बुधवार, 10 नवंबर 2010

फ्यूचर फोबिया

‘सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना। न होना तड़प का, मुर्दा शांति से भर जाना।’ पंजाबी पोएट अवतार सिंह संधू की ये लाइन पढ़कर ऐसा लगता है जैसे इसे आज के कन्फ्यूज यंग प्रफेशनल के लिए ही लिखा गया है। उस प्रोफेशनल के लिए जिसके पास टेक्नॉलजी और गैजेट्स से लैस रूम है, लैटेस्ट कार है और नौकरी में बड़ा औहदा है। फिर भी ये परेशान से हैं। इनकी परेशानी का नाम है ‘फ्यूचर फोबिया।’ क्या है ये फोबिया? और इसकी वजह से किन उलझनों का शिकार हो रहे हैं यंग प्रफेशनल्स? एकता सिन्हा की रिपोर्ट। ख्वाब देखना और अपने भविष्य के बारे में सोचना यूथ में एक नॉर्मल बात है। मगर इसको लेकर दिमाग में किसी तरह का टेरर या बीमारी जन्म लेने लगे तो बात बिगड़ जाती है। सोचने में आमतौर पर लोगों को लग सकता है कि ये बीपी और सिरदर्द जैसी ही कोई बीमारी होगी। मगर यंग जेनरेशन अपने फ्यूचर को लेकर इतनी सीरियस हो गई है कि सारी सुख-सुविधा के बावजूद उन्हें कई तरह के अन्जान से डर डराते रहते हैं। अपने भविष्य को लेकर कई तरह के डर ही हैं ‘फ्यूचर फोबिया।’ एक चौथाई जिंदगी के बाद रोहन के पास महंगा फ्लैट है, लेटेस्ट मॉडल की कार है, मोटी सैलरी है और आकर्षक बैंक बैलंेस हैं। लाइफ का अकेलापन दूर करने के लिए गैजेट्स और सोशल नेटवर्किग फ्रेंड्स की लंबी लिस्ट भी है। फिर भी एक अन्जान डर उन्हें बराबर सताता रहता हैं। इसकी वजह से उनकी लाइफ में छोटी-छोटी बातों को लेकर एक्साइटमेंट गायब हो गई है। चंडीगढ़ के रहने वाले रोहन कहते हैं, ‘मैंने 23 की उम्र में ही जॉब कर ली थी। मजबूरी थी। अपने काम से मैं जल्द ही अपनी उम्र के लोगों से ज्यादा सक्सैसफुल होता गया। मगर फिर भी अपनी मौजूदा प्रफेशनल लाइफ से संतुष्ट नहीं हूं। मॉडर्न जरूरत की सारी चीजें हैं फिर भी खुश नहीं हूं।’ 27 साल के रोहन को रह-रहकर एक ही ख्याल आता है कि कहीं उनके करियर में डाउनफॉल न शुरू हो जाए। वह बताते हैं, ‘एक साइकैट्रिस्ट को दिखाने पर उन्होंने मुझे फ्यूचर फोबिया का पेशंट बताया। जिसे बाहर के देशों में क्वार्टर लाइफ क्राइसिस के नाम से जाना जाता है।’ कन्फ्यूजन ही कन्फ्यूजन है एक्सपर्ट्स के मुताबिक लेटेस्ट गैजेट्स से लैस यंगस्टर्स के पास किसी सुविधा कमी नहीं है, बस उनकी जिंदगी से सपने, जोश और उत्साह बिल्कुल गायब हो गए हैं। रह गया है तो बस अपने भविष्य को लेकर ढेर सारा कन्फ्यूजन। इस कन्फ्यूजन के किसी बीमारी की हद तक बढ़ जाने को मेडिकल भाषा में ‘फ्यूचर फोबिया’ या ‘फ्यूचर फीयर’ कहते हैं। यह डर के शिकार यूथ दुविधा में फंसे रहते हैं। जिंदगी को कौन सी दिशा देने की जरूरत है, इसपर उनका दिमाग नहीं चलता। अब सवाल यह उठता है कि अपने भविष्य को लेकर आखिर डर किस बात का है? जिस भविष्य को यंगस्टर्स हमेशा से संवारने के सपने देखते हैं, उससे ही क्यों डर जाते हैं? साइकैट्रिस्ट बताते हैं.. एक एमएनसी में मार्केटिंग मैनेजर नेहा 30 साल की हैं और उन्हें हमेशा किसी अंजान घटना के घटने का अंदेशा बना रहता है। साइकैट्रिस्ट बताते हैं कि कई बारे यंगस्टर्स लैटेस्ट गैजेट्स के बहुत ज्यादा आदी हो जाते है। उन्हें लगने लगता है कि कल को ये गैजेट उनके पास न रहे तो वो इनके बगैर कैसे जिंदा रह पाएंगे। डॉ. नरेश एक साइकैट्रिस्ट हैं और मानते हैं कि कम उम्र में सफल होने के बावजूद आज के यंगस्टर्स में प्रेरणा की कमी है। जिसकी वजह से फ्यूचर फीयर जैसी अजीबोगरीब बीमारी उन्हें परेशान कर रही है। डॉ. नरेश बताते हैं, ‘मेरे पास रोजाना पांच-छह यंगस्टर्स कोई न कोई प्रॉब्लम लेकर आते हैं। बीमारी कोई भी हो मगर एक चीज उन सब में कॉमन होती है और वह है उनके मिजाज में आई थकान। वजह ये है कि आज के बच्चों को हर चीज पलक झपकते ही चाहिए। इनमें धीरज की बहुत कमी है। धीरज की कमी होने से यंगस्टर्स तरक्की भी बहुत जल्दी कर लेते हैं और अपने काम से भी बड़ी जल्दी ऊब जाते हैं।’ क्या स्वार्थी है दुनिया भारत के अलावा पूरी दुनिया के यंगस्टर्स फ्यूचर फोबिया के मरीज हो रहे हैं। इसी प्रॉब्लम को खोजने की कोशिश विदेशी नॉवेलिस्ट अब्बी विलनर और अलेक्सांद्र रॉबिन ने भी अपने नॉवेल ‘क्वार्टर लाइफ क्राइसिस, यूनिक चैलेंजेज ऑफ लाइफ इन योर ट्वेंटीज’ में की है। समाजशास्त्री शैरी सब्बरवाल के मुताबिक फ्यूचर फोबिया इन दिनों के यंगस्टर्स में काफी ज्यादा दिखाई दे रहा है। शायद इसलिए भी कि आज दुनिया बहुत स्वार्थी हो गई है। जीने और आगे बढ़ने के लिए यंगस्टर्स को रोज किसी न किसी को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का रास्ता ही नजर आता है। इसका असर सोशियल डिवेलपमेंट पर पड़ता है। फोबिया नहीं फीयर है ये गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में साइकैट्रिस्ट डिपार्टमेंट के हेड डॉ. बी.एस. चवन इसे फ्यूचर फोबिया नहीं फ्यूचर फीयर मानते है। उनके मुताबिक इसे डर तो कह सकते हैं पर फोबिया कहना सही नहीं। डॉ. चवन कहते हैं, ‘ मेरे पास हफ्ते में दो-चार यंगस्टर्स ऐसे आते हैं। इन नए क्वालिफाइड यंगस्टर्स के पास नौकरी के मौकों की कमी नहीं है मगर फ्यूचर को लेकर कन्फ्यूजन है। इसे फ्यूचर फीवर कहा जाता है। जॉब तो इन्हें आसानी से मिल जाती है पर एक जॉब में ये कुछ दिन टिककर काम नहीं करते। धैर्य इतना कम होता है कि छोटी से छोटी बात पर नौकरी चली जाने का ख्याल आता रहता है। सक्सैस और डर का असर पर्सनल रिश्तों पर भी पड़ता है।’ क्या होता है जब ये होता है * अपनी पहचान ढूंढने की लड़ाई। * कामयाबी का हावी हो जाना। * कई बार पेरंट्स के बैकग्राउंड के बारे में बताने में झिझक होती है। * सफल हैं फिर भी इस फोबिया के कारण सफलता कम लगने लगती है। * इमोशनल और रोमैंटिक पहलू भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। किसी रिलेशन में न होने से इमोशनल वैल्यू कम हो जाती है। इस बीमारी में दवा से ज्यादा जरूरी है अपनी सोच पर काबू पाना। खुद को दूसरों से कम न समझो। काम के साथ खुद को भी महत्व दो। हर हाल में एंजॉय करना सीखो। अपनी हॉबी के लिए वक्त निकालो और हंसने का बहाना ढूंढो। डॉ. बी. एस. चवन, हेड, डिपार्टमेंट ऑफ साइकैट्री, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल अपने सारे सपनों को मुठ्ठी में समाने की कोशिश करें। अंदर कोई डर न रखें। हर बार जब आप गिरें तो बिना डर के उठें। फिर से नई जिंदगी शुरू करें। शैरी सब्बरवाल, समाजशास्त्री (एकता सिन्हा,दैनिक भास्कर,10.11.2010)

2 टिप्‍पणियां:

  1. एक प्रेरक रचना जो जीवन को नई उम्मीदों के साथ जीनी की सलाह देतीहै।
    ज़रा पाराग्राफ दें, पढने में असुविधा होती है।

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  2. महत्वपूर्ण विषय पर प्रकाश डाला है आपने। सचमुच, आज की युवा पीढ़ी भविष्य के प्रति भ्रमित है। इसके उपचार के बारे में थोड़ा और विस्तार से बताते तो ज्यादा अच्छा होता।

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