शनिवार, 26 नवंबर 2011

प्रोस्टेट ग्रंथि की समस्या

पुरुषों के शरीर में पाई जाने वाली एक छोटी-सी ग्रंथि, प्रोस्टेट पुरुषों के प्रजनन तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस ग्रंथि का कार्य है सेमाइनल द्रव का उत्पादन, जो शुक्राणुओं को भोजन व सुरक्षा-कवच प्रदान करता है। ५० की उम्र के बाद पुरुषों में प्रोस्टेट ग्रंथि की समस्या कभी भी हो सकती है। यह ग्रंथि मूत्राशय के बिलकुल नीचे स्थित होती है। 

वृद्धावस्था में प्रोस्टेट ग्रंथि के बिलकुल बढ़ जाने से मूत्र उत्सर्जन की परेशानी हो जाती है। प्रोस्टेट ग्रंथि के आकार में वृद्धि होने का कारण स्पष्ट नहीं है। बढ़ती उम्र के साथ पुरुषों के शरीर में होने वाला हारमोन का परिवर्तन एक विशेष कारण हो सकता है। ग्रंथि के आकार में वृद्धि हो जाने पर मूत्र नलिका अवरुद्ध हो जाती है और यही पेशाब रुकने का कारण बनती है। 

 -पेशाब करने की हालत बनी रहती है।

-पेशाब करने की आवृत्ति बढ़ जाती है।

-पेशाब करने की तीव्र इच्छा।

-मूत्र-थैली का पूरी तरह खाली न होना।  

उपचार... 
 प्रोस्टेट ग्रंथि में वृद्धि होने पर मरीज़ को चिकित्सकीय उपचार की आवश्यकता होती है। मूत्र थैली के लगातार भरे रहने से गुर्दों पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे इनके खराब होने का ख़तरा पैदा हो जाता है। रोग की प्रारंभिक अवस्था में दवाओं द्वारा ग्रंथि की वृद्धि को कम करने का प्रयास किया जाता है, जिसकी सफलता दर ५०-८० प्रतिशत है। कुछ मरीज़ों को दवाइयों से कोई लाभ नहीं होता, ऐसी स्थिति में शल्यक्रिया करके रोगी के शरीर से प्रोस्टेट ग्रंथि निकाल दी जाती है। चिकित्सा की आधुनिक पद्धति से कम से कम चीर-फाड़ व रक्त-स्राव द्वारा प्रोस्टेट ग्रंथि की बीमारी का इलाज संभव है। ऐसी ही एक आधुनिक तकनीक है लेज़र किरणों से प्रोस्टेक्टॉमी।

लेजर प्रोस्टेक्टॉमी 
इसमें लेजर किरणों के माध्यम से प्रोस्टेट ग्रंथि के उस हिस्से को काटकर अलग कर दिया जाता है जिससे मूत्र नलिका का मार्ग अवरूद्ध हो रहा था। लेज़र प्रोस्टेक्टॉमी में एक फाइबर ऑप्टिक टेलीस्कोप दूरबीन को मरीज़ के मूत्रद्वार से मूत्राशय की ओर भेजा जाता है। यहां प्रोस्टेट ग्रंथि के बढ़े हुए हिस्से को काटकर निकाल दिया जाता है और प्रोस्टेट के टुकड़े को ब्लैडर(मूत्राशय) में धकेल दिया जाता है। मूत्रमार्ग में कैथेटर (नली) डाल दी जाती है जिससे मूत्र उत्सर्जन निर्बाधित रूप से होता रहता है। मूत्राशय में धकेले गए ग्रंथि के बचे हुए हिस्सों को वहां से निकाल दिया जाता है। प्रोस्टेट के इन टुकड़ों को पैथोलॉजी जांच के लिए भेजा जाता है जहां ग्रंथि के आकार में वृद्धि के कारणों की जांच की जाती है। प्रोस्टेट ग्रंथि के लेज़र सर्जरी से निकालने के बाद पेशाब करने की बढ़ी आवृत्ति,तीव्र इच्छा व मूत्राशय पूर्णतः खाली न होने जैसी शिकायतें दूर हो जाती हैं और मूत्र का प्रवाह भी ठीक हो जाता है। 

प्रोस्टेट ग्रंथि को हटाने से क्या समस्या आ सकती है ?
प्रोस्टेट ग्रंथि के स्राव से शुक्राणुओं को पोषण और सुरक्षा मिलती है। शल्यक्रिया द्वारा ग्रंथि को निकाल दिए जाने पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पडता क्योंकि प्रोस्टेट के अलावा सेमाइनल वेसिकल्स भी इस कार्य को करती है। 

सर्जरी के फायदे -
यह एक दिवसीय शल्य क्रिया है। सुबह ऑपरेशन कराने पर मरीज़ शाम तक घर जा सकता है। -यह रक्त-स्त्राव वाली शल्य क्रिया है। इसमें आसपास स्थित सामान्य ऊतकों को कोई क्षति नहीं होती है।  

सर्जरी से जुड़े ख़तरे 
इस ग्रंथि के शल्य उपचार के खतरे किसी भी अन्य सर्जरी से जुड़े ख़तरों के समान ही हैं। प्रत्येक शल्य क्रिया के पहले चिकित्सकों की टीम द्वारा प्री-एनेस्थेटिक जाँच कराई जाना आवश्यक है। इससे पता चलता है कि रोगी शल्य क्रिया रोगी के लिए उपयुक्त है या नहीं(डा. अनिल बण्डी,सेहत,नई दुनिया,नवम्बर तृतीयांक 2011)।  


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2 टिप्‍पणियां:

  1. यह जानकारी बहुत ज़रूरी है। मैंने लोगों को इसे इग्नोर करते पाया है, जो कैंसर में तबदील हो गया और प्राणघातक साबित हुआ।

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