बुधवार, 10 नवंबर 2010

ब्लड शुगर

जब भी हम कुछ खाते हैं तो बॉडी उसे ग्लुकोज (शुगर) के रूप में तोड़कर खून में मिला देती है। पेनक्रियाज द्वारा तैयार किया गया हारमोन, जिसे इंसुलिन कहा जाता है, ब्लड में मौजूद ग्लूकोज को खून के जरिए कोशिकाओं तक पहुंचाता है, जिससे हमें ऊर्जा मिलती है। ध्यान रहे कि बॉडी उतनी ही मात्र में इंसुलिन तैयार करती है जितना कि हम भोजन करते हैं। जब हमारी कोशिकाएं इंसुलिन को रिस्पॉन्ड करना बंद कर देती हैं, तो वे इंसुलिन प्रतिरोधी बन जाती हैं और ग्लूकोज कोशिकाओं तक नहीं पहुंच पाता। इससे कोशिकाओं को जरूरत के मुताबिक ईंधन नहीं मिल पाता और ग्लूकोज खून में ही रह जाता है। जिसे हाई ब्लड शुगर कहा जाता है। यदि समय पर इसका इलाज न किया जाए तो यह किडनी, नर्व्स, हार्ट डिजीज, स्ट्रोक और आंख से जुड़ी कई बीमारियों को जन्म दे सकता है। जांच जरूरी इनसे बचने के लिए जरूरी है कि 18 वर्ष की उम्र से ही लोग ब्लड शुगर की जांच करवाना शुरू कर दें। जब भी अस्पताल जाएं या फिर डॉक्टर से मिलें, शुगर की जांच करवा लें। आप चाहें तो घर पर भी मशीन रखकर ब्लड शुगर की जांच कर सकते हैं। नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के पेडिएट्रिक्स विभाग के डॉ़ जितेंद्र साहु कहते हैं कि एक सामान्य ब्लड टेस्ट, जिसे फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज (एफपीजी) टेस्ट कहा जाता है, आपको बताता है कि बॉडी में ग्लूकोज की मात्र कितनी है। यदि आपका एफपीजी 100 से कम है, तो समझ लें कि आप स्वस्थ हैं। यदि एफपीजी 100 से 125 है तो सावधान हो जाएं, क्योंकि आप प्री डायबिटीज स्टेज पर हैं यानी जल्दी ही उसकी गिरफ्त में आने वाले हैं। एफपीजी 125 से ज्यादा होना डायबिटीज के खतरे के बढ़ना है। जल्द से जल्द ब्लड शुगर बढ़ने के कारणों का पता लगाकर उन पर कंट्रोल करें। इस बात की भी जांच करवाएं कि कहीं यह किसी दवाई का साइड इफेक्ट तो नहीं है! या फिर इंफेक्शन या अन्य बुखार की वजह से तो ऐसा नहीं हो रहा! वैसे, महिलाओं में पीरियड्स के दौरान होने वाले हारमोनल चेंजेंस भी कभी-कभी इसका कारण हो सकते हैं। ऐसे में सही इलाज के लिए जांच द्वारा सही कारण का पता लगाना सबसे जरूरी हो जाता है। इन्हें रखें ध्यान डॉ़ साहू के अनुसार कुछ खास बातों का ध्यान रखकर ब्लड शुगर पर नियंत्रण किया जा सकता है। - लंबाई के अनुसार नियत मात्र में कैलोरी लें और शरीर का वजन आदर्श बनाए रखें। यदि आपका वजन जरूरत से ज्यादा है तो पांच से सात प्रतिशत वजन कम करें। यदि आप दो-तीन किलोग्राम वजन भी कम करते हैं तो उससे काफी फर्क पड़ता है। विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि हाई रिस्क में पहुंच चुके मधुमेह के मरीज भी वजन कम करके इससे बच सकते हैं। - नियमित रूप से हर रोज कम से कम 30 मिनट शारीरिक श्रम, व्यायाम, योग, ध्यान आदि करें। आप चाहें तो हफ्ते में कम से कम पांच दिन 45 मिनट तक तेज-तेज चलकर भी ऐसा कर सकते हैं, लेकिन आपकी गति ऐसी हो कि 10 मिनट में एक किलोमीटर की दूरी तय कर लें। - भोजन में फाइबर की मात्र बढ़ाएं। जरूरत से ज्यादा वसा न लें, खासकर सेचुरेटेड फैट व कोलेस्ट्रॉल से बचें। बहुत अधिक मीठा या नमकीन खाने से बचें। - कम से कम शराब पिएं। - नियमित रूप से समय पर दवाएं लेना न भूलें। - यदि आप इंसुलिन लेते हैं तो डॉक्टर की सलाह से ही लें।

(सुषमा कुमारी,हिंदुस्तान,9.11.2010)

2 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी जानकारी के लिए धन्यवाद. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  2. जानकारी के लिए बहुत -बहुत धन्यबाद.

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