बुधवार, 18 मई 2011

शैतान सुपरबग और स्वच्छता के पैमाने

देश में मेडिकल टूरिज़्म तेजी से बढ़ रहा है। इस बाजार पर हुए शोध अध्ययन बताते हैं कि भारत में उपलब्ध सस्ती चिकित्सा सुविधाओं का लाभ लेने के लिए अनुमानतः डेढ़ से दो लाख विदेशी मरीज आते हैं। मेडिकल टूरिज़्म का बाजार हर साल ३० प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। २०१५ तक चिकित्सा सेवा का यह बाजार ९,५०० करोड़ डॉलर का व्यापार करने लगेगा। पिछले साल न्यूयॉर्क के अखबारों में छपी नई दिल्ली के पानी में सुपरबग होने की खबर ने इस बाजार पर पलीता लगा दिया है। अब हम चाहे लाख सफाइयाँ देते रहें कि नई दिल्ली का पानी शुद्ध है, लेकिन सचाई यह है कि हमें अपनी सेनिटेशन और हाईजीन जैसी मूलभूत बातों पर ध्यान देना चाहिए। हम अक्सर अपनी ग़लतियों का दोष दूसरों पर डाल देना चाहते हैं। देश के चिकित्सा समुदाय ने तो सफाई में यहाँ तक कह दिया है कि हमारे अस्पतालों में बढ़ते मेडिकल टूरिज्म पर चोट पहुँचाने के लिए विदेशी दवा कंपनियों ने सुपरबग (मेटालो बीटा लैक्टामास) नाम का शैतान खड़ा किया है। हमारे अस्पतालों में सुपरबग है या नहीं, इस विवाद से परे सचाई यह है कि हम व्यक्तिगत एवं सामुदायिक स्वच्छता की बिलकुल परवाह नहीं करते। किसी भी अस्पताल अथवा कार्यस्थल के टॉयलेट्स हमारी स्वच्छता के प्रति लापरवाही के गवाह हैं। हम हाथ धोने जैसे स्वच्छता के अत्यंत मूलभूत व्यवहार का भी पालन नहीं करते। पेयजल और सीवर लाइनों में दूरी रखना क्यों जरूरी है, यह बात नगर निकायों को अब तक समझ में नहीं आ सकी है। बात सिर्फ पेयजल की शुद्धि की भी नहीं है। कोई विदेशी मरीज यहाँ इलाज के लिए आता है तो उसे भोजन ही नहीं, बल्कि फल और फलों का रस वगैरह भी चाहिए होता है। हमारे यहाँ के फल और सब्जियाँ कितनी निरापद है या कि अस्पतालों के रसोईघर कितने स्वच्छ हैं, इसे कौन देखेगा? हमारे यहाँ तो फल और सब्जियाँ गंदे नालों के पानी से भी पैदा की जा रही हैं और हम उनका उपयोग कर रहे हैं। यह जानने का कोई साधन नहीं है कि ये सब्जियाँ और फल कहाँ और किस परिस्थिति में उगाए गए हैं। अभी हमने अस्पतालों की एयर क्वालिटी की बात नहीं की है और न ही वार्डों में संक्रमणों के स्तर पर प्रश्न चिन्ह खड़े किए हैं। अच्छे कहे जाने वाले कई अस्पतालों की एयर क्वालिटी इतनी खराब है कि मरीज कई तरह के संक्रमणों के जोखिम पर होता है। नेशनल एक्रेडिशन बोर्ड ऑफ हॉस्पिटल ने अस्पतालों के लिए एक गाइड लाइन तैयार की है। इस पैमाने पर अब तक देश के कुल जमा ७१ अस्पताल ही खरे उतर सकें हैं।


सुपरबग का जोखिम विदेशी मेहमानों को है या नहीं, इस प्रश्न से परे हमें स्वच्छता के कई स्तरों पर विचार करने की जरूरत है। इसमें पेयजल से लेकर आहार और शुद्ध ऑक्सीजन सभी शामिल हैं। चिकित्सा विज्ञान की बाईबल समझी जाने वाली पत्रिका "लांसेट" ने शोध अध्ययनों के आधार पर अस्पतालों में सुपरबग होने की बात कही है। इस बात से इंकार करने का कोई आधार हमारे पास नहीं है। हमारे पास मेडिकल टूरिज़्म की नकद फसल काटने के लिए बहुत अच्छी ज़मीन है, अच्छी नर्सें, डॉक्टर और अस्पताल हैं, लेकिन स्वच्छता के प्रति नज़रिया वही सदियों पुराना है। इसे बदलने के लिए आत्म विश्लेषण की जरूरत है। वह भी केवल सरकार के स्तर पर नहीं, प्रत्येक व्यक्ति के स्तर पर भी(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,मई द्वितीयांक 2011)।

1 टिप्पणी:

  1. बिलकुल सही बात कही है बड़े से बड़े अस्पतालों में कई बार सफाई को लेकर काफी लापरवाही की जाती है |

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