बुधवार, 11 अप्रैल 2012

विश्व पार्किंसन दिवस विशेषःअवेयर रहना जरूरी है

आज का दिन वर्ल्ड पार्किंसन डे के तौर पर सेलिब्रेट किया जा रहा है। चूंकि इंडिया में पार्किंसन के 25 फीसदी मरीज 40 साल के कम उम्र के हैं, इसलिए इसे लेकर अवेयर रहना जरूरी है: 

पहली बार पार्किंसन को लेकर दुनिया तब अवेयर हुई थी, जब मशहूर बॉक्सर मोहम्मद अली इसकी गिरफ्त में आए थे। हालांकि अपने देश में अभी इसे लेकर लोग खास अवेयर नहीं हैं। 

आमतौर पर पार्किंसन 50-60 की उम्र के लोगों में ही होती है, लेकिन एम्स के डाटा के मुताबिक, इंडिया में 25 पर्सेंट लोगों में यह 40 की नीचे की उम्र में देखी गई है। 

अगर रास्ता चलते हुए आपको झटका-सा लगता है और आप अपना बैलेंस नहीं बना पाते। आप आराम से बैठे हैं और हाथों में स्टिफनेस महसूस करने लगते हैं या फिर अचानक ही आपकी आवाज भी धीमी होने लगती है, तो आपको फिक्रमंद होना चाहिए। ये लक्षण पार्किंसन के हो सकते हैं। 

जाहिर है, ऐसे में यंग एज के लोग डिप्रेस्ड फील करते हैं। हालांकि एक्सपर्ट्स की मानें तो, पार्किंसन में आदमी थोड़ा स्लो हो जाता है, लेकिन कोई डेंजरस कंडीशन नहीं बनती। मेडिकेशन और रेग्युलर एक्सरसाइज के साथ आराम से 15-20 साल कट जाते हैं। 

न करें देर 
एम्स के न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट में एडिशनल प्रफेसर डॉ. विनय गोयल बताते हैं कि यह स्पेशल डिजीज हजार में से किसी एक को ही हो सकता है। दरअसल, इसमें बॉडी को जितनी डोपामिन की जरूरत है, उससे कम बनने लगता है। इसकी वजह से 80 पर्सेंट सेल्स का जब लॉस हो जाता है, तब जाकर बीमारी का पहला सिंपटम दिखाई देता है। जाहिर है कि जब सिंपटम्स ही देर से पता लगेंगे, तो प्रॉब्लम आएगी ही। इस बारे में साइंटिस्ट अभी रिसर्च में लगे हुए हैं कि थोड़ा पहले ही बीमारी का पता लगाया जा सके। वैसे, फैमिली में किसी को यह डिजीज पहले से हो तो भी आपको सतर्क रहना चाहिए। 

मेदांता के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. आदित्य गुप्ता के मुताबिक, 'सबसे बड़ी प्रॉब्लम अवेयरनेस में कमी है। अक्सर फिजिशियन भी इस बारे में अवेयर नहीं होते। पेशंट जब किसी फिजिशियन के पास स्पीड के स्लो होने जैसी प्रॉब्लम लेकर जाते हैं, तो उन्हें विटामिंस सजेस्ट कर दिया जाता है। जबकि विटामिन और प्रोटीन की डोज इस बीमारी में दवाइयों के इफेक्ट को कम करता है। सच तो यह है कि जिस न्यूरॉलॉजिस्ट की पार्किंसन में एक्सपर्टाइज हो, वही आपको सही ट्रीटमेंट दे सकता है।' 

एक्सपर्ट के सामने एक बड़ी प्रॉब्लम यह है कि अपने देश में पेशंट ऑपरेशन के नाम पर पहले आयुर्वेद-होम्योपैथ वगैरह आजमाने लग जाते हैं। जब वे चलते-चलते गिरने लगते हैं, फ्रैक्चर होने लगते हैं, तब सर्जरी के लिए पहुंचते हैं। तब तक बहुत देर हो जाती है। 

यूनीक सिंपटम्स 
डॉ. गोयल बताते हैं कि अगर आप फिजिकली और मेंटली फिट हैं, तो पार्किंसन का सामना अच्छी तरह से कर सकते हैं। ऐसा देखा गया है कि, डिप्रेशन और एंग्जाइटी का भी इसमें निगेटिव रोल होता है। कई पेशंट्स में पार्किंसन के अटैक से पहले स्मेल सेंसेशन खत्म हो जाती है। ऐसा भी देखा गया है कि पार्किंसन के होने से 5-10 साल पहले लोगों में नींद में बहुत बड़बड़ाने या हाथ-पैर चलाने की कंप्लेन आ गई थी। 

ट्रीटमेंट 
पार्किंसन की डायग्नोसिस हर जगह नहीं हो सकती। इसे आप न्यूरोलॉजिस्ट से ही करा सकते हैं। जितनी जल्दी आपका ट्रीटमेंट शुरू हो जाए, असर भी उसी के हिसाब से होता है। हां, ट्रीटमेंट के दौरान दवाइयों में लापरवाही बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। इस दौरान मेडिटेशन वगैरह भी रिलैक्स रखती हैं(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,11.4.11)।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी जानकारी मिली .... इसके बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था ॥

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  2. बहुत अच्छी जानकारी. क्या आप मुझे बताएँगे कि क्या पार्किन्सन रोग वंशानुगत होता है. मेरी माँ को ये रोग है काफी वर्षों से. इधर मेरी ज़िन्दगी में मैं भी काफी depression में रहती हूँ. क्या मुझे ये रोग होने क़ी संभावना है. आपका बहुत धन्यवाद.
    rajtmr@aol.in

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  3. बहुत अच्छी जानकारी. क्या आप मुझे बताएँगे कि क्या पार्किन्सन रोग वंशानुगत होता है. मेरी माँ को ये रोग है काफी वर्षों से. इधर मेरी ज़िन्दगी में मैं भी काफी depression में रहती हूँ. क्या मुझे ये रोग होने क़ी संभावना है. आपका बहुत धन्यवाद.
    rajtmr@aol.in

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  4. यह रोग आम तौर पर वंशानुगत नहीं होता . प्राय: इसका कोई कारण नहीं होता . लेकिन डिप्रेशन से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है . आप अपना इलाज कराएँ , ठीक हो जाएँगी .

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  5. कई असाध्य रोग जैसे अस्थमा, एल्ज़ीमर्स, मल्टीपल स्कीरोसिस, डिप्रेशन, पार्किनसन्स, ल्यूपस नेफ्राइटिस, एड्स, स्वाइन फ्लू आदि का भी उपचार करती है अलसी। कभी-कभी चश्में से भी मुक्ति दिला देती है अलसी। दृष्टि को स्पष्ट और सतरंगी बना देती है अलसी। एक बार अवश्य देखेँ यह लिङ्क http://flaxindia.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

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