रविवार, 30 जनवरी 2011

प्रतिरोधक क्षमता और दीर्घायु(भाग-1)

बदलते मौसमों से उम्र भर तो पहले भी लडऩा पड़ता था लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग के इस दौर ने चुनौतियां और बढ़ा दी हैं। साथ ही महानगरों के तेजरफ्तार जीवन ने शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता को अधिक कमजोर कर दिया है। नियमित एक्सरसाइज, संतुलित आहार व समय पर भोजन के चौतरफा सुझाव मिलते हैं ताकि मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ रहा जा सके। लेकिन मल्टीनेशनल कल्चर के इस दौर में अपने खानपान व सेहत सम्बंधी कार्यक्रम को समयबद्ध करना लगभग असंभव है। जाहिर है ऐसी स्थिति में शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता या इम्यूनिटी का कमजोर होना भी स्वाभाविक है, जिसका अर्थ है कि आपका शरीर विभिन्न प्रकार के भौतिक व पर्यावरण सम्बंधी तनावों का प्रतिरोध करने में सक्षम नहीं होता लेकिन यह भी जरूरी है कि तमाम चुनौतियों के बावजूद शरीर को ऐसा बनाया जाये कि वह रोगों को दूर करने के लिए कवच बन जाये। इसके लिए लाजिमी हो जाता है कि आप अपनी सेहत, जीवनशैली और कार्यस्थल के माहौल पर विशेष ध्यान दें ताकि आपके शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ जाये।

यह दोहराने की शायद आवश्यकता नहीं है कि जब शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता कम होती है तो तापमान के गिरने या बढऩे से या संक्रामक रोगों के फैलने से आप फौरन बीमार हो जाते हैं जबकि जिनकी प्रतिरोधात्मक क्षमता मजबूत होती है वे कभी कभार ही बीमार पड़ते हैं। यह सही है कि इम्यूनिटी काफी हद तक वंशानुगत (जेनेटिक) होती है लेकिन आपके वातावरण में जो कीटाणु (जम्र्स) होते हैं उनका सामना करने से यह बढ़ जाती है। जितने अधिक प्रकारों के कीटाणुओं का आप सामना करेंगे, जाहिर है सीमित संख्या में उतना ही मजबूत आपका इम्यून सिस्टम हो जायेगा क्योंकि आपका शरीर न केवल कीटाणुओं को पहचानने लगेगा बल्कि उनका प्रतिरोध भी करने लगेगा। इसलिए टीकाकरण महत्वपूर्ण हो जाता है। टीकाकरण के अतिरिक्त कोई और जरिया नहीं है जिससे विरासत में मिली इम्यूनिटी को मजबूत किया जा सके। लेकिन आप अपने वातावरण को जरूर परिवर्तित कर सकते हैं।

आगे बढऩे से पहले यह जान लें कि इम्यून कोशिकाएं हमारे शरीर में त्वचा से लेकर अंदर तक सभी जगह होती हैं। आमतौर से वयस्कों का इम्यून सिस्टम बहुत मजबूत होता है जिसमें हजारों कीटाणुओं की मेमोरी होती है। लेकिन पर्यावरण की वजह से इन इम्यून कोशिकाओं का स्तर प्रभावित हो सकता है और अध्ययनों से मालूम हुआ है कि अस्वस्थ जीवनशैली, थकान व तनाव भी इम्यूनिटी को कम कर देते हैं। शायद यही वजह है कि मधुमेह (डायबिटीज) या हृदय रोगों को ‘जीवनशैली रोग’ कहा जाता है।

अगर आप जीवनशैली रोगों से परेशान हैं तो जीवनशैली में सुधार करके अपने शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता को बढ़ा सकते हैंं। लेकिन अगर आपको कुछ रोग विरासत में मिले हैं तो अपने शरीर को रोगमुक्त या रोग कवच बनाने की सिर्फ तीन चीजें हैं, एक्सरसाइज, संतुलित व पौष्टिक आहार और तनाव को नियंत्रित रखना।
सक्रिय जीवनशैली अच्छी सेहत की निशानी है। इसलिए सभी विशेषज्ञ कहते हैं कि आप दिन में कम से कम आधा घंटा कोई ऐसा काम अवश्य करें जिससे शरीर हरकत में रहे, जैसे तेज चहलकदमी, जिम, स्पोट्र्स, साइकिलिंग, ऐरोबिक्स आदि। एक्सरसाइज का सबसे बड़ा फायदा यह है कि पसीने के जरिये शरीर से जहरीले पदार्थ (टॉक्सिन) बाहर आ जाते हैं और शरीर के भीतर एंड्रोफिन्स जारी होते हैं जो तनाव स्तर को नियंत्रित रखते हैं। ध्यान रहे कि तनाव से इम्यूनिटी बहुत अधिक प्रभावित होती है। अगर आप योग करते हैं तो प्राणायाम जरूर करें क्योंकि इससे शरीर व मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और इम्यूनिटी भी बेहतर होती है। इस संदर्भ में अनुलोम विलोम और कपालभाति भी अच्छी योग क्रियाएं हैं। आप अपनी आयु वर्ग के हिसाब से भी खानपान व एक्सरसाइज का चयन कर सकते हैं ।

पौष्टिक व संतुलित आहार आपको रोगों से लडऩे की क्षमता प्रदान करता है। संतुलित आहार का अर्थ है वह भोजन जिसमें सब्जियों और प्रोटीन का अच्छा मिश्रण होता है जैसा कि दादी मां की थाली में देखने को मिलता था। पौष्टिक आहार का अर्थ है कि भोजन में पर्याप्त मात्रा में विटामिन व खनिज हों ताकि शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता को मजबूत किया जा सके। जिन फूड्स में विटामिन ए, बी, सी व ई, फोलेट और कैरोनोइड्स व खनिज जैसे जिंक, क्रोमियम व सेलिनियम होते हैं वह न केवल इम्यूनिटी बढ़ाते हैं बल्कि स्वस्थ इम्यून सिस्टम के लिए भी जरूरी हैं। प्रोटीन के लिए चिकन, फिश और दाल (विशेष रूप से मूंग व मसूर) खायें ताकि शरीर को ईंधन मिले। विटामिन सी के लिए संतरा, मौसमी, आंवला, नींबू आदि लें और अपनी इम्यूनिटी का स्तर बढ़ाएं।

कुछ समय पहले जो अध्ययन किया गया था उसमें 5 वंडर फूड्स को क्रमबद्ध किया गया था जिसमें दही को पहले नम्बर पर इसलिए रखा गया था कि वह प्रोबायोटिक्स (अच्छे बैक्टीरिया जो पाचन में मदद करते हैं) का अच्छा स्रोत है। बाकी 4 फूड्स थे संतरा, पालक, मछली व नट्स। ध्यान रहे कि आयुर्वेद में अच्छे पाचन को ही स्वस्थ इम्यूनिटी स्तर से जोड़ा जाता है। स्वस्थ रहने के लिए आयुर्वेद तीन पहलुओं पर जोर देता है—आहार, विहार (जहां हम रहते हैं) और द्रव्य (दवाएं जो हम खाते हैं)। आयुर्वेद में हल्दी, दालचीनी, अदरक, लहसुन और शहद के बारे में समझा जाता है कि इनसे शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ती है। बहरहाल यह भी आवश्यक है कि जो भी फूड्स आप लें वे ताजे हों। रेफ्रिजरेटर में रखे या प्रोसेस्ड फूड सांस व पेट की परेशानियां पैदा कर सकते हैं। दमा या कुछ प्रकार की एलर्जियां पहले विरासत में मिले रोग समझे जाते थे लेकिन अब यह जीवनशैली रोगों में शामिल हो गये हैं क्योंकि हम ऐसी चीजें खाने लगे हैं जिनमें कृत्रिम रंग या प्रिजरवेटिव्स होते हैं।

इम्यूनिटी में मन व शरीर का गहरा सम्बंध है। अगर तनावग्रस्त होंगे तो बहुत आसानी से संक्रामक रोग पकड़ लेंगे। डिप्रेशन या तनावग्रस्त होने पर आप अपने आहार और जीवनशैली पर भी ध्यान नहीं दे पाते। मानसिक थकान की वजह से नींद नहीं आती और आप रोगों से लडऩे के लायक नहीं रहते। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि आप तनाव को नियंत्रित रखें या तनावमुक्त रहें। तनावमुक्त रहने के लिए यह सुनिश्चित करे कि रोजमर्रा की स्थितियों पर आपकी प्रतिक्रिया संतुलित है। हास्य व एक्सरसाइज के जरिये अपने मस्तिष्क में अच्छे रसायनों का स्तर बढ़ाएं और इस तरह तनावमुक्त रहें।

संक्षेप में कहें तो एक्सरसाइज, संतुलित व पौष्टिक आहार और तनावमुक्त रहने से आप अपने शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता या इम्यूनिटी को मजबूत कर लेते हैं और आपका शरीर ऐसा कवच बन जाता है जो आपसे रोगों को दूर रखता है फिर चाहे मौसम का मिजाज कितना ही बदलता रहे।
(शेष कल सुबह)।

5 टिप्‍पणियां:

  1. बदलते मौसम के लिए आपने बहुत बढ़िया जानकारियाँ दी हैं!

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  2. एक्सरसाइज, संतुलित व पौष्टिक आहार और तनावमुक्त ---सही कहा , सुखी स्वस्थ जीवन के यही मन्त्र हैं ।

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  3. बहुत अच्छी और ज़रूरी जानकारी ....

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  4. बहुमूल्य जानकारी है यह!
    तनावों को कम करनें के उपायो पर जरा विस्तार से बताएं
    कैसे पता चले कि हमारे तनाव अब डिप्रेशन में बदल चुके है?

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  5. बहुत ही अच्छी जानकारी के लिए शुक्रिया

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