बुधवार, 30 मार्च 2011

हर बड़े मैच के बाद पत्नियां होती हैं ज़्यादती की शिकार

भारत-पाकिस्तान मैच के दौरान आप न तो चिप्स लेकर बैठें, न कोल्ड ड्रिंक का मजा लें और शराब से तो बिल्कुल ही दूर रहें। ये कहना है राजधानी के जाने-माने डॉक्टरों का। बड़े-बड़े स्क्रीन वॉल होटल, मॉल और कार्यालय वातानुकूलित हैं तो हाईवोल्टेज मैच में आप निर्जलीकरण के शिकार हो सकते हैं।

इस संबंध में आज नई दुनिया ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के मनोचिकित्सक डॉ. राजेश सागर के हवाले से छापा है कि ऐसे बड़े मैच के दौरान लोग चिंता के शिकार हो जाते हैं। राममनोहर लोहिया अस्पताल के मनोविज्ञान विभाग की प्रमुख डॉ. एसएन देशपांडे के अनुसार मन विचलित होने पर ध्यान, योग व सकारात्मक शारीरिक क्रिया द्वारा उस पर काबू पाया जा सकता है। हार्टकेयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल के अनुसार दिल के मरीज इतने उत्तेजित न हों कि उनका ब्लडप्रेशर व पल्स रेट बढ़ जाए। मूलचंद अस्पताल के गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी के डॉ.एसके ठाकुर के अनुसार मैच के दौरान किसी भी हाल में जंक फूड व अल्कोहल लेने से बचें।

इसी अखबार में संदीप देव की रिपोर्ट कहती है कि भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच का फीवर पुरूषों को बेकाबू कर सकता है। हार-जीत, दोनों की उत्तेजना को संभालने में असमर्थ पति पत्नियों के साथ ज्यादती कर सकते हैं। मनोचिकित्सकों की मानें तो हाई वोल्टेज क्रिकेट और फुटबॉल मैच में अपनी टीम की खार से खिन्न पति कई बार घरेलू और सेक्सुअल हिंसा का सहारा लेते हैं। मनोचिकित्सकों की पत्नियों को सलाह है कि वे एक दिन उन्हें झेल लें, नहीं तो कईयों के दांपत्य जीवन में खलल पैदा हो सकता है।

अपराध के मामले में दिल्ली पुलिस को सहयोग करने वाले प्रसिद्घ अपराध मनोचिकित्सक डॉ. रजत मित्रा के अनुसार भारत-पाकिस्तान जैसे हाई वोल्टेज मैच में बॉल-दर-बॉल लोगों का जुनून और उनकी उत्तेजना ब़ढ़ती चली जाती है। कुछ लोग अपनी उत्तेजना को संभाल नहीं पाते और क्रोधवश बेकाबू हो जाते हैं। ऐसे क्रोधी इंसान दो रास्ता अख्तियार करते हैं। एक रास्ता खुद को नुकसान पहुंचाने, जैसे आत्महत्या करने, लंबे समय तक खामोश रहने और लोगों से कटकर रहने का होता है। दूसरा रास्ता क्षणिक अपराध की ओर मु़ड़ जाता है। इस अपराध में चीजों की तो़ड़-फो़ड़, मारपीट, जुआ व शराब का लंबे समय तक लत से लेकर घरेलू और सेक्सुअल हिंसा तक शामिल है।

डॉ. रजत मित्रा के अनुसार फुटबॉल वर्ल्डकप-२०१० के दौरान उच्च व मध्यम उच्च वर्ग की कई महिलाएं हिंसा की शिकार होकर आई थी। खेल के दौरान अपनी टीम की हार पर ऐसी महिलाओं के पतियों ने अपने क्रोध को निकालने के लिए या तो उनके साथ हिंसक व्यवहार किया था या फिर उनके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाया था। 


डॉ. मित्रा के मुताबिक उत्तेजना की अवस्था में गुस्सा तो ब़ढ़ ही जाता है, सेक्सुअल हार्मोन भी ब़ढ़ जाता है। पीड़ित व्यक्ति इन दोनों से मुक्त होने के लिए हिंसा और सेक्स का सहारा लेता है। हालांकि बाद में ऐसे पुरूषों को पछतावा होता है, लेकिन उनकी महिला साथी को इससे बाहर आने में करीब दो सप्ताह लग जाता है।

डॉ. मित्रा के अनुसार पिछले क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान मेरे पास ऐसे तीन केस आए थे, जिन्होंने भारत के नॉकआउट राउंड में बाहर होने पर आत्महत्या की कोशिश की थी। डॉ. मित्रा की सलाह है कि लोग क्रिकेट को खेल की तरह लें, खेल देखने के दौरान ड्रिंक न करें, बेवजह दूसरे से बहस न करें और यदि उन्हें दुख या गुस्सा आ रहा है तो बातचीत कर उसे बाहर निकाल दें।

3 टिप्‍पणियां:

  1. aapke blog par hamesha jaankaaripurn upayogi lekh padh kar khushi hoti hai !

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  2. आज तो हर भारतवासी को पूरी ताकत के साथ मुठ्ठियां हवा में लहराते हुए ये गाना गाना चाहिए...

    हिमालय की चोटी पर चढ़ कर,
    हमने ये ललकारा है,
    दूर हटो, दूर हटो,
    हटो हटो, ऐ श्रीलंका वालों,
    वर्ल्ड कप हमारा है...

    जय हिंद...

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