 

(५) सबसे मुख्य बात कि विवाहित हो एवं संतान सुख हासिल कर चुके हो, इससे इन लोगों के शुक्राणुओं की संतानोपत्ति क्षमता का पता चल जाता है।

क्या हैं जरूरी परीक्षण

-शुक्राणुओं की उच्च स्तरीय जाँच-संख्या, गुणवत्ता एवं संक्रमण

-रक्त परीक्षण के लिए,किसी गंभीर बीमारियों के लिए-खासकर एड्स, पीलिया, टीवी एवं सेक्स संबंधी अन्य संक्रमण के लिए।

क्या हैं प्रक्रिया शुक्राणु बैंक में 

शुक्राणु दाताओं को २ दिनों तक शारीरिक संपर्क एवं अन्य सेक्स गतिविधियों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। शुक्राणुओं का सेम्पल लेने के बाद पूर्ण जाँच एवं केमिकल उपचार के पश्चात शीत-प्रक्रिया द्वारा बैंक में सुरक्षित रख दिया जाता है। इस पर शुक्राणुदाता की कद-काठी, रंगरूप, ब्लड ग्रुप, आंखों एवं बालों के रंग के अनुसार कोड नंबर डाल दिए जाते है, मकसद सिर्फ यह रहता है कि जरूरतमंद अपने व्यक्तित्व से मेल खाता सेम्पल ले सके, जिससे कि संतान की शक्लो-सूरत में माँ-बाप से मेल खा सके।

महत्वपूर्ण बिंदु : आज दिया गया शुक्राणु सेम्पल सिर्फ ६ माह बाद ही उपयोग लायक होता है। इन ६ माह में तीन-तीन महीने के अंतराल से दान में मिले शुक्राणओं के पुनः परीक्षण किए जाते हैं। यह जानने के लिए कि कोई शांत पड़ी हुई पुरानी बीमारी या नई बीमारी आकार तो नहीं ले रही है। सारी जाँचें सामान्य आने पर ही सुरक्षित रखे गए सेम्पल को उपयोग लायक माना जाता है,अन्यथा नहीं। इन सारी प्रक्रियाओं के लिए शुक्राणु दाता एवं बैंक के बीच एक लिखित करार तैयार किया जाता है जो पूर्ण रूप से गोपनीय होता है।

विश्वास की नींव ही मुख्य आधार स्तंभ है 

जिस तरह सुखी, वैवाहिक जीवन का आधार स्तंभ होता है विश्वास, उसी तरह शुक्राणु दाताओं को अपने जीवन-साथी को पूर्ण रूप से विश्वास में लेकर एवं उसकी भावनाओं का सम्मान करते हुए ही विक्की-डोनर बनने का प्रयास करना चाहिए। 

किन लोगों को जरूरत होती हैं शुक्राणुओं की

-जिनके वीर्य में शुक्राणु नहीं हैं। 

- जिनके शुक्राणुओं की संख्या एवं गुणवत्ता में कमी हो एवं लाइलाज हो। 

- जिनके शुक्राणुओं में सामान्य होने के बावजूद संतानोपत्ति की क्षमता न हो।

-पुरुषों में अनुवांशिक एवं संतानोत्पत्ति के लिए घातक बीमारियाँ हों। शुक्राणुदान के अलावा अंडाणु एवं विकसित भ्रूण दान भी प्रचलन में हैं(इंदौर के डॉ. अजय जैन का यह आलेख नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,अक्टूबर प्रथमांक 2012 से आंशिक आशोधन के साथ साभार)। 

ब्रिटेन जैसे देशों में शुक्राणु दाता को करीब 60 पाउंड यानि करीब 2,500 रुपए दिए जाते हैं। मगर,भारत में क्या स्थिति है,इसके लिए,यह रिपोर्ट भी देखिए। 

कुछ अन्य उपयोगी जानकारीः 
-भारतीय चिकित्सकीय अनुसंधान परिषद यानि आईसीएमआर के दिशा-निर्देशों के मुताबिक एक शुक्राणु दाता के शुक्राणु से दस से ज़्यादा बच्चे पैदा नहीं किए जाने चाहिए। तर्क यह है कि एक ही शुक्राणु से पैदा होने वाले बच्चे देखने में कुछ हद तक एक समान होते हैं। 

-आईसीएमआर के दिशानिर्देशों के अनुसार, एक पुरुष को केवल अपने जीवन में 76 बार ही शुक्राणु दान करने की इजाज़त दी जा सकती है। 

-बीबीसी संवाददाता शालू यादव की एक रिपोर्ट कहती है कि दिशा-निर्देशों के मुताबिक़,जब कोई क्लिनिक शुक्राणु बैंक से शुक्राणु लेता है और वो शुक्राणु बच्चे पैदा करने में सफल रहता है, तो उसका रिकॉर्ड शुक्राणु बैंक को दिया जाना चाहिए। 

-2008 में, असिस्टिड रिप्रोडक्टिव टेकनॉलाजी यानी कृत्रिम रूप से बच्चे पैदा करने की तकनीक से जुड़ा एक विधेयक संसद में लाया गया था जिसमें इस क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए कुछ कानून सुझाए गए थे,लेकिन अब तक वो कानून संसद में लंबित है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. जरूरत मंदों के लिये उपयोगी जान कारी,,,,,

    RECENT POST ...: यादों की ओढ़नी

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १६ /१०/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी ,आपका स्वागत है |

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  3. शुक्राणुदान भी काफी समय से प्रचलन में है,

    अगर हम महाभारत के पांडू भाइयों के जन्म की बात करे तो
    सच में काफी समय से प्रचलित है ......लेकिन आज व्यापार के तौर पर
    उभर रहा है !

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  4. उपयुक्त जानकारी है

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  5. Main bhi apna virya daan karna chahta hu par mujhe pata nhi kaha karna he daan.

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