शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

शहद हो तो पातालकोट का

मध्यप्रदेश के छिंदवाडा जिले के पातालकोट में आदिवासियों के लिये शहद आय का एक ज़रिया है। उनके जीवन में शहद अच्छे स्वास्थ्य के लिये महत्वपूर्ण माना जाता है। बेहतर पोषण और स्वास्थ लिये वे अपने बच्चों को सुबह रोटी के साथ शहद खाने को देते है। उनका मानना है कि शहद याददाश्त के लिये उत्तम है।

शहद को छांछ के साथ लेने से स्मरण शक्ति बढ़ती है। दूध के साथ मिलाकर लेने पर यह हृदय, दिमाग़ और पेट के लिये फ़ायदेमंद होता है। गर्मियों में अक्सर नींबूपानी के साथ शहद मिलाकर पीने से ये शरीर को ऊर्जा और ठंडक प्रदान करता है। शहद का सेवन प्रतिदिन करने से शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने में काफ़ी मदद मिलती है। यह शारिरिक ताक़त को बनाए रखकर थकान दूर करता है। शुद्घ शहद की एक-एक बूँद दोनो आँखो मे डालने से आँखो की सफ़ाई के साथ-साथ रौशनी बढ़ती है। बच्चों में दाँत आने के वक्त मसूड़ों पर शहद लगाने से आराम मिलता है। जंगल से प्राप्त शहद को पानी में मिलाकर शौच जाने से पहले प्रतिदिन चंद महीनों तक लेने से वज़न कम होता है। कटे अंगों, घावों और शरीर के जल जाने पर शहद लगाने से फ़ायदा होता है। शहद के एंटीबैक्टिरियल गुणों को आधुनिक विज्ञान भी मानता है। खाँसी, जुक़ाम और नज़ले में शहद का उपयोग लगभग हर भारतीय घर में होता है। आदिवासी सिरदर्द दूर करने के लिए शहद के साथ चूना मिलाकर माथे पर लगाते हैं।

छह प्रकार के शहद हैं पातालकोट में
पातालकोट के आदिवासी अपने इलाके से छह प्रकार का शहद इकठ्ठा करते हैं। इनमें से पलसा शहद मुख्य है जिसे मधुमक्खियाँ पलास के पेड़ पर तैयार करती हैं। एक छत्ते से कम से कम पंद्रह किलो शहद मिल जाता है।

तेंदवा शहद तेंदू के पेड़ पर लगे छाते से निकाला जाता है। इसके अलावा करंज के पेड़ से प्राप्त हुआ करंजा शहद, नीम या कड़व शहद नीम के पेड़ से मिलता है। बबूलई शहद बबूल के पेड़ से और पहाड़ी शहद (चटटानो से) प्राप्त होता है। शहद निकालना और उसको बेचना इन आदिवासियों के जीवन यापन का साधन ही नहीं बल्कि उनकी जीवन शैली भी है। शहद के बनने से लेकर उसके निकाले जाने तक बहुत से पारंपरिक समारोह किये जाते हैं। जब शहद का मौसम शुरू होता है तो पहली बार जंगलों में प्रवेश करने से पहले उसकी पूजा की जाती है।अगर एक ही पेड़ पर मधुमक्खियों के कई छत्ते हैं या कोई पेड़ किसी पवित्र स्थान पर है तो उसके लिए विशेष पूजा-पाठ की जाती है। यह पूजा कबीले के किसी बुज़ुर्ग द्वारा करवाई जाती है। पूजा में पूर्वजों और जंगल में मान्य देवी देवताओं का आहवान किया जाता है। उनसे अपनी सुरक्षा और आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करते हैं। मधुमक्खियों के छत्तों से शहद निकाने के लिए उनसे भी माफी मांगी जाती है। जब शहद निकालने का काम पूरा हो जाता है तो मधुमक्खियों को धन्यवाद दिया जाता है और प्रार्थना की जाती है कि अगले वर्ष भी वह इसी जंगल में आकर अपना शहद बनाएँ (डॉ. दीपक आचार्य,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल तृतीयांक 2012)

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