शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

हार्ट अटैकःपहचानें लक्षण को और बचें पल भर की भी देरी से

फिल्मों में हार्ट अटैक का दृश्य पूरे ड्रामे के साथ दिखाया जाता है, व्यक्ति को दिल में दर्द होता है, वो छाती पर हाथ रखकर कुछ देर कराहता है और फिर नीचे गिर जाता है। ज़रुरी नहीं कि हर किसी को हार्ट अटैक फिल्मों के ड्रामाभरे अंदाज़ में आए। इसलिए हार्ट अटैक के सही लक्षणों के बारे में जानना ज़रुरी है, ताकि असल ज़िंदगी में आए हार्ट अटैक को समय रहते पहचाना जा सके।
शरीर की सभी अन्य मांसपेशियों की तरह हृदय को भी ठीक से काम करने के लिए खून की ज़रुरत होती है। हृदय रक्त वाहिकाओं और धमनियों के ज़रिए पूरे शरीर में रक्त पंप करता है। इसी तरह हृदय तक रक्त पहुँचाने का काम कोरोनरी धमनियाँ करती हैं। यदि कोरोनरी धमनी प्लाक बनने के कारण अवरुद्घ हो जाएँ तो इससे हार्ट अटैक आ सकता है।
यह कई कारणों से हो सकता हैः
 -अधिक वज़न।
 -शारीरिक श्रम की कमी।
 -अधिक वसा व कोलेस्ट्रॉलयुक्त खाना।
 -तनाव एवं धूम्रपान। अधिक शराब पीना।
 -परिवार के अन्य सदस्यों को हार्ट अटैक की समस्या।

ये कुछ ऐसे कारण हैं, जो प्लाक बनने की प्रक्रिया यानी आर्थेरोस्क्लेरॉसिस को बढ़ावा देते हैं। धीरे-धीरे जमा हो रहे इस प्लाक के कारण अंततः धमनी अवरुद्घ हो जाती है, नतीजा होता है हार्ट अटैक। धमनी के अवरुद्घ होते ही हृदय तक खून की आपूर्ति बंद हो जाती है।

हार्ट अटैक आने पर आमतौर पर ये लक्षण सामने आते हैं- 
 -पसीना आना एवं साँस फूलना।
 -छाती में दर्द होना एवं सीने में ऐंठन होना।
 -हाथों, कंधों, कमर या जबड़े में दर्द होना।
 -मितली आना, उल्टी होना।

 महिलाओं में हार्ट अटैक आने पर कुछ अन्य लक्षण भी देखे जा सकते हैं। त्वचा पर चिपचिपाहट, उनींदापन, सीने में जलन महसूस होना और असामान्य रूप से थकान इसमें शामिल है।

हार्ट अटैक कई लोगों के लिए मृत्यु का कारण बनता है। इससे मरने वाले करीब एक तिहाई मरीज़ों को तो यह पता ही नहीं होता कि वे हृदय रोगी हैं और अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। इसके लिए ज़िम्मेदार एक बड़ा कारण यह है कि पहले आए हार्ट अटैक को मरीज़ ने पहचाना ही न हो। ऐसा हार्ट अटैक,जिसके लक्षण अस्पष्ट हों या जिनका पता ही न चले,उसे साइलेंट हार्ट अटैक कहते हैं(डा. ए के पंचोलिया,सेहत,नई दुनिया अक्टूबर प्रथमांक 2011)।

"साइलेंट" हार्ट अटैक 
कभी-कभी लोगों को हार्ट अटैक होता है और उन्हें इसका पता भी नहीं चलता। हार्ट अटैक के लक्षण दिखाई नहीं देना, मरीज़ द्वारा लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर देना या फिर इन्हें समझ ही न पाना साइलेंट हार्ट अटैक के कारण हैं। हार्ट अटैक से उबरने के लिए अवरुद्घ रक्त प्रवाह को जल्द से जल्द शुरु करना सबसे ज़्यादा ज़रुरी है। चूँकि साइलेंट हार्ट अटैक में मरीज़ या उसके परिजनों को इसका पता ही नहीं चल पाता, इसलिए उन्हें उबरने का कोई मौका भी नहीं मिलता। यही कारण है कि साइलेंटहार्ट अटैक ज़्यादा घातक होते हैं। हृदय तक रक्त की आपूर्ति कुछ देर के लिए बंद हो जाए तो मरीज़ को सीने में दर्द या एंजाइना की तकलीफ होती है। यह असल में एक चेतावनी की तरह होता है, जो इस ओर इशारा करता है कि स्थिति सामान्य नहीं है।

यहाँ पर भी ध्यान न दें तो स्थिति को बद से बदतर होते देर नहीं लगेगी। एंजाइना का लक्षण होता है सीने में दर्द उठना, लेकिन कई मरीज़ों को इसका पता ही नहीं चल पाता यानी उन्हें साइलेंट एंजाइना हो जाता है। यह आगे चलकर साइलेंट हार्ट अटैक का कारण बनता है। हार्ट अटैक के लक्षणों को कभी-कभी मरीज़ समझ ही नहीं पाता। इन लक्षणों को वो एसिडिटी, थकान, तनाव, घबराहट या ऐंठन जैसी छुटपुट समस्या समझ बैठता है और परिजनों या चिकित्सक को बताना उचित नहीं समझता। उसे लगता है कि थोड़ी देर में दर्द अपने आप ही कम हो जाएगा, लेकिन यह दर्द जानलेवा हो जाएगा, यह तथ्य उनके ज्ञान से परे होता है।

हार्ट अटैक के सभी मामलों में से २५ फीसद साइलेंट हार्ट अटैक के होते हैं। फिल्मों और टी.वी. पर दिखाए गए हार्ट अटैक के दृश्यों का लोगों पर प्रभाव इसके लिए ज़िम्मेदार कारणों में से है। साइलेंट हार्ट अटैक से मरीज़ की मौत तो हो ही सकती है, साथ ही इससे पुरुषों में डिमिंशिया का खतरा भी बढ़ जाता है। इसीलिए हार्ट अटैक के लक्षणों के बारे में जानना और महसूस होने पर इन्हें समझना बहुत ज़रुरी है। कोई भी लक्षण महसूस होने पर, चाहे वो हल्का ही क्यों न हो और कुछ ही समय के लिए हो, तुरंत चिकित्सकीय मदद के लिए संपर्क करें। इन्हें करना नज़रअंदाज़ जानलेवा हो सकता है। सही समय पर हुई मदद जीवन और मौत के फासले को बढ़ा सकती है।

दिल के दौरे में खून की जांच 
दिल का दौरा सुनते ही आँखों के सामने ज़्यादातर दर्द से तड़पते, पसीने से तरबतर हाँफते-घबराते व्यक्ति की तस्वीर आती है। ऐसी स्थिति में मरीज़ को तुरंत चिकित्सकीय देखरेख की आवश्यकता होती है। चिकित्सक सबसे पहले आवश्यक जाँच करते हैं और ई.सी.जी. व संभव हो तो ईको की जाँच भी करते हैं। इसके आधार पर वे तुरंत ही निदान करते हैं कि मरीज़ को दिल का दौरा पड़ा है या नहीं?

मरीज़ों में दिल के दौरे का निदान ज़्यादातर इन्हीं दो जाँचों के आधार पर किया जाता है। कभी-कभी इन जाँचों के लिए मशीन या इनके संचालन के लिए कुशल चिकित्सक के अभाव में दिल के दौरे का इलाज शुरू कर दिया जाता है। खून की जाँच से भी इस बात का पता लगाया जा सकता है कि व्यक्ति को दिल का दौरा वास्तव में पड़ा था या नहीं?

कभी-कभी व्यक्ति को पहले से दौरा पड़ा रहता है या उसके कार्डियोग्राम में एलबीबीबी नामक जन्मजात खराबी होती है। हो सकता है कि ऑपरेशन के दौरान मरीज़ को दिल का दौरा पड़ा हो या मरीज़ की दिमागी हालत ऐसी न हो कि वह बता सके कि उसे पहले भी कभी इस तरह की तक़लीफ हुई थी या नहीं? ऐसी स्थितियों में खून की जांच काफी मददगार सिद्घ हो सकती है।

अगर दिल का दौरा बहुत हल्का हो या पहले पूरी तरह बंद नस तुरंत इलाज़ मिलने पर खुल गई हो तोऐसे में ईसीजी व ईको की जांच का नतीज़ा नार्मल आ सकता है। सीपीकेएमबी और ट्रॉप-1 दो ऐसी जांचें हैं जो दिल के दौरे के 100 फीसदी निदान में मददगार होती हैं। अस्पताल में इन जांचों की सुविधा न हो तो खून को संबंधित लैब में भेजकर निदान किया जा सकता है ताकि दिल के दौरे का वास्तविक रूप से पता लगाया जा सके। सही निदान इसलिए ज़रूरी होता है ताकि दिल के दौरे का इलाज़ एक निश्चित पैटर्न पर किया जा सके तथा भविष्य के लिए सलाह दी जा सके(डा. मनीष वंदिष्टे,सेहत,नई दुनिया,अक्टूबर प्रथमांक 2011)।

किसी भी बीमारी में अगर वक्त पर सही इलाज मुहैया हो जाए तो मरीज की जिंदगी बचने के चांस काफी बढ़ जाते हैं। हार्ट अटैक के मामले में यह और भी जरूरी हो जाता है क्योंकि यहां कई बार कुछ मिनटों की देरी भी भारी पड़ जाती है। इसलिए,आइए अब जानते हैं कि हार्ट अटैक के लक्षण होने पर क्या करना चाहिएः

घरेलू इलाज की बजाय हॉस्पिटल पहुंचें 
जब किसी मरीज को चेस्ट पेन होता है, तो उसे अमूमन यह यकीन नहीं होता कि इसकी वजह हार्ट अटैक हो सकती है। वह समझता है कि यह दर्द किसी दूसरी वजह मसलन, एसिडिटी, गैस, मांसपेशियों में खिंचाव, नर्व्स में चुभन वगैरह से हो रहा है। ज्यादातर मरीज इस तरह के लक्षणों में घरेलू इलाज को तरजीह देते हैं और उससे बेहतर होने की उम्मीद भी बांधे रहते हैं। ऐसा देखा गया है कि एक आम आदमी ऐसी स्थितियों में हमेशा हॉस्पिटल जाने से बचता है और इस तरह देरी बढ़ती जाती है। यह गलत है। 

जब किसी को हार्ट अटैक आए, तो उसे फौरन हॉस्पिटल पहुंचाना चाहिए ताकि उसे जल्द-से-जल्द अटैक से रिकवर करने में मदद मिले। सबसे बेहतर नतीजे अटैक के दो घंटे के भीतर ट्रीटमेंट मिलने पर पाए जा सकते हैं जबकि पेशंट अमूमन घर पर रहकर या घरेलू इलाजों में इस समय को गंवा देता है। हम सलाह देते हैं कि पेशंट घरेलू इलाजों में समय बर्बाद न करें, न ही इसके लक्षणों को नजरअंदाज करें और जल्द-से-जल्द मेडिकल हेल्प लें। 

डॉक्टरों की खोजबीन में समय नष्ट न करें 
अटैक के बाद पेशंट का एंजियोग्राम कराया जाता है। अगर उसके नतीजे बताते हैं कि उसकी एक या एक से ज्यादा धमनियों में ब्लॉकेज है तो डॉक्टर सलाह देते हैं कि उसे सर्जरी करा लेनी चाहिए। लेकिन पेशंट डॉक्टर की सलाह पर अमल करने की बजाय दूसरे डॉक्टरों के चक्कर काटना शुरू कर देते हैं, ताकि वे सर्जरी से बच सकें। इस बीच उनका काफी समय बर्बाद हो जाता है, जो उनके लिए घातक भी साबित हो सकता है। 
केस स्टडी 
ऐसे ही एक पेशंट थे गंगाराम। उम्र 55 साल, पेशे से सरकारी कर्मचारी। उन्हें एंजाइना (आर्टरी में रुकावट या सिकुड़न से दिल में तेज दर्द) था। उनकी एंजियोग्राफी हुई, जिससे पता चला कि उनकी दो धमनियों में ब्लॉकेज है। उन्हें सलाह दी गई कि आप जल्द-से-जल्द बाईपास सर्जरी कराएं, लेकिन उन्होंने इसकी बजाय दूसरे कार्डियोलॉजिस्ट को तलाशना बेहतर समझा। इसमें उनके करीब पांच दिन बेकार हो गए और हॉस्पिटल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई। गंगाराम के साथ जो हुआ, उससे यह बात साफ होती है कि डॉक्टर की सलाह को हमेशा गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि यह जिंदगी और मौत का सवाल है। हार्ट अटैक जैसी स्थितियां ऐसी होती हैं, जिनमें डॉक्टर की सलाह को दरकिनार कर बिला वजह दूसरे डॉक्टरों की खोजबीन में समय गंवाना महंगा पड़ सकता है। 

पेशंट की कंडिशन से तय होगा ट्रीटमेंट 
एक आम आदमी का कार्डियोलॉजिस्ट से हमेशा यह सवाल होता है कि वह बाईपास सर्जरी कराए या स्टेंट डलवाए और इसके लिए वह एक हॉस्पिटल से दूसरे हॉस्पिटल अपनी रिपोर्ट लेकर चक्कर काटता है। बाईपास सर्जरी में खून के बहाव का रास्ता नए चैनल के जरिए बदल दिया जाता है, जिससे धमनियों के ब्लॉकेज बाईपास हो जाते हैं। स्टेंट ब्लॉकेज को खेलने में मदद करते हैं। पेशंट की कंडिशन देखने के बाद डॉक्टर राय देते हैं कि उसके लिए क्या मुफीद होगा। खुद जिद न करें कि बाईपास करवाएं या स्टेंट डलवाएंगे। 

ब्लॉकेज खोलने के सर्जरी से अलग तरीके 
ब्लॉकेज खोलने के सर्जरी से अलग तरीके हैं : थ्रॉम्बोलेटिक, बलून एंजियोप्लास्टी और स्टेंट। थ्रॉम्बोलेटिक सिर्फ हार्ट अटैक आने के छह घंटे के भीतर दिया जा सकता है, वह भी डॉक्टर की सलाह पर। इससे बेहतर बलून एंजियोप्लास्टी हॉस्पिटल के कैथ-लैब में होती है, जिसमें बलून प्रॉसेस से ब्लॉकेज को खोला जाता है। लेकिन स्टेंट टेक्नॉलजी इसी बलून प्रॉसेस को और भी कारगर तरीके से अंजाम देती है। 
स्टेंट, एक मेटल के छल्ले के आकार का होता है, जो बॉलपॉइंट पेन की स्प्रिंग जैसा दिखता है। यह शरीर में बाहरी तत्व की तरह काम कर सकता है, जिससे ब्लॉकेज के फिर से बनने का डर बना रहता है। इसीलिए कुछ स्टेंट्स को दवा का लेप लगा कर तैयार किया जाता है, जिससे ब्लॉकेज बनने के चांस कम हो जाते हैं। इन्हें ड्रग कोटेड स्टेंट कहा जाता है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि महंगे स्टेंट ज्यादा कारगर होंगे लेकिन यह सच नहीं है। बेयर-मेटल स्टेंट, ड्रग कोटेड स्टेंट के मुकाबले काफी सस्ते हैं। यह कहना मुश्किल है कि कौन-सा स्टेंट किस पेशंट के लिए सही है। डॉक्टर इसका फैसला करने के लिए अपनी जानकारी और अनुभव का इस्तेमाल करते हैं। अलग-अलग डॉक्टर की राय इसमें अलग-अलग हो सकती है। आमतौर पर ड्रग-कोटेड स्टेंट, बेयर-मेटल स्टेंट से बेहतर होता है। 
केस स्टडी 
इसके इस्तेमाल को आप इस उदाहरण से समझें। 74 साल के गोविंद घुटने की सर्जरी से काफी परेशान थे। एक सामान्य मेडिकल टेस्ट के बाद उन्हें पता चला कि उनकी एक आर्टरी में ब्लॉकेज हो चुका है। डॉक्टरों ने उन्हें बेयर-मेटल अनवेटेड स्टेंट इस्तेमाल करने की सलाह दी, क्योंकि इससे उन्हें एक साल तक खून पतला करने वाली दवा की जरूरत नहीं पड़ती। बेयर मेटल स्टेंट के इस्तेमाल से गोविंद को एंजियोप्लास्टी करवाने के बाद घुटने की रिप्लेसमेंट सर्जरी करानी पड़ी और यह ड्रग-कोटेड स्टेंट के इस्तेमाल के दौरान मुमकिन नहीं है।  

बाईपास सर्जरी के बाद स्टेंटिंग 
ज्यादातर मरीज सोचते हैं कि बाईपास सर्जरी ब्लॉकेज को ट्रीट करने का आखिरी ऑप्शन है और उसके आगे कुछ भी नहीं है। वे यह भी मानते हैं कि स्टेंटिंग टेम्पररी प्रॉसेस है और यह सिर्फ वक्ती तौर पर काम करता है। पर यह सच नहीं है। अगर इन पद्धतियों का इस्तेमाल सही तरीके से सही पेशंट में किया जाए तो इसकी सफलता का प्रतिशत 90 तक हो सकता है। स्टेंटिंग की जरूरत बाईपास सर्जरी के बाद बार-बार आने वाले ब्लॉकेज को खोलने के लिए पड़ सकती है। 
इसी तरह बाईपास सर्जरी की जरूरत स्टेंटिंग प्रोसेस के बाद भी पड़ सकती है। इसलिए न तो स्टेंटिंग प्रोसेस और न ही बाईपास सर्जरी, अपने आप में आखिरी ऑप्शन है। 

जानकारी के लिए 
जिन हॉस्पिटल में बाईपास सर्जरी और एंजियोप्लास्टी की सुविधा उपलब्ध है, वहां डॉक्टर सबसे बेहतर विकल्प बताने की स्थिति में होते हैं। आमतौर पर हम पेशंट के लिए प्रॉपर थेरेपी ही रिकमेंड करते हैं। 
ऐसी मान्यता है कि अगर डॉक्टर बाइपास सर्जन हैं तो वे बाईपास सर्जरी के लिए ही रिकमेंड करेंगे। जबकि एक कार्डियोलॉजिस्ट उसे स्टेंट से ठीक करने की कोशिश करेगा। एक ही हॉस्पिटल के दोनों डॉक्टरों की टीम से बात करने के बाद ही पेशंट नतीजा निकाल सकता है कि उसके लिए बेहतर इलाज क्या है। 
डायबीटीज और कमजोर हार्ट पंप के मरीज की अगर तीनों आर्टरी या मेन आर्टरी में ब्लॉकेज है तो उन्हें बाईपास सर्जरी के लिए भेजा जाता है। 
हार्ट अटैक होने पर मरीज को फौरन हॉस्पिटल पहुंचाना चाहिए। सबसे बेहतर नतीजे अटैक के दो घंटे के भीतर ट्रीटमेंट मिलने पर पाए जा सकते हैं। 

हाइब्रिड सर्जरी या कम्बाइंड सर्जरी 
कुछ पेशंट्स में किसी भी एक प्रोसेस को रिकमेंड करना मुश्किल हो जाता है। उनकी आर्टरी चैनल के ब्लॉकेज के इलाज के लिए बाइपास सर्जरी ज्यादा अच्छी होती है, वहीं ब्लॉकेज में वेंस लगाने की बजाय ड्रग कोटेड स्टेंट लगाना ज्यादा अच्छा होता है। इन पेशंट्स की कंडिशन के बारे में काफी सोच-विचार के बाद दोनों ही प्रोसेस का मेल करते हुए हाइब्रिड सर्जरी या कम्बाइंड प्रोसेस करना सही होता है। विदेशी मुल्कों में यह काफी प्रचलित है, लेकिन भारत में इस पद्धति को अभी कम अपनाया गया है क्योंकि यह बाईपास सर्जरी से डेढ़ गुना ज्यादा महंगा पड़ता है। ऐसे में ज्यादातर एक ही प्रोसेस का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इस प्रोसेस का सही इस्तेमाल करने से किसी एक किस्म के प्रोसेस से बेहतर नतीजे आते हैं। 
केस स्टडी 
मिसेज खन्ना 83 साल की हेल्थी महिला हैं। उनको एंजाइना है। उनके परिवार में डॉक्टर भी हैं। एंजियोग्राफी में पता चला कि मेन आर्टरी में केल्सीफाइड ब्लॉकेज है और बाकी की दो आर्टरी में सॉफ्टर ब्लॉकेज हैं। मिसेज खन्ना के लिए बाईपास सर्जरी मुश्किल है क्योंकि उनकी उम्र ज्यादा है। उनकी हाइब्रिड सर्जरी हुई है, जिसमें मेन आर्टरी के लिए बाईपास सर्जरी हुई थी और बाकी दो आर्टरी में स्टेंट डाले गए थे। उन्होंने बहुत जल्द रिकवर कर लिया। 
एक और पेशंट हैं 45 साल के फार्मेसिस्ट। उन्हें सीने में दर्द होने पर हॉस्पिटल लाया गया था। उनको हार्ट अटैक हुआ था। एंजियोग्राफी में वह इस नतीजे पर पहुंचे कि हार्ट अटैक की वजह राइट मेन आर्टरी है और लेफ्ट आर्टरी के ब्लॉकेज की वजह भी वही है । ऐसे पेशंट के लिए बाईपास सर्जरी में बहुत रिस्क है। स्टेंटिंग प्रॉसिजर लेफ्ट आर्टरी के लिए ठीक नहीं है। इसलिए उनकी हाइब्रिड सर्जरी हुई, जिसमें राइट आर्टरी में एंजियोप्लास्टी और लेफ्ट आर्टरी में बाइपास हुआ था। इससे नतीजा निकला कि स्टेंटिंग प्रॉसिजर बाईपास सर्जरी का रिस्क कम कर देती है और हाइब्रिड सर्जरी को एक कामयाब सर्जरी बनाता है(डॉ.विनय बी.सांघी,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,9.10.11)।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उपयोगी जानकारी दी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहतरीन जानकारी से भरी पोस्ट . मैं यह पोस्ट फेसबुक पर शेयर कर रही हूँ .

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया जानकारी दी है !
    आभार ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज के चरेचा मंच पर भी इस प्रविष्टी की चर्चा की गई है!
    --
    http://charchamanch.blogspot.com/2011/10/669.html

    उत्तर देंहटाएं

एक से अधिक ब्लॉगों के स्वामी कृपया अपनी नई पोस्ट का लिंक छोड़ें।