मंगलवार, 7 अगस्त 2012

खानपान की आदत है कोलोरेक्टल कैंसर की जड़

वैसे तो कैंसर के कई प्रकार हैं लेकिन इनके बीच विश्व भर में कोलोरेक्टल कैंसर पुरुषों में तीसरा आम कैंसर (कुल का 10 प्रतिशत यानी 6,63,000 मामले) और महिलाओं में दूसरा आम कैंसर (कुल का 9.4 प्रतिशत यानी 5,71,000 मामले) है। दुनियाभर में कोलोरेक्टल कैंसर के मामलों की दर दोनों लिंगों में 10 गुना तक भिन्न होती है। कोलोरेक्टल कैंसर (सीआरसी) के मामलों की दर अलग-अलग है। दक्षिणी एशियाई देशों में इसके मामले कम है तो विकसित एशियाई देशों में ज्यादा। कोलोरेक्टल कैंसर ज्यादातर आर्थिक रूप से संपन्न देशों जैसे कि जापान, कोरिया और सिंगापुर में तेजी से बढ़ रहे हैं। हालांकि विभर के मुकाबले में भारत में सीआरसी के मामले बहुत कम रजिस्टर हुए हैं लेकिन पिछले कुछ बरसों में पश्चिमी लाइफस्टाइल को अपनाने के कारण भारत में भी इस कैंसर के मामले बढ़ते जा रहे हैं। नई दिल्ली स्थित सर गंगाराम अस्पताल के कीमोथेरेपिस्ट डॉ. श्याम अग्रवाल के मुताबिक, ‘विकसित देशों में कोलोरेक्टल कैंसर के मामलों की दर काफी ज्यादा है, इसकी वजह उनके खानपान की शैली है। रेड मीट, कम फाइबर का आहार और फास्ट फूड के ज्यादा इस्तेमाल से इस कैंसर के मामले ज्यादा दिख रहे हैं। 

उनका मानना है कि भारत में पिछले दो दशकों से सीआरसी के मामले ज्यादा देखने को मिल रहे हैं क्यों कि भारतीय बहुत ज्यादा पश्चिमी देशों के लाइफस्टाइल और खाने की आदतों को अपना रहे हैं। देशभर में मौजूद विभिन्न जनसंख्या ग्रुप और अस्पतालों से एकत्र आंकड़े काफी रोचक और विरोधाभासी हैं। देश के सभी भागों में कैंसर के मामलों में रेक्टम (बड़ी आंत का भाग जो गुदा को जो ड़ता है) के केस कोलन कैंसर से ज्यादा है। कोलोरेक्टल कैंसर महिलाओं में भी तेजी से फैल रहा है। वि स्तर पर सबसे आम कैंसर की सूची में 15 बरसों के भीतर मामलों की बढ़ोतरी के चलते 49 प्रतिशत बढ़कर यह 1990 में दूसरे स्थान पर आ गया है जबकि 1975 में यह चौथे स्थान पर था। रेक्टल कैंसर के मामले भारत के ग्रामीण इलाकों में ज्यादा देखने को मिल रहे हैं हालांकि देशभर में कोलोरेक्टल कैंसर के मामले सीमित हैं। इसके विपरीत, पेट के कैंसर और पित्ताशय में कैंसर के मामलों के दर में उत्तर-दक्षिण भारत में काफी अंतर है। तकरीबन 6 प्रतिशत सीआरसी आनुवांशिक कारणों से होता है तो तकरीबन दो तिहाई मामलों में लाइफ स्टाइल और खाने की आदतें शामिल हैं। परिवार का परिवेश और लाइफस्टाइल भी आनुवांशिक तौर पर कोलोरेक्टल कैंसर होने में भूमिका निभाते हैं। हालांकि सीआरसी के निर्माण में जीन के परिवेश की भूमिका पर अध्ययन करने की जरूरत है। डॉ. अग्रवाल के अनुसार, ‘तथ्यों से यह सामने आया है कि यूके और यूएसए के भारतीय अप्रवासियों में सीआरसी के मामले ज्यादा देखने को मिल रहे हैं जो चिंता का विषय है। दरअसल, लाइफस्टाइल और खानपान की आदतें सीआरसी होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इसका मतलब यह है कि भारत में कम आय से मध्यम आय की अर्थव्यवस्था में सीआरसी के मामले बढ़ेंगे।‘‘



विभिन्न अध्ययनों द्वारा रेड मीट की खपत और कोलोरेक्टल कैंसर के बीच का संबंध जानने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ-साथ विशेषज्ञ यह भी खोज रहे हैं कि डाइट में सब्जियों और फलों का सेवन कोलोरेक्टल कैंसर को रोकने में प्रभावी है। कोलोरेक्टल कैंसर बड़ी आंत के भीतर होने वाला घातक ट्यूमर है। कोलन पॉलिप और कैंसर की शुरुआत में किसी भी तरह के लक्षण नजर नहीं आते। इसलिए नियमित तौर पर स्क्रीनिंग कराना महत्वपूर्ण है। कोलोरेक्टल कैंसर का इलाज उसके आकार, जगह और फैलने पर निर्भर करता है। इसके साथ-साथ मरीज की सेहत और उम्र का भी ध्यान रखा जाता है। वैसे सर्जरी ही कोलोरेक्टल कैंसर का आम इलाज है। हमारे जैसे देश में, जहां आबादी बहुत ज्यादा है, वहां रेक्टल कैंसर के मामले हालांकि कम हैं, बावजूद इसके इलाज में देरी या फिर एक जगह से दूसरी जगह रेफर करने से बीमारी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इसके अलावा, देश में इलाज की पद्धतियों में भी भारी कमी है। वैसे तो सर्जरी ही इसका इलाज है, इसके साथ-साथ एडवांस स्टेज में रेडियोथेरेपी और कीमियोथेरेपी भी अहम भूमिका निभाते हैं। आधुनिक और विकसित तौर-तरीकों से बीमारी के इलाज में बेहतरीन सुधार हुये हैं(आधी दुनिया,राष्ट्रीय सहारा)।

13 टिप्‍पणियां:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

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  2. "भय से ही त्यागें 'मांसाहार'... भयमुक्त होगा हर जीव का परिवार."


    परोक्ष रूप से 'निरामिष' का प्रचार करती पोस्ट... साधुवाद.

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  3. जानकारी युक्त सचेत करती पोस्ट....
    सादर आभार।

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  4. बढ़िया जानकारी,आम तौर पर हम जानते नहीं.
    ...आभार इस पोस्ट के लिए.

    सादर
    अनु

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  5. वाकई फाईबर रहित होने से मांसाहार आंतो सम्बंधी कई रोगों का प्रेरक है।
    फाईबर के लिए शाकाहारी पदार्थों पर निर्भर रहें और आशंकाएं टालें।

    प्रतुल जी से पूर्णतः सहमत और आपको साधुवाद!!

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  6. मीट-मटन को त्याग कर,खायें शब्जी करे फलाहार
    भय मुक्त हमेशा रहेगा जीवन,आये न कोई विकार,,,,,

    RECENT POST...: जिन्दगी,,,,

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  7. बड़ी आंत के सबसे लम्बे भाग (बृहद अंत्र यानी कोलन ) और मलद्वार दोनों से ताल्लुक रखने वाले कोलोरेक्टल-कैंसर के सर्वाधिक मामले इंग्लैण्ड में है जिसकी बड़ी वजह वहां रेड मीट का ज्यादा सेवन बना हुआ है . सींक कबाब ,शामी कबाब लज़ीज़ है लेकिन किस कीमत पर ?

    ram ram bhai

    मंगलवार, 7 अगस्त 2012

    भौतिक और भावजगत(मनो -शरीर ) की सेहत भी जुडी है आपकी रीढ़ से

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  8. अच्छी जानकारी ....जीवन में हर चीज सम्यक होनी चाहिए ....
    खान पान का बड़ा महत्व है ज्यादातर बीमारियाँ इसीसे जुडी हुई है !

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  9. आपने सही कहा आज खानपान का कम और कमाई का ज्‍यादा ध्‍यान है और यही हमारी सबसे बडी समस्‍या है पर जान लेना चाहिये पैसा अल्‍प समय ओर शरीर जरूरी है

    आपको जन्‍माष्‍टमी की शुभकामनाये

    यूनिक तकनीकी ब्लाग

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  10. Achhi jankari deta, aur bimariyon se savdhan karta gyan purna lekh

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  11. बहुत उम्दा जानकारी. रहन सहन और खान पांन आधी से ज्यादा बीमारियों के लिये जिम्मेदार है. यह बात जितनी जल्दी समझ ली जाय, उतना ही अच्छा है.

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  12. राधारमण जी नमस्कार...
    आपके ब्लॉग 'स्वास्थ्य सबके लिए' से लेख भास्कर भूमि में प्रकाशित किए जा रहे है। आज 9 अगस्त को 'खानपान की आदत है कोलोरेक्टल कैंसर की जड़' शीर्षक के लेख को प्रकाशित किया गया है। इसे पढऩे के लिए bhaskarbhumi.com में जाकर ई पेपर में पेज नं. 8 ब्लॉगरी में देख सकते है।
    धन्यवाद
    फीचर प्रभारी
    नीति श्रीवास्तव

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  13. साइंस ब्लोगर्स पर आपकी टिपण्णी का शुक्रिया हमारे लिए विशेष मानी हैं आपकी टिप्पणियों के ....कृपया यहाँ भी पधारें -
    शनिवार, 11 अगस्त 2012
    कंधों , बाजू और हाथों की तकलीफों के लिए भी है का -इरो -प्रेक्टिक
    veerubhai1947.blogspot.com

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