गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

घुलनशील स्टेंट्स से कोरोनरी एंजियोप्लास्टी

जब कोरोनरी हार्ट डिसीजिस यानी हृदय धमनियों की बीमारियों के उपचार की बात आती है तो एंजियोप्लास्टी ही सबसे सुरक्षित व कारगर इलाज है। यह बात इस तथ्य से भी साबित होती है कि दुनियाभर में हर साल १० लाख से भी अधिक एंजियोप्लास्टी प्रक्रियाएँ होती हैं। "एंजियोप्लास्टी" नाम दो शब्दों से बिलकर बना है एंजियो यानी धमनी और प्लास्टीकोज यानी मोल्डिंग के लिए मुफीद।

कोरोनरी एंजियोप्लास्टी उन लाखों लोगों के लिए वरदान है, जो कोरोनरी हृदय रोगों से जूझ रहे हैं। इस प्रक्रिया से तंग अथवा अवरुद्ध धमनियों को खोला जाता है। चूँकि दिल तक रक्त ले जाने वाली धमनियों की भीतरी दीवारों पर वसा (प्लाक) जम जाती है और धमनियाँ एथेरोस्कलेरोसिस से ग्रस्त हो जाती हैं, तो इस प्रक्रिया के इस्तेमाल से दिल की मांसपेशियों में खून का प्रवाह बेहतर होता है। एंजियोप्लास्टी में एक स्टेंट का इस्तेमाल करके तंग या बंद धमनी की चुनौती से निपटा जाता है। यह पद्धति चिकित्सा विज्ञान में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

स्टेंट तकनीक का पिछले कई सालों से व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। स्टेंट इम्प्लांटेशन की विधि में एक धमनी को खोजकर उसमें छोटा-सा चीरा लगाया जाता है फिर एक पतला तार जिसे बैलून कैथेटर कहते हैं, इस धमनी से गुजारा जाता है और उसे धमनी के तंग हिस्से तक पहुँचाया जाता है। जब यह तार रुकावट तक पहुँचता है तो तार के छोर पर लगा गुब्बारा फूल जाता है। यह फूला हुआ गुब्बारा धमनी को चौड़ा कर देता है और रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है। धमनी को स्थायी तौर पर खुला रखने के लिए स्टेंट लगा दिया जाता है। इस किस्म कि एंजियोप्लास्टी को बैलून एंजियोप्लास्टी या परक्यूटेनियस ट्रांसलुमिनल कोरोनरी एंजियोप्लास्टी (पीटीसीए) कहते हैं।

बैलून एंजियोप्लास्टी के क्षेत्र में स्टेनलैस स्टील या धातु का स्टेंट और ड्रग इल्यूटिंग स्टेंट (जिस पर दवा लिपटी रहती है) अस्तित्व में आए। ये दवायुक्त स्टेंट प्लाक को जमने से रोकते हैं। किंतु इस स्टेंट में कुछ खामियाँ होती हैं, इन स्टेंटों से रक्त के थक्के जमने और धमनी में दोबारा अवरोध उत्पन्न होने का जोखिम रहता है, क्योंकि स्टेंट के भीतर नए ऊतक बनने लगते हैं। यही नहीं, इन स्टेंटों में और भी खामियां होती हैं जैसे कि धमनी के आकार से स्टेंट का मेल न खाना। इस परेशानी से निपटने के लिए बायो एब्सॉर्बेबल स्टेंट अस्तित्व में आए।
 
बायो एब्सॉर्बेबल स्टेंट ऐसे पदार्थ के बने होते हैं जो इसके क्षरण व जंग लगने की दर से बचाव करता है। बारह मार्च,2009 को लैंसेट के अंत में एब्सॉर्ब ट्रायल में कारगरता,सुरक्षा,प्रमुख विपरीत कार्डियक घटनाएं और स्टेंट थ्रॉम्बोसिस का अन्वेषण किया गया। यह पाया गया कि वे थक्के के महत्वपूर्ण घटाव के साथ और धमनी में पुनः रूकावट पैदा किए बिना बायो-एब्सॉर्ब हो गए,यानी जैविक रूप से उनका विलय हो गया।
 
बायो एब्सॉर्बेबल स्टेंट की एक खासियत यह है कि यह कुदरती धमनी को स्वस्थ करके आराम से घुल जाता है। धात्विक स्टेंट की तरह न तो इसमे स्टेंट को हटाने के लिए सर्जरी की ज़रूरत है और न ही थक्का हटाने के लिए एंटीप्लेटलेट थैरेपी की आवश्यकता है। पिछले 20 वर्षों में कोरोनरी इंटरवेंशन में नई चीज़ें हासिल करने के लिए बहुविषयक प्रयास किए गए हैं। इससे सुरक्षा,कारगरता और लगाने में आसानी जैसे उद्देश्यों की प्राप्ति हुई है।
 
बायो एब्सॉर्बेबल स्टेंट कोरोनरी आर्टरी रोग के उपचार का भविष्य है। अन्य स्टेंटों की कमियों को ध्यान में रखते हुए ये स्टेंट रक्त प्रवाह को बरकरार रखने के लिए तैयार किए गए हैं। ये बंद धमनियों को चौड़ा करते हैं और धमनी को स्वस्थ होने तक सहारा देते हैं।

47 साल पुरानी तकनीक है एंजियोप्लास्टी
एंजियोप्लास्टी की तकनीक सबसे पहले १९६४ में इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट डॉ. चार्ल्स डॉटर द्वारा खोजी गई थी। डॉ. डॉटर ने ही पैरों की नसों की समस्याओं के उपचार में कैथेटर द्वारा स्टेट डालने की शुरुआत की थी।

उन्होंने १६ जनवरी १९६४ को एक ८२ साल की महिला मरीज के पैर की धमनी में आई रुकावट को ठीक किया था। इस मरीज के पैर में गैंग्रीन हो गया था तथा इसने पैर कटवाने से इंकार कर दिया था। डॉ. डॉटर ने मरीज की नसों में आई रूकावट को एक कोएक्सियल टैफ्लॉन कैथेटर और गाईड वायर से दूर किया था। इससे मरीज़ के पैर में खून का संचार पुनः स्थापित हो गया । मरीज़ दो साल बाद निमोनिया के कारण मरी। डॉ. डॉटर को इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी का पितामह माना जाता है। उन्हें 1978 का नोबल पुरस्कार मिला था।

दिल की धमनियों में एंजियोप्लास्टी का पहला केस जर्मन कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. आंद्रियाज ग्रुंजन्जिंग ने 1977 में ठीक किया था(अशोक सेठ,सेहत,नई दुनिया,जनवरी द्वितीयांक,2011)।

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