बुधवार, 29 दिसंबर 2010

एम्स का प्राईवेट वार्ड हुआ महंगा

आम लोगों के विरोध पर केंद्र सरकार अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के प्राइवेट वार्ड की फीस बढ़ाने तक ही सीमित रही। प्राइवेट वार्ड का इलाज खर्च 76 फीसदी तक बढ़ाने की बात स्वीकारी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय यह तर्क दे रहा है कि प्राइवेट वार्ड की फीस बढ़ाकर गरीब लोगों को राहत देना चाहता है, जबकि नवंबर में एम्स के वित्त सलाहकार को सरकुलर जारी कर मंत्रालय ने डॉक्टरों की फीस समेत दवा पर खर्च होने वाली राशि मरीजों से वसूलने की रूपरेखा तैयार करने को कहा था।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एम्स के प्राइवेट वार्ड की फीस में बढ़ोतरी की स्वीकारी है। सरकार के इस स्वीकारोक्ति से प्राइवेट वार्ड की फीस में 76 फीसदी तक बढ़ जाएगी, यानी ए श्रेणी के डीलक्स का चार्ज 1700 रुपये प्रतिदिन के बदले 3000 रुपये वसूले जाएंगे। मंत्रालय का कहना है कि स्थाई वित्त समिति और एम्स की गवर्निंग बॉडी ने प्राइवेट वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों के इलाज खर्च में बढ़ाने पर सहमति दी थी। इससे सामान्य वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों पर आने वाले खर्च की पूर्ति की जा सकेगी। मंत्रालय यह तर्क दे रहा है कि प्राइवेट वार्ड में भर्ती होने वाले मरीज इलाज का खर्च खुद उठाते हैं। इससे सामान्य मरीजों के ऊपर प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन मंत्रालय के इस दलील में कोई दम नहीं है। मंत्रालय ने दो नवंबर को एम्स की वित्त सलाहकार बसंती दलाल को पत्र लिखकर तमाम खर्च की समीक्षा करने के लिए कहा था। पत्र में कहा गया है कि वर्तमान में मुफ्त इलाज की नीति को लेकर चलना ठीक नहीं है। इलाज करने वाले डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ,सर्जन आदि का खर्च मरीजों से वसूला जाए। मरीजों के लिए उपयोग किए जा रहे उपकरणों के रखरखाव और मरम्मत भी सरकार के पैसे से हो रहा है। यह खर्च सरकार के वहन करने की क्षमता से अब बाहर हो रहा है। पिछली बार 22 जनवरी 2006 को शाम के समय एम्स के ओपीडी में पोस्टर चिपका कर उपभोक्ता शुल्क लगाने की जानकारी मरीजों और फैकल्टियों को दी गई। लोगों के भारी दबाव के आगे सरकार को झुकनी पड़ी और उपभोक्ता शुल्क को वापस लेनी पड़ी थी। वर्ष 1990 से अब तक पांच बार इस तरह के प्रयास किए जा चुके हैं(अमर उजाला,दिल्ली,29.12.2010)।

3 टिप्‍पणियां:

  1. क्या यह बचत का पैसा गरीबों तक पहुँच पायेगा!

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  2. बहुत पहले एक फ़िल्म आई थी, ’आज का एम.एल.ए. राम अवतार’ चाय का रेट एक रुपये से तीन रुपया कर दिया गया और फ़िर पब्लिक को खुश करने के लिये दो रुपया। सब खुश ’आल इज़ वैल।’
    1700 से बढ़ाकर 3000 की घोषणा और फ़िर इसे कम करके 2500 कर दिया जायेगा और पब्लिक पर अहसान का जूता मार दिया जायेगा।

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  3. सवाल ये है कि जो पैसा अब तक खर्च हुआ क्या वो गरीबों तक पहुंचा। अगर पहुंचा हुआ होता तो ये हालात नहीं होती। दूसरा देश में प्राथमिक स्वास्थय केंद्रों की स्थिती बेहतर होती तो एम्स जैसे अस्पतालों का खर्च नहीं बढ़ता।
    तीसरा एम्स की उन्नत चिकित्सा व्यवस्था अगर गरीबों तक नहीं पहुंची तो फायदा क्या। पैसे वालो को इलाज मिल सकता है पर गरीबों को कौन देखेगा। उन्हें बेहतर ईलाज का हक नहीं है क्या?

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