बुधवार, 8 सितंबर 2010

जयपुर: स्टेम सेल तकनीक से विश्व का दूसरा सफल गुर्दा प्रत्यारोपण जयपुर में हुआ

सवाई मानसिंह अस्पताल के नेफ्रोलॉजी विभाग के चिकित्सकों ने एक युवक का गुर्दा स्टेम सेल तकनीक से ट्रांसप्लांट किया है। उदयपुरवाटी (झुंझुनू) निवासी 35 वर्षीय हरिसिंह पुत्र कुल्डाराम का स्टेम सेल तकनीक से सफल गुर्दा प्रत्यारोपण किया गया है। नेफ्रोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.एल.सी. शर्मा का दावा है कि इस तरह का विश्व में दूसरा सफल गुर्दा प्रत्यारोपण हुआ है। इससे पहले हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, बोस्टन में गुर्दे की गंभीर बीमारी से पीड़ित एवं डायलेसिस पर निर्भर एक साथ पांच मरीजों का स्टेम सेल तकनीक द्वारा गुर्दा प्रत्यारोपित किया। ऐसे हुआ प्रोजेक्ट स्वीकृत प्रत्यारोपण के लिए लोकल ऐथिकल व स्टेम सेल कमेटी की अनुशंसा के बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (एम्स) नई दिल्ली को अनुमोदिन के लिए भेजा गया। कमेटी में भारत के 19 विषय विशेषज्ञों के सामने डॉ.एल.सी.शर्मा ने प्रोजेक्ट को प्रस्तुत किया। इसके बाद प्रोजेक्ट को न केवल स्वीकृत किया गया, बल्कि वित्तीय सहायता भी दी गई। चिकित्सकों को मिलेगी प्रेरणा विशेषज्ञ के अनुसार एसएमएस के नेफ्रोलॉजी विभाग में स्टेम सेल से किडनी ट्रांसप्लांट होने के बाद देश के सभी चिकित्सकों को प्रेरणा मिलेगी, जिससे मरीजों को फायदा मिलेगा। इसके साथ ही इस तरह के ट्रांसप्लांट होने के बाद चिकित्सकों का विश्वास बढ़ने के साथ अन्य बीमारियों का इलाज करने की प्रेरणा मिलेगी। ऐसे किया प्रत्यारोपण मां की बोनमेरो से लिया टिश्यू 1. मरीज को टोटल लिंफोइड रेडिएशन दिया गया। 2. डॉ.एलसी शर्मा व डॉ.शिमोन ने हरिसिंह की मां इंद्रा (डोनर) की बोनमेरो से स्टेम सेल लेकर किलर सेल एडीसीसी पद्धति से अलग कर मरीज को चढ़ाई 3. प्रत्यारोपण के बाद रोगी की प्रतिरोधक क्षमता कम करने की दवा दी, ताकि हानिकारक टी-सेल्स खत्म हो जाए तथा हैल्पर टी सेल्स ही रहें। जिससे शरीर प्रत्यारोपित गुर्दे एवं स्टेम सेल को स्वीकार लें। 4. दवा की मात्रा भी 25 फीसदी कम की। प्रत्यारोपण टीम में डॉ. शर्मा, इजराइल के डॉ.शिमोन स्लेविन एवं डॉ. टी.सी. सदासुखी आदि का सहयोग रहा। स्टेम सेल ट्रासंप्लांट डोनर व मरीज की हृूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (एचएलए) की जांच कर मरीज को रेडियोथैरेपी दी जाती है। डोनर से स्टेम सेल प्रत्यारोपित करने के बाद मरीज को जिन्दगी भर दवा लेने की जरुरत नहीं। टौलरेंस विकसित हो जाती है। इतनी तरह के होते हैं ट्रांसप्लांट 1. ऑटोग्राफ्ट: इसमें ऊतकों का प्रत्यारोपण किया जाता है। या तो अतिरिक्त ऊतकों का प्रत्यारोपण किया जाता है या पहले ऊतक तैयार किया जाता है। जैसे-स्किन ग्राफ्टिंग। 2. एलोग्राफ्ट: एक ही प्रजाति के आनुवांशिक रूप से असमान सदस्यों के अंग या ऊतक प्रत्यारोपित किए जाते हैं। मनुष्यों में अंग प्रत्यारोपण के ज्यादातर मामले ऐसे ही होते हैं। 3.जेनोग्राफ्ट: किसी प्रजाति के प्राणी के अंग या ऊतक दूसरी प्रजाति के सदस्य में प्रत्यारोपित किए जाते हैं। 4.आइसोग्राफ्ट: इसमें एक ही प्रजाति के आनुवांशिक रूप से समान सदस्यों (जैसे जुड़वां व्यक्ति) के अंग या उतक प्रत्यारोपित किए जाते हैं। 1954 में बोस्टन में जोसेफ मूर ने गुर्दे का पहला सफल प्रत्यारोपण किया। (सुरेन्द्र स्वामी,दैनिक भास्कर,जयपुर,8.9.2010)।

6 टिप्‍पणियां:

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  2. अगर ई पेशा पैसा बनाने का मसीन बनकर नहीं रह जाए त मानबता का सृस्टि कर्त्ता बन जाता है... बस एगो चाँदी का दीवार तोड़ने भर का देर है... एक समय जयपुर फुट अखबार का खबर बना था अऊर बाद में इतिहास बन गया… आज आपसे पता चला कि जयपुर का गुर्दा भी अब खबर बन गया है... रेगिस्तान में झरना फूट गया...

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  3. बढ़िया जानकारी । इस सफल अभियान के लिए सभी डॉक्टरों को बधाई ।

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  4. इस जानकारी के लिए आपको धन्यवाद तथा उन डाक्टरों को बधाई
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

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