शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

आँखों को नज़र न लगने दें

अनमोल आंखों के लिए थोड़ी सावधानी और थोड़ी देखभाल बहुत जरूरी है। आखिर आंखें हैं तो दुनिया की तमाम खूबसूरती का हमारे लिए मायने है। आंखें हमारे लिए अनमोल हैं और इसके बिना हम इस खूबसूरत दुनिया को नहीं देख सकते। यह जानते हुए भी अक्सर हम आंखों के स्वास्थ्य के बारे में बहुत गंभीरता से नहीं सोचते। आंखों को लेकर कई तरह के सवाल होते हैं पर हम उनको अनदेखा करते हैं। क्या हमको पढ़ने में परेशानी होती है? क्या हमारी आंखों की बीमारी को किसी दवा, शल्य क्रिया (सर्जरी) या कसरत से ठीक नहीं किया जा सकता? क्या चश्मा लगाने के बाद भी नजर में सुधार नहीं हो पाता? क्या छोटे अक्षर पढ़ने में तकलीफ महसूस होती है? 

हर 20 में से एक भारतीय इस तरह की समस्या से पीड़ित है। जिस तरह दिन और रात के बीच शाम होती है, वैसे ही आंशिक दृष्टिहीनों की नजर सामान्य से तो कमजोर होती है, पर उन्हें थोड़ा तो दिखता ही है। वे पूरी तरह से दृष्टिवान नहीं होते। फिर भी, ऐसा मानकर कि कुछ नहीं हो सकता, सामान्यत: ऐसी नजर वाले व्यक्तियों से दृष्टिहीनों की तरह ही व्यवहार किया जाता है। 

जानकारी व मार्गदर्शन 
सच्चाई यह है कि उचित सुविधाओं व मार्गदर्शन से अल्प दृष्टिवान भी अपने बूते पर स्वतंत्र रूप से कार्य करते हुए सामान्य, सार्थक जीवन जी सकते हैं। आंखों की बीमारियों में परदे की बीमारियां- मेक्यूलर डिजनरेशन, डायेबिटिक रेटिनोपेथी आदि प्रमुख हैं। मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद साफ न दिखना, आंखों की नस सूखना (ऑप्टिक एस्ट्रोफी), अत्यधिक निकट दृष्टि (हाईमायोफिया), जन्मजात छोटी आंख, (माइक्रोप्थेल्मोस या कॉलोबॉम) या अन्य अनुवांशिक विकार शामिल हैं। अल्प दृष्टि पुनर्वास विशेषज्ञ डॉ. स्मिता मेहता कहती हैं, अल्पदृष्टि पुनर्वास का मतलब है उपलब्ध दृष्टि का सर्वोत्तम और अधिकतम उपयोग। नजर का सही और आसान तरीके से अधिकतम उपयोग करना सिखाने के लिए दृष्टि प्रशिक्षण (नजर के व्यायाम) एवं विशेष दृष्टि सहायक उपकरणों की मदद ली जाती है। 

कमजोर नजर वाले 
कमजोर नजर वाले व्यक्ति न सिर्फ आसानी से किताब या अखबार पढ़ सकते हैं, बल्कि अन्य कई कार्य भी आसानी से कर सकते हैं, जैसे.. पत्र या बहीखाते लिखना, कम्प्यूटर पर कार्य करना, टाइपिंग करना, केल्कुलेटर व मोबाइल का उपयोग करना, ब्लैक बोर्ड, नोटिस बोर्ड, साइन बोर्ड पढ़ना, ग्राफ, नक्शे, चार्ट बनाना व पढ़ना, चित्र, डिजाइन बनाना, पेंटिंग करना, यांत्रिक एवं तकनीकी कार्य करना आदि। 

नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. अनिता अग्रवाल कहती हैं- किताबें, कंप्यूटर, लैपटॉप, सेलफोन, धूल-मिट्टी, तनाव, यह सब धीरे-धीरे हमारी आंखों के दुश्मन बनते जा रहे हैं। इसी तरह कम्प्यूटर मॉनीटर से निकलने वाली किरणें हमारी आंखों पर काफी बुरा प्रभाव डालती है। कम्प्यूटर पर काम करने वालों की आंखों को लगातार मॉनिटर स्क्रीन पर ध्यान रखना होता है। कम्प्यूटर पर काम करने के दौरान जो लोग अपनी आंखों का ध्यान नहीं रखते उन्हें बहुत जल्द चश्मा लग जाता है और जिन लोगों को चश्मा लगा होता है उनके नंबर बढ़ जाते हैं या आंखों संबंधी कई अन्य समस्याएं उन्हें घेर लेती हैं। ऐसे में आंखों की सुरक्षा के लिए सावधानी बरतनी चाहिए। 
लगातार कंप्यूटर आदि पर काम करने से आंखों के रेटिना पर भारी दवाब पड़ता है जिससे छोटी-छोटी नाजुक शिराएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इससे खून का दौरा बाधित हो नुकसान पहुंचाता है और मजे की बात यह कि इतना सब घट रहा होता है पर पता नहीं चलता। डॉक्टरों का कहना है कि लोग काम में ड़ूब कर पलकें झपकाना ही भूल जाते हैं जो कि आंखों की बीमारी का एक बड़ा कारण है। 

बड़ी बीमारी की वजहें 
मधुमेह जैसी बड़ी बीमारी की मुख्य वजह भी आंखें ही हैं। 20 से 70 वर्ष की आयु के मध्य कभी भी मधुमेह अंधेपन का बहुत बड़ा कारण हो सकता है। मधुमेह में हाई ब्लड शुगर का स्तर आंखों की समस्याओं के जोखिम को बढ़ाता है। चश्मे के नम्बर का बार-बार व शीघ्र बदलना अर्थात् नजर कमजोर होना, इसके लक्षण हो सकते हैं। हाई ब्लड शुगर के कारण आंखों के लेंस में सूजन व नजर कमजोर होना भी देखा गया है। जब मधुमेह से रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं तो रेटिना को ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी होने के कारण रक्त के प्रवाह को बनाये रखने वाली सही रक्त वाहिकाओं के निर्माण में गतिरोध आ जाता है। मधुमेह रोगियों की रेटिनोपैथी में आंख को डाईलेट कर जांच की जाती है। रेटिनोपैथी के विस्तार और आयाम को निर्धारित करने के लिए निश्चित रूप से फ्लोरिसन एंजियोग्राम और ऑप्टिकल कोहेरन्स टोमोग्राफी आवश्यक हैं। इनके अनुसार ही इलाज किया जाता है। 

इलाज 
उपचार में सर्जरी व लेजर क्रियाएं शामिल हैं। मधुमेह से पीड़ित लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि रेटिनोपैथी के शुरुआती दौर में लेजर थेरेपी से अंधेपन को 50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। 

रोकथाम 
अपनी आंखों को डायबिटिक रेटिनोपैथी से बचाने के लिए नेत्र चिकित्सक द्वारा नेत्रों की वार्षिक जांच अवश्य कराएं। मधुमेह से पीड़ित महिलाओं को गर्भ धारण करने के बाद तीसरे महीने आंखों की विस्तृत जांच करानी चाहिए और बाद के पूरे गर्भ काल के दौरान भी मधुमेह के साथ-साथ आंखों की समस्या से बचाव के लिए नेत्रों का भी निरीक्षण कराते रहना चाहिए। 

ऐसे बढ़ाएं आंखों की रोशनी 
सूरज की रोशनी से पैदा होने वाली पराबैगनी किरणें भी आखों के लिए नुकसानदायक हैं। इससे मोतियाबिंद हो सकता है। रेटिना को भी इससे नुकसान पहुंच सकता है। जब भी धूप में निकलें चश्मा अवश्य पहनें। चश्मा खरीदते समय यह अवश्य ध्यान दें कि क्या वह पराबैगनी किरणों से आंखों को बचा सकता है। कंप्यूटर पर काम करते समय 15-20 मिनटों के बाद कुछ देर के लिए आंखों को विश्राम जरूर दें। जब भी बाहर से आएं या घर पर भी हों तो साफ पानी से दिन में चार-पांच बार आंखों पर छीटे मारें। ठंड़े पानी की पट्टी रखने से भी बहुत आराम मिलता है। लगातार स्क्रीन की ओर ना देखें। ज्यादा से ज्यादा 10 मिनट में कुछ क्षण के लिए आंखें स्क्रीन से हटा लें। हर दस मिनट में कुछ पल आंखों को बंद रखें। स्क्रीन और आंखों के मध्य कम से कम दो फीट की दूरी अवश्य रखें। स्क्रीन आंखों से एकदम करीब न हो, पर ज्यादा दूर भी न रखें। हरी पत्तेवाली सब्जियां अधिक से अधिक खाएं। गाजर, अंडा, ब्रोकली, ब्रसल्स, कीवी खाएं। प्रतिदिन सुबह नंगे पैर घास पर चलें। इससे आपकी आंखों की रोशनी बहुत तेज होगी। 

एक्सरसाइज भी है जरूरी 
हम शरीर के लिए तो व्यायाम करते हैं, तो आंखों के लिए क्यों नहीं। आइए, थोड़ा व्यायाम करें। एक बड़ी-सी घड़ी की कल्पना करें। फिर आंखें बंद कर उसके हर अंक पर नजर डालें, तीन सेकेंड रुकें, फिर घड़ी के मध्य में आ जाएं। इस तरह सारा चक्कर पूरा कर आंखों पर बिना जरा-सा भी दवाब डाले हथेलियां रख पांच बार घड़ी की दिशा में और पांच बार विपरीत दिशा में आंखें घुमाएं। फिर हाथ हटाकर जल्दी-जल्दी बीस बार पलकें झपकाएं। 

लापरवाही बिल्कुल न बरतें 
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. संजीव लहरी कहते हैं- आंखों की किसी भी समस्या में लापरवाही बिल्कुल न बरतें। थोड़ी सी भी दिक्कत महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। आमतौर पर लोग नजर की रोशनी कम होने पर मोतियाबिंद मानकर उसके पकने का इंतजार करने लगते हैं जबकि वह ग्लूकोमा जैसी कोई और खतरनाक बीमारी भी हो सकती है। इसलिए समय पर ही डॉक्टर के पास चले जाएं ताकि शुरुआती दौर में ही बीमारी पकड़ में आ जाए(डॉ. अनुजा भट्ट,हिंदुस्तान,दिल्ली,12.10.11)।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उपयोगी जानकारी।

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  2. हम आपके द्वारा बताए गए सुझावों पर अमल करके जरुर लाभ उठाएँगे......आभार

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  3. bahut hi badiyaa jaankaari di aapne.bahut bahut shukriyaa aapkaa .aur itane achche lekh ke liye bdhai apko .

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  4. आपकी पोस्ट को आज ब्लोगर्स मीट वीकली(१३)के मंच पर प्रस्तुत की गई है आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /आप हिंदी की सेवा इसी मेहनत और लगन से करते रहें यही कामना है /आपका
    ब्लोगर्स मीट वीकली के मंच पर आपका स्वागत है /जरुर पधारें/आभार /

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