शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

पेसमेकर

जिस तरह से घरों में पानी और बिजली की सप्लाई अलग-अलग होती है उसी प्रकार प्रकृति ने हृदय में भी नाड़ियों के जरिए खून की सप्लाई और तंत्रिकाओं के जरिए इलेक्ट्रिकल सप्लाई का निजाम बनाया है। इसी में गड़बड़ी को रोकने के काम आता है पेसमेकर। नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट(फरवरी द्वितीय अंक) में डॉ. इदरीस अहमद खान ने इसे आम आदमी की ज़बान में समझाया है। लिखते हैं-

“हृदय के ऊपरी हिस्से में कुदरत ने पेसमेकर नामक तंत्रिकाओं का एक सेंटर बनाया है, जो कि जनरेटर की माफिक काम करता है। इसे सायनस नोड कहते हैं। यहाँ से बिजली की तरंगें पहले हार्ट के ऊपरी हिस्सों यानी एट्रिया को एक्टिवेट करती हैं फिर उसके बाद एविनो नामक छोटे सेंटर पर जाती हैं और यहाँ पर थोड़ा विश्राम करके दो अलग-अलग तंत्रिकाओं द्वारा सीधी एवं उल्टी दिशाओं में परिवर्तित हो जाती हैं जिससे कि हृदय के निचले हिस्से यानी वेंट्रीकल्स एक्टिवेट होते हैं। यह कहलाता है प्राकृतिक तौर से होने वाली सिक्वेंशियल पेसिंग। अब से पूरे तंत्र में कहीं भी गड़बड़ी हुई तो जो बीमारी होगी उसे कहेंगे कि हार्ट ब्लॉक हो गया है यानी जिस रफ्तार के साथ दिल की धड़कनें आनी चाहिए, नहीं आएगी या फिर जब बढ़ने की जरूरत होगी तब बढ़ नहीं पाएगी।

सामान्य तौर पर जैसे-जैसे शरीर हरकत में आता है दिल की धड़कनें ५० से ६० प्रति मिनट से बढ़कर १०० से १४० प्रति मिनट तक पहुँच जाती हैं ताकि शरीर के सभी हिस्सों को पर्याप्त मात्रा में और जल्दी से रक्त की आपूर्ति मिल सके। यदि हृदय की गति आवश्यकतानुसार बढ़ नहीं पाती तो ये लक्षण हो सकते हैं- अत्यधिक थकान होना, साँस का फूलना, आँखों के आगे अँधेरा आना या फिर चक्कर खाकर गिर पड़ना। यदि समय रहते इलाज न किया जाए तो यह स्थिति जानलेवा हो सकती है यानी यह हो सकता है कि किसी दिन चक्कर खाकर व्यक्ति गिरे, तो दोबारा उठे ही नहीं। इस स्थिति में ही पेसमेकर लगाया जाता है।

पेसमेकर के दो हिस्से होते हैं बैटरी और तार। बैटरी का कार्य है ऊर्जा प्रदान करना और तारों का कार्य है उस ऊर्जा को हृदय तक पहुँचाना। पेसमेकर दो प्रकार के होते हैं- दो तार वाले और एक तार वाले। जैसा कि पहले बताया गया,हृदय में तंत्रिकाएं सिक्वेंशियल या प्राकृतिक पेसिंग करती हैं ताकि ऊपरी और निचले हिस्सों में सामंजस्य बना रहे। ऐसे ही पेसिंग पाने के लिए ज़रूरी है कि पेसमेकर में दो तार हों जो कि हृदय के दोनों भागों में सामंजस्य बनाकर रख सकें। पहले तार को हृदय के ऊपरी हिस्से यानी एट्रियम में लगाते हैं और दूसरे तार को निचले हिस्से यानी वेंट्रीकल में और फिर दोनों तारों को बैटरी से जोड़ देते हैं।
 
ऐसे पेसमेकर के कई फायदे हैं जेसे कि थकान बिल्कुल नहीं आती,कार्यक्षमता अच्छी रहती है और कालांतर में हृदय की धड़कन सामान्य बनी रहती है। अतः,तार वाले पेसमेकर शुरू में महंगे पड़ते हैं पर लंबे समय में पूरा पैसा वसूल हो जाता है। एक तार वाले पेसमेकर का अपना महत्व है। यदि जान बचानी हो और बजट टाईट हो,तो इस काम को वह बखूबी कर सकता है। कई मरीज़ों के लिए इतना काफी होता है क्योंकि उनके अधिकतर लक्षण इससे ठीक हो जाते हैं । परन्तु जहां तक हो सके,दो तार वाले पेसमेकर का ही प्रयोग करना चाहिए। एक तीसरे प्रकार का भी पेसमेकर होता है जिसमें तार तो एक ही डाला जाता है परन्तु खास तकनीक के कारण काम दो तारों वाला ही होता है और दाम भी कम होते हैं। विशेष परिस्थितियों में इसका चयन किया जाता है।
 
पेसमेकर का इम्प्लांटेशन एक बहुत ही मामूली चीरे द्वारा कंधे और गर्दन के बीच की हड्डी के नीचे किया जाता है। बेहोशी की दवा नहीं दी जाती और दर्द भी अधिक नहीं होता है। चौबीस घंटों के भीतर आप चलना-फिरना शुरू कर देते हैं और 5 से 7 दिनों में जख्म भर जाता है। आजकल त्वचा पर टांके भी नहीं लगाए जाते हैं जिससे बार-बार अस्पताल आने की जहमत नहीं उठानी पड़ती। पन्द्रह दिनों के भीतर व्यक्ति अपनी सामान्य दिनचर्य़ा शुरू कर सकता है और कोई बंदिश भी नहीं रह जाती है।

ज़िंदगी पेसमेकर के साथ
जिंदगी पेसमेकर लगने के बाद आसान हो जाती है लेकिन इसकी नियमित रूप से जाँच करवाना ठीक होता है। विशेषज्ञ द्वारा एक बार फ्रीक्वेंसी सेट करने के बाद जब भी जरूरत महसूस हो फ्रीक्वेंसी की जाँच कराई जा सकती है। आमतौर पर हर छः महीनों में जाँच की सलाह दी जाती है। जाँच के दौरान मालूम हो कि पेसमेकर का इम्पिडेंस बढ़ गया है तो समझना चाहिए कि लीड तार में खराबी आ गई है। यदि इम्पिडेंस घट जाए तो इन्सुलेशन में खराबी मानना चाहिए। आमतौर पर आधुनिक पेसमेकर केवल जरूरत के समय ही दिल की गति को ठीक करने के लिए सक्रिय होते हैं जिससे उनकी बैटरी अनावश्यक रूप से खर्च नहीं होती रहती। पुरानी स्टाइल के कई पेसमेकर ऐसे भी होते हैं जो दिल की घड़कनों की गति निरंतर एक समान बनाए रखते हैं। शरीर को जरूरत न हो तब भी वे काम करते रहते हैं। मरीज को रग्बी, कबड्डी जैसे खेलों से परहेज करना चाहिए क्योंकि खेल के दौरान दूसरे खिलाड़ियों से शारीरिक संघर्ष होता है जिससे पेसमेकर को खतरा हो सकता है। इसी तरह तीव्र मेग्नेटिक फील्ड में जाने से बचना चाहिए। कार की सीट बेल्ट से भी पेसमेकर में गड़बड़ हो सकती है क्योंकि इससे पेसमेकर लगे हुए स्थान पर तनाव बढ़ सकता है। आर्क वेल्डिंग की मशीनों से नजदीकी तकलीफदायक हो सकती है। इसी तरह मरीजों को एमआरआई कराने से पहले ही बता देना चाहिए कि उन्हें पेसमेकर लगा हुआ है। कई तरह के म्यूजिक प्लेयर्स जैसे आईपॉड से पेसमेकर की फ्रीक्वेंसी पर विपरीत असर पड़ सकता है।“

3 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय कुमार राधारमण जी ,
    पेसमेकर के सम्बन्ध में बहुत ही जीवनोपयोगी जानकारियों से परिपूर्ण आपका लेख पढ़ा |
    बहुत ही सराहनीय कार्य आप द्वारा किया जा रहा है ....मानव स्वास्थ्य के बारे में लेखन के माध्यम
    से | बहुत-बहुत धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  2. वर्षों से पेसमेकर का नाम सुनते आयें हैं...पर इतने विस्तार से पहली बार इसके विषय में जाना...

    बहुत बहुत आभार आपका...



    ( मेरी पोस्ट "महानायक" पर आपकी टिप्पणी ने मुझे अपार हर्षित किया...आपकी आभारी हूँ मैं)

    उत्तर देंहटाएं
  3. मंगलवार 30/07/2013 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं ....
    आपके सुझावों का स्वागत है ....
    धन्यवाद !!

    उत्तर देंहटाएं

एक से अधिक ब्लॉगों के स्वामी कृपया अपनी नई पोस्ट का लिंक छोड़ें।