शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

चित्त की अवस्थाएं

आज योग से सम्बंधी कई प्रकार की अफवाहें हैं। यदि हम साफ शब्दों में कहें तो योग स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर जाने वाला रास्ता है। हम जितना अपने मन को शांत बनाएंगें तब हमारे अन्दर सत अर्थात सम्यक ज्ञान के दर्शन होंगे मुनि व्यास ने चित्त की पांच अवस्थाएं बताई हैं।

1. मूढ़ अवस्था- यह अवस्था तम प्रधान होती है यह काम-क्रोध-लोभ मोह के कारण होती है इसमें मनुष्य की अवस्था अज्ञानमय होने के कारण समाधिस्थ नहीं हो पाती।

2. क्षिप्त अवस्था- इस अवस्था का मनुष्य रज प्रधान होता है इसलिए राग द्वेष मोह कषाय सांसारिक कर्मों की प्रवृत्ति मन की चंचलता आदि गुणवृत्ति अधिक पाई जाती है।

3. विक्षिप्त अवस्था- इस अवस्था का मनुष्य सतगुण प्रधान होता है अत धर्म ज्ञान वैराग्य और ऐश्वर्य अधिक पाया जाता है।

4.एकाग्रावस्था- इस अवस्था का मनुष्य सत्व गुण प्रधान होता है इसमें रज और तम गुण आंशिक मात्रा में रहते हैं।

5. निरुद्धावस्था- जब विवेक ख्याति द्वारा चित्त और पुरुष का भेद साक्षात् प्रकट हो जाता है। उस ख्याति से भी वैराग्य उदस होता है(दैनिक भास्कर,उज्जैन,22.4.11)।

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