गुरुवार, 25 नवंबर 2010

सेहत और ग़रीबी

एक आम आदमी को स्वस्थ रहने की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है, इसका एक अंदाजा हाल में जारी विश्व स्वास्थ्य संगठन की सालाना वर्ल्ड हेल्थ रिपोर्ट से मिलता है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में हर साल करीब 10 करोड़ लोग अपनी बीमारियों की वजह से गरीबी की हालत में पहुंच जाते हैं। उनके सामने दो ही विकल्प होते हैं - या तो वे महंगी स्वास्थ्य सुविधाएं पाने के लिए अपनी सारी जमापूंजी गंवा दें या लंबी बीमारी के बाद मारे जाएं। यह एक दुष्चक्र है। ज्यादातर बीमारियां गरीबों को ही जकड़ती हैं। वे खेत और मकान बेचकर मरीज को बचाने की कोशिश करते हैं और इस एक वजह से पूरा परिवार सड़क पर आ जाता है।

आर्थिक बदहाली जितनी ज्यादा होती है, बीमारियां भी उतनी ही तेजी से घेरती हैं। बीमारियां जितनी ज्यादा होती हैं, बदहाली उतनी ही बढ़ती जाती है, क्योंकि कमाई बंद होने लगती है। डब्ल्युएचओ का सुझाव है कि अपने लोगों को इस दुष्चक्र से बचाने के लिए सरकारों को कम्युनिटी स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना चाहिए। फिलहाल भारत उन मुल्कों में है जहां हेल्थकेयर पर सबसे कम खर्च होता है। इस साल बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 22 हजार 300 करोड़ रुपये रखे गए जो हमारी जीडीपी का महज 0.36 प्रतिशत है। यह स्थिति तब है जबकि एड्स, पोलियो और मलेरिया के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों के लिए देश को बाहरी मदद मिल जाती है और कैंसर, हार्ट अटैक और डायबीटीज आदि नॉन कम्युनिकेबल डिजीजेज से प्राय: लोग अपने स्तर पर ही निपटते हैं। एक अनुमान के मुताबिक केंद व राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन मिलकर जितनी रकम स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करते हैं, उससे तीन गुना ज्यादा पैसा लोग खुद चिकित्सा पर खर्च कर रहे हैं। सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर किए जा रहे खर्च में इस अंतर की प्रमुख वजह बीमारियों से होने वाले नुकसान को व्यक्तिगत मान लिया जाना है।

इसका अभिप्राय यह हुआ कि किसी बीमारी से प्रभावित व्यक्ति और उसके परिवार को छोड़कर उसका समाज या देश पर कोई असर नहीं पड़ता। पर अब यह साफ हो गया है कि इनके अप्रत्यक्ष प्रभाव से देश को हजारों करोड़ का नुकसान हो रहा है। एक अनुमान है कि देश में 42 फीसदी मौतें नॉन कम्युनिकेबल डिजीजेज से होती हैं और ज्यादातर 35-64 की उम्र वाले लोग इनकी चपेट में आ रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि देश अपने कीमती वर्क फोर्स से वंचित हो रहा है। यदि सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को अजेंडे पर लेते हुए आम लोगों की सस्ती और अच्छी चिकित्सा मुहैया कराए तो देश की अर्थव्यवस्था पर भी इसका अच्छा असर पड़ सकता है(संपादकीय,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,24.11.2010)।

3 टिप्‍पणियां:

  1. गरीबों के लिए अच्छा स्वास्थ्य वाकई में एक बड़ी समस्या है। शिक्षा का प्रचार एवं जागरूकता तथा सरकार न संवेदनशील रुख काफी मददगार साबित हो सकता है।

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  2. सस्ती और अच्छी चिकित्सा सेवा भारत में। अपने जीतेजी तो असंभव है। अपने आसपास ऐसा कोई प्राइवेट अस्पताल नहीं है जो बिना जेब काटे काम करे। औऱ सरकारी अस्पताल ज्यादा बोझ और स्टाफ की बेरुखी के कारण बदलाह हैं।

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