मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

प्रौढावस्था में रहें सतर्क

प्रौढ़ावस्था की शुरुआत से ही कई समस्याएँ शुरू हो जाती हैं। कई शारीरिक समस्याएँ इतनी तेजी से और चुपचाप हमला करती हैं कि मनुष्य को संभलने का मौका ही नहीं मिलता। कुछ अंदर ही अंदर शरीर को खोखला करती रहती हैं और उनका असर देर से सामने आता है। बीमारी के आने से पहले ही सतर्कता रखने में ही समझदारी है। हर साल पूरे शरीर की भी जाँचें और परीक्षण करा लें। खानपान की आदतें बदलें और अनुशासन तथा संयम के रहना सीखें। खुद की फिटनेस के प्रति स्वार्थी हो जाएँ। 

वैसे तो अपनी सेहत के प्रति सभी को सदैव जागरूक रहना चाहिए, परंतु फिर भी उम्र का चालीसवाँ पड़ाव इस मामले में जागने का सबसे जरूरी व उचित समय है। इस आयु में जहाँ व्यक्ति अपने करियर व गृहस्थी के मामले में सेटल होने लगता है, वहीं कार्य का दबाव बच्चों के भविष्य की चिंता, जीवन में स्थायित्व लाने का तनाव आदि उसके स्वास्थ्य के लिए "स्ट्रेस" का काम करते हैं, साथ ही शरीर युवावस्था की सक्रियता व ऊर्जा से वंचित होने लगता है। विभिन्ना शारीरिक क्रियाएँ व मांसपेशियों की मजबूती कम होने लगती है। अतः इस अवस्था के आने के पहले ही जागना जरूरी है। याद रखें यदि आपके स्वास्थ्य में सेंध लग गई तो आप न केवल उस परिवार पर बोझ बन जाएँगे जो आप पर निर्भर है बल्कि आप उस आराम और सुकून से भी वंचित हो जाएँगे जिसे हासिल करने के लिए आपने जी-तोड़ मेहनत की है। इसलिए जरूरी है कि आप उन चेतावनी के संकेतों, अलार्म सिग्नल्स को पहचानें और साथ ही अपनी सेहत को बरकरार रखने के लिए सावधानियाँ बरतें।  

जीवनशैली में परिवर्तन 
अपनी उम्र व क्षमता के हिसाब से अपने रहन-सहन, खान-पान व दिनचर्या को ढालें, यह सबसे जरूरी है। जीवनशैली का स्ट्रेस या दबाव, तनाव व सीडेन्ट्री लाइफ स्टाइल यानी शारीरिक श्रम रहित जीवनशैली से गहरा संबंध है। इन दोनों कारणों से आप भविष्य में उच्च रक्तचाप (ब्लॅडप्रेशर), हृदय रोग, मधुमेह डायबिटीज), डिप्रेशन (अवसाद), पोश्चर व जोड़ों की समस्याओं से पीड़ित हो सकते हैं। 

नियमित जाँचें 
प्रौढ़ावस्था के दौरान शरीर में अनेक परिवर्तन होते हैं। महिलाओं में जहाँ इस दौरान रजोनिवृत्ति व इससे जुड़े हारमोनल परिवर्तन होते हैं, वहीं पुरुषों में भी कई रासायनिक परिवर्तन होते हैं। डायबिटीज टाइप-२ जैसी अनुवांशिक बीमारी भी इस दौरान प्रकट होती है, बरसों से धमनियों में जमा कोलेस्टेराल व फेफड़ों में जमा सिगरेट के धुएँ से निकला कार्बन हृदयाघात, दमा व ब्रोंकाइटिस जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है। कैल्शियम की कमी व शारीरिक व्यायामरहित जीवनशैली आर्थराइटिस को साथ लाती है। पढ़ने के लिए चश्मा लगने की उम्र भी यही है। इसलिए जरूरी है कि प्रौढ़ावस्था की शुरुआत से पहले आप कम से कम एक बार सभी जरूरी जाँचें व चिकित्सकीय परीक्षण अवश्य करा लें। 

इन जाँचों को एक बेसलाइन के रूप में हमेशा सामने रखें। इससे आपको भविष्य में हो रहे शारीरिक परिवर्तनों की तुलना करने में आसानी होगी। कोर्ई समस्या जन्म ले रही होगी तो वह पकड़ में आ जाएगी और उसे आगे बढ़ने से रोका जा सकेगा। जरूरी जाँचों में लिपिड प्रोफाइल, ब्लड यूरिया, सीरम क्रिएटिनीन, लीवर फंक्शन टेस्ट, ईसीजी, चेस्ट एक्स-रे, एब्डोमिनल सोनोग्राफी, टीएमटी (ट्रेडमिलटेस्ट), यूरिन व कम्पलीट हीमोग्राम साथ ही महिलाओं के लिए बोनमेरो डेन्सिटी (बीएमडी), सरवाइकल पेप स्मीअर व मेमोग्राफी आदि जाँचें सामान्यतया कम से कम एक बार करवाकर रखना चाहिए।

हिस्ट्री तो नहीं... 
यदि परिवार में डायबिटीज की हिस्ट्री है तो ४५ वर्ष की उम्र से पहले दो वर्ष में एक बार और फिर बाद में प्रत्येक वर्ष खून में शकर की जाँच जरूरी है। इसी प्रकार परिवार में स्तन कैंसर पहले हुआ हो तो महिलाओं को साल में एक बार मेमोग्राफी अवश्य कराना चाहिए। वर्ष में एक बार आँखों की जाँच, कानों की जाँच भी करा सकें तो अच्छा है। इसके अलावा साल में एक बार अपने डॉक्टर से अपना पूर्ण परीक्षण कराएँ और जो जाँचें वे जरूरी समझें, उन्हें कराएँ।

खान-पान... 
खान-पान में संयम इस आयु की एक और खास आवश्यकता है। अपने वजन पर खास ध्यान दें। घी, तेल, चिकनाईयुक्त और मीठे भोज्य पदार्थों से यथासंभव बचें, नमक भी सीमित मात्रा में लें, कच्चा नमक न खाएँ तो भी हर्ज नहीं। भोजन में पर्याप्त मात्रा में हरी सब्जियाँ, सलाद व अन्य रेशेदार पदार्थ लें। अंकुरित मूँग, चने व फलों का रस नाश्ते में शामिल करें। कई लोग इस उम्र में अपने मन से ही विटामिन्स व एंटी-ऑक्सीडेंट्स की गोलियाँ लेने लगते हैं। इससे सिर्फ इन महँगी दवाओं को बनाने वाली कंपनियों को ही लाभ होता है व्यक्ति को नहीं। एक संतुलित आहार से इन सभी की पूर्ति प्राकृतिक रूप से हो जाती है। 

नियमित व्यायाम करें 
जीवन में नियमित व्यायामों को स्थान दें, सुबह-शाम ४ कि लोमीटर की पैदल सैर करें या तैरने जाएँ और साथ ही तनाव को भी कम करें। इसके लिए योग व ध्यान एक अच्छा साधन है। तनाव उत्पन्ना करने वाले कारकों को पहचानें व उन्हें दूर करें। अपने आर्थिक लक्ष्य उतने ही ऊँचे रखें जिन्हें आसानी से हासिल कर सकें। अपनी आर्थिक सीमाओं को ध्यान में रखकर बनाएँ। कर्ज लें तो उसके उतारने की क्षमता का पहले ध्यान रखें। परिवार को समय दें। कभी-कभी उनके साथ मनोरंजन व परिवर्तन के लिए बाहर जाएँ और इस समय अपने कामकाज व कारोबार की चिंताओं को घर छोड़ दें(डॉ. योगेश साह,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर प्रथमांक 2011)।

8 टिप्‍पणियां:

  1. हम लोगों के लिए तो बहुत उपयोगी -कभी विस्तार से अन्य संभावनाओं को भी लें ....प्रौढ़ जीवन की देखभाल पर ek लेखमाला क्यों नहीं ?

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  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  3. सही समय पे चेता रहे हैं आप ... स्वस्थ के साथ साथ सोच में भी बदलाव जरूरी है उम्र के साथ साथ ...

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  4. अति सुन्दर |
    शुभकामनाएं ||

    dcgpthravikar.blogspot.com

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  5. उपयोगी जानकारी .. आभार !

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