सोमवार, 12 सितंबर 2011

"ब्रह्मचर्य" माने क्या?

संस्कृत भाषा में ब्रह्म शब्द का अर्थ होता है परमात्मा या सृष्टिकर्ता और चर्य का अर्थ है उसकी खोज। यानी आत्मा के शोध का अर्थ है ब्रह्मचर्य। आम भाषा में ब्रह्मचर्य को कुंवारेपन या सेक्स से दूरी रखना माना जाता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी माना गया है कि मन, कर्म और विचार से सेक्स से दूर रहना ब्रह्मचर्य है। मेडिकल साइंस ही नहीं बल्कि पुरातन ज्ञान भी नहीं कहता कि ब्रह्मचर्य का मतलब वीर्य इकट्ठा करना है। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, कामसूत्र और अष्टांग हृदय में भी ऐसा कुछ नहीं बताया गया है। 

कुछ लोग इस गलत धारणा में रहते हैं कि सेक्स से परहेज करना स्वास्थ्य व खुशी के लिए अच्छा है। वे अपनी तथाकथित ऊर्जा को सेक्स संबंधों से परहेज रखकर सुरक्षित रखने की कोशिश करते हैं। उन्हें लगता है कि सेक्स से दूर रहकर जिंदगी लंबी होती है, बदन हृष्टपुष्ट होता है और मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है। यह हकीकत नहीं है। वीर्य एक रस है जो 24 घंटे बनता रहता है। अगर कोई उसे रोकना चाहे, तो भी नहीं रोक सकता। वीर्य को अनिश्चित समय के लिए रोककर रखना मुमकिन नहीं है, चाहे कोई कितना भी संयम करे या योगी और संन्यासी हो। जिस तरह से अनिश्चित काल के लिए मलमूत्र को रोकना नामुमकिन है, उसी तरह वीर्य को भी रोककर रखना असंभव है। 

वीर्य बनने की यह प्रक्रिया दिन-रात चलती रहती है। मिसाल के तौर पर पानी से भरे गिलास में अगर और पानी भरने की कोशिश करेंगे तो वह छलक जाएगा। उसी तरह अगर कोई आदमी मैथुन या हस्तमैथुन नहीं करता तो उसका वीर्य स्वप्न मैथुन या निद्रा मैथुन के जरिए बाहर आ ही जाएगा। यह भी गलतफहमी है कि सौ बूंद खून से एक बूंद वीर्य बनता है और एक बूंद खून बनाने के लिए उससे कई गुना पौष्टिक आहार लेने की जरूरत पड़ती है। हकीकत में तो आहार और वीर्य का कोई संबंध ही नहीं है। यह सोच कि अगर हम वीर्य नष्ट नहीं करेंगे तो ज्यादा स्वस्थ रहेंगे और लंबा जीवन जिएंगे, सही नहीं है। इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि ज्यादातर ब्रह्मचारी या अविवाहित लोगों का इंतकाल जल्दी हुआ है। इनमें बड़े-बड़े लोगों के नाम भी शामिल हैं। 

 सेक्स से परहेज करना नपुंसकता का एक कारण बताया गया है। जब लोग परहेज रखकर सेक्स से दूरी बना लेते हैं तो उनमें अपराधबोध और एंजाइटी हो जाती है। कामेच्छा दबाने की यह प्रक्रिया जब बार-बार होती है तो समस्या की जड़ें फैल जाती हैं। दिमाग में एक भावनात्मक असंतुलन पैदा होता है और ऐसे लोगों में सेक्स के ही ज्यादा विचार आने लगते हैं। ध्यान केंद्रित न होना, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और घबराहट बढ़ जाती है। अगर कोई ज्यादा सेंसिटिव है तो ज्यादा समस्या हो जाती है। कई बार जननांगों का स्वाभाविक कामकाज प्रभावित हो जाता है। उनमें कमजोरी आने लगती है। इसका कारण उनका प्रयोग न करना होता है। ज्यादातर मानसिक कमजोरी आ जाती है जो बाद में शारीरिक कमजोरी में भी बदल सकती है। 

 ब्रह्मचर्य धारण करने से कोई चमत्कार नहीं होता है। गृहस्थ में रहकर भी ब्रह्म की खोज यानी ब्रह्मचर्य पाया जा सकता है। पूज्य बापू महात्मा गांधी ने भी इसके बारे में बहुत कुछ लिखा है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि बापू पॉलिटिशियन थे, सेक्सॉलजिस्ट नहीं(सुरक्षित गोस्वामी,नवभारत टाइम्स,10 सितम्बर,2011)।

28 टिप्‍पणियां:

  1. pehali baar aapke blog par aaya , kaafi jankaari mili ....
    Dhanyawaad

    http://hindi-kavitayein.blogspot.com/

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  2. इस विषय में आम जनता में काफी गलतफहमियां हैं ।
    सही जानकारी ।

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  3. मेरे लिये इस विषय में कुछ कह पाना मुमकिन नहीं.

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  5. इस आलेख की सभी बातों से सहमति पर बापू एक राजनेता से आगे भी बहुत कुछ थे। एक संत थे।
    संतों से अधिक इस विद्या के बारे में कौन जान सकता है, सेक्सोलॉजिस्ट भी नहीं।

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  6. इस लेख की आखिरी पंक्तियों में ब्रह्मचर्य की अच्छी व्याख्या की है..... ज्ञानोपयोगी लेख. सुंदर प्रस्तुति.
    .
    पुरवईया : आपन देश के बयार

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  7. बात ने पुरानी पढ़ी बातें फिर से ताजा करा दीं..ये भी याद दिला दिया कि कुछ पढ़ना भूल गये थे उसे पढ़ना फिर से जरुरी है। जहां तक बापू की बात है उनको पढ़कर इतना जाना कि वो एक व्यवहारिक पुरुष थे, जिसे संत की संज्ञा दी जा सकती है। एक व्यवाहरिक पुरुष का राजनेता होना काफी अच्छा होता है...औऱ अगर वो व्यवाहरिक होने के साथ साथ विचारक हो..और उसपर अगुवाई देने वाला तो इससे बढ़कर कुछ नहीं...

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  8. बहुत ही अच्छा आलेख!
    ऐसे लेख यदि आते रहे तो "खानीदानी" दवाखानो का क्या होगा ?

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  9. राधारमण जी आपका तहेदिल से शुक्रिया हमारे ब्लॉगस पर आने का और अपनी बहुमूल्य टिप्पणीयाँ देने का..........आपका ब्लॉग न्बहुत अच्छा है इससे काफी सार्थक और उपयोगी जानकारियां मिलती हैं|

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  10. बहुत ही अच्छा आलेख,ज्ञानवर्धक और सार्थक पोस्ट!!

    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से 1 ब्लॉग सबका
    कृपया फालोवर बनकर उत्साह वर्धन कीजिये

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  11. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  12. संस्कृत भाषा में ब्रह्म शब्द का अर्थ होता है परमात्मा या सृष्टिकर्ता और चर्य का अर्थ है उसकी खोज। यानी आत्मा के शोध का अर्थ है ब्रह्मचर्य।
    @ आपने 'ठीकठाक' अर्थ किया है किन्तु इसका केवल यही अर्थ नहीं. ...इस तरह तो आप जरूर 'दिनचर्या' का अर्थ करेंगे :
    दिन का अर्थ होता है प्रकाश या उजाले की अवधि और चर्या का अर्थ है उसकी खोज. यानी अर्थ हुआ प्रकाश की खोज. दैनिक कार्यकलापों की समयबद्ध सारणी इसका अर्थ कतई नहीं.

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  13. *सारणी = सरणी

    आम भाषा में ब्रह्मचर्य को कुंवारेपन या सेक्स से दूरी रखना माना जाता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी माना गया है कि मन, कर्म और विचार से सेक्स से दूर रहना ब्रह्मचर्य है। मेडिकल साइंस ही नहीं बल्कि पुरातन ज्ञान भी नहीं कहता कि ब्रह्मचर्य का मतलब वीर्य इकट्ठा करना है। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, कामसूत्र और अष्टांग हृदय में भी ऐसा कुछ नहीं बताया गया है।
    @ जिस रसायन को आप इकट्ठा करना बता रहे हैं... यह वर्तमान के बुद्धिजीवी डॉक्टर्स का मानना है... वे सोचते हैं कि सप्तम धातु को रोकने से वह एकत्रित होता रहता है.... यह कोई मल-मूत्र का दबाव नहीं जिसे आप शारीरिक विकार जान बाहर जाने की बात प्रसिद्ध कर रहे हैं... इसके निर्माण से कार्यक्षमता में बढोतरी होती है.... और इसके क्षय से कार्यक्षमता घटती है. आपका यह पूर्णतया ब्रह्मचर्य के प्रति ग़लत धारणा है और दुष्प्रचार ही है कि नयी पीढ़ी को चाहे-अनचाहे कुमार्गगामी किये दे रहे हैं.... इस संबंध में 'अष्टांग योग' में विस्तार से दिया गया है. फिर भी आपसे विमर्श को मैं आगे तैयार रहूँगा.
    कहते हैं -बिना आहार के व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता ... फिर भी एक व्यक्ति ७० वर्ष से निराहार जीवित है...आजकल का मेडिकल साइंस इस बात को भी पचाने को तैयार नहीं.

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  14. कुछ लोग इस गलत धारणा में रहते हैं कि सेक्स से परहेज करना स्वास्थ्य व खुशी के लिए अच्छा है। वे अपनी तथाकथित ऊर्जा को सेक्स संबंधों से परहेज रखकर सुरक्षित रखने की कोशिश करते हैं। उन्हें लगता है कि सेक्स से दूर रहकर जिंदगी लंबी होती है, बदन हृष्टपुष्ट होता है और मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है। यह हकीकत नहीं है। वीर्य एक रस है जो 24 घंटे बनता रहता है।
    @ आप तो जानते ही हैं कि यह २४ घंटे बनने वाला रसायन है. फिर तो आप यह भी जानते होंगे कि 'इस रस' की अंतिम स्थिति 'ओज' है.... आध्यात्मिक साधना और मनोबल साधना के लिये इस रस से सहायता मिलती है.... संकल्प शक्ति और महती शोधकार्यों के लिये यह रस 'ईंधन' बनता हैं.

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  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  16. अगर कोई उसे रोकना चाहे, तो भी नहीं रोक सकता। वीर्य को अनिश्चित समय के लिए रोककर रखना मुमकिन नहीं है, चाहे कोई कितना भी संयम करे या योगी और संन्यासी हो। जिस तरह से अनिश्चित काल के लिए मलमूत्र को रोकना नामुमकिन है, उसी तरह वीर्य को भी रोककर रखना असंभव है।
    @ यदि शरीर का खंड-खंड भी कर दिया जाये तो इसकी प्राप्ति नहीं होगी जबकि आप कह रहे हैं कि कोई ब्रह्मचारी यह शरीर में इकट्ठा करता रहता है.... जबकि सत्य यह है कि भाव-विशेष से इसकी शरीर में उपस्थिति होती है ... अन्यथा यह गुप्त रूप से शारीरिक क्षमताओं में वृद्धि ही करता है.

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  17. हकीकत में तो आहार और वीर्य का कोई संबंध ही नहीं है। यह सोच कि अगर हम वीर्य नष्ट नहीं करेंगे तो ज्यादा स्वस्थ रहेंगे और लंबा जीवन जिएंगे, सही नहीं है।
    @ आप जो कह रहे हैं क्या वही सही है?.... शरीर मिला है तो वह आहार ग्रहण करेगा ही... बेशक अन्न जल ग्रहण न करे वायु सूर्य का प्रकाश अवश्य ग्रहण करेगा.. शरीर जिन पंचतत्वों से मिलकर बनता है उसे उन-उन तत्वों की जरूरत सदैव पड़ती रहती हैं.. एक-आद पदार्थ हम अपनी इच्छा (हठ) से जरूर छोड़ दें लेकिन शरीर जिससे बना है उस पदार्थ की चाहना अवश्य करेगा. आहार से ऊर्जा मिलती है शक्ति मिलती है यह स्वानुभूत है... क्या शक्ति या ऊर्जा का वीर्य से कोई वास्ता नहीं... तो आपके दृष्टि में 'वीर्यवान' 'ओजस्वी' शब्दों की कोई अहमियत भी नहीं होगी.

    बाक़ी संशयों के उत्तर समय मिलते ही...

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  18. लंबा जीवन कई अन्य कारणों पर भी निर्भर करता है :
    — एक ब्रह्मचारी को सामाजिक लोग असामान्य मानते हैं और उसके दुश्मन एकाधिक होते हैं...कोई विष देकर मार देता है तो कोई अन्य साधनों से उसे बदनाम करके मार देता है. इतना अवश्य है कि ब्रह्मचारी व्यक्ति/ ब्रह्मचारी साधु के मनोरंजन के विषय अतिसामान्य होते हैं.. जिन शुष्कभावी स्थूलकायों पर हलके-फुल्के शब्दों का प्रभाव शून्य होता है उन शब्दों की ध्वनिमात्र से वे खिलखिला जाते हैं. उनके स्वस्थ हास्य के कारणों से वे मूर्ख प्रतीत होते हैं... सही माइने में मूर्ख ... मूर्ख मतलब मुग्ध... उन्हें स्त्री मुग्ध करती है... क्योंकि सुन्दरता किसे मुग्ध नहीं करती... स्त्री की सुन्दरता को देखकर मुस्कराने का कारण वही नहीं जो कामुक व्यक्ति का होता है.
    आपके आदर्श 'ऋषि दयानंद' नहीं हो सकते ... शायद पैगम्बर साहब हों या फिर ओशो रजनीश' हमें प्रायः वही व्यक्ति अपना आदर्श लगता है जिसके हम आसानी से अनुयायी बन पाते हैं.. जिसकी बातें अपनी बुराइयों में भी आत्मग्लानि महसूस नहीं करातीं.
    एक डाकू 'वध करने वाली देवी' को पूजता है...
    एक चोर 'लक्ष्मी' का पुजारी होता है..
    ........ उन्हें देवी के उस रूप के पीछे की धारणा से कोई अर्थ नहीं होता ... लक्ष्मी उलूकवाहिनी क्यों है और 'दुर्गा' संहारनी क्यों बनी?.... इन बातों को जानने की वह कोशिश नहीं करता...

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  19. इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि ज्यादातर ब्रह्मचारी या अविवाहित लोगों का इंतकाल जल्दी हुआ है। इनमें बड़े-बड़े लोगों के नाम भी शामिल हैं।
    @ पितामह भीष्म ... शायद कपोलकल्पित नाम है.
    वीर हनुमान का चरित्र ...... रामायण का प्रसिद्ध गपोड़ा है.
    .......... हम चाहे कितने ही विलासी क्यों न हों... फिर भी हमें उन जटिल मार्गों की सराहना करनी चाहिए जो 'आदर्श' मानी जाती हैं...

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  21. ब्रह्मचर्य धारण करने से कोई चमत्कार नहीं होता है। गृहस्थ में रहकर भी ब्रह्म की खोज यानी ब्रह्मचर्य पाया जा सकता है।
    @ हाँ यह सही है कि ब्रह्मचर्य का पालन गृहस्थ में रहकर किया जा सकता है... बिना शक्तिसंचय (ब्रह्मचर्य) के सृष्टि संभव नहीं ... इसलिये शक्ति का संचय करने वाले ही उत्तम सृष्टि कर पाने में सक्षम हो पाते हैं....जैसे जिसके जितने बड़े उद्देश्य होते हैं जिसे जितना बड़ा कार्यक्रम करना होता है उसे उतनी ही अधिक पूँजी की आवश्यकता पड़ती है... वह तभी उस कार्यक्रम को सफलतापूर्वक संपन्न कर पाता है जब उसके पास उतनी पूँजी होती है... उस कार्यक्रम को कोई दिहाड़ी मजदूर नहीं कर सकता.. हाँ अपनी बिसात में दिहाड़ी मजदूर भी अपने यार-दोस्तों को दावत करा सकता है... लेकिन हज़ार लोगों की शानदार दावत तो कोई अच्छी नौकरीवाला ही करा सकता है.. वैसे ही संतान तो कोई भी दैनिक भोग करने वाला पैदा कर दे, किन्तु उत्तम संतान के लिये ब्रह्मचर्य धारण करना ही पड़ता है.... एक व्यक्ति सृष्टिकर्ता यानी पिता तभी बन पाता है जब वह पूरी तरह से सक्षम हो. ब्रह्मचारी ........... 'शक्तिसंचय' कई उद्देश्यों के लिये कर सकता है... वह या तो भविष्य का एक श्रेष्ठ गृहस्थी होना चाहता है. या फिर, वह अपनी समस्त ऊर्जा किसी महती कार्य में व्यय कर देना चाहता है. शोध, अनुसंधान या जगत-कल्याण का कोई अन्य कार्य.... कुछ भी हो सकता है.

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  22. पूज्य बापू महात्मा गांधी ने भी इसके बारे में बहुत कुछ लिखा है....
    @ बापू जी, ओशो जी, फ्रायड जी सभी ने इस बारे में भरपूर लिखा है... फिर भी हम जैसे लोग हैं कि कहते नहीं थकते...

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  23. आलेख पढ़ मन व्यथित हो गया था कि कैसी भ्रामक बातें प्रचारित की जा रही हैं,इसके द्वारा...परन्तु प्रतुल जी की टिप्पणियां पढ़ मन आनंदित हो गया...शत प्रतिशत सहमति है उनसे...

    प्रतुल जी का ह्रदय से आभार ...

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  24. सामान्य मनुष्य के लिये आपके लेख में दी हुई जानकारी सत्य है । किशोरों में हारमोनल उथलपुथल के चलते स्वप्नदोष होता है पर जो निग्रही व्यक्ति होते हैं जैसे स्वामी विवेकानंद वे केवल अपने मनोबल से ब्रम्हचर्य का पालन करने में सक्षम रहे हैं ।

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  25. कुछ भी कहो फ़र्क तो लालू व अन्ना में देख लो।

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  26. वाह वाह प्रतुल जी ...एक दम सटीक बातें कही हैं....मैं स्वयं लिखना चाह रहा था परन्तु अब आवश्यकता नहीं है आपने सब दूध का दूध ... कर दिया है ...
    ----मूल अर्थ ही असत्य है... चर्य का अर्थ है आचरण करना ...ब्रह्म(ईश्वर) के गुणों पर चलना... बाकी आपने सब कुछ लिख ही दिया है..
    ---- वीर्य भी शरीर के अन्य आवश्यक, महत्वपूर्ण रसों/स्रावों की भांति आवश्यकता से अधिक बनने पर पुनः रक्त द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है अन्य आवश्यक अंगों,पदार्थों, कार्यों में संयोजन हेतु.. , आवश्यक नहीं कि उसे शरीर के बाहर स्खलित ही होना चाहिए.....इसीलिए १०० बूँद रक्त =१बून्द वीर्य की कल्पना हुई होगी .... वीर्य..मल-मूत्रादि की भांति अप-दृव्य नहीं है जिसे बाहर फैंका जाना होता है....
    --पूरे आलेख में मूर्खतापूर्ण, अतर्क्य व अनर्गल , चिकित्सा शास्त्र से परे बातें कहीं गयीं हैं ..

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  27. निसंदेह यह बढ़िया जानकारी है !
    ओशो के इस विषय पर बहुत सार्थक
    प्रवचन उपलब्ध है ! आप एक बहुत अच्छा
    काम कर रहे है पता नहीं लोग पढ़कर कितना
    अमल कर पायेंगे !

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