शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

भारत में स्वास्थ्य की स्थिति पर विश्व बैंक की रिपोर्ट

सदियों से यह बात कही जा रही है कि स्वास्थ्य ही धन है। लेकिन स्वास्थ्य के मोर्चे पर भारत की स्थिति चिंताजनक है। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि विश्व बैंक के २०१० के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के २३ फीसदी टी.बी., ८६ फीसदी डिपथिरिया, ५४ फीसदी कुष्ठरोग, ४२ फीसदी पोलियो, २२ फीसदी टिटनेस और ५५ फीसदी मलेरिया के रोगी भारत में ही रहते हैं। सवाल है कि भारत में रोगियों की संख्या इतनी अधिक क्यों है? इसके पीछे कई वजहें हैं जैसे कि प्रति व्यक्ति डॉक्टरों की उपलब्धता, अस्पताल में बिस्तरों की उपलब्धता, धन की कमी और व्यवस्था में व्याप्त खामियों के कारण स्वास्थ्य के मोर्चे पर हमारा प्रदर्शन बेहतर नहीं है। केवल विकसित देशों की तुलना में ही नहीं, विकासशील देशों के तुलना में भी हमारे देश में स्वास्थ्य संबंधित मूलभूत संरचना और संसाधनों की कमी है। भारत में प्रत्येक साल प्रति व्यक्ति केवल २९ डॉलर ही खर्च किया जाता है। इस २९ डाल्ॅार के खर्च में केंद्र और राज्य सरकार के द्वारा संयुक्त रूप से प्रत्येक साल प्रति व्यक्ति २ से ३ डॉलर ही खर्च किया जाता है। बाकी पैसे निजी तौर पर खर्च किए जाते हैं। लेकिन "ए सब ग्रुप ऑन हैल्थकेयर फाइनेंशिंग एंड इंश्यूरेंस" ने स्वीकृत किया है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर सार्वजनिक खर्च कम से कम जीडीपी का २.५ फीसदी जरूर होना चाहिए। इसलिए संप्रग सरकार से आशा की जा रही थी कि वह स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का ३ फीसदी खर्च करेगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। फिलवक्त भारत में सार्वजनिक तौर पर जीडीपी का ०.९ फीसदी पैसा ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाता है। इसमें केंद्र सरकार के द्वारा ०.२९ फीसदी और राज्य सरकार के द्वारा ०.६१ फीसदी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाता है। इसमें से ६३ फीसदी पैसा मजदूरी और वेतन देने में ही चला जाता है। इसके बाद कम ही पैसा दवा, उपकरण और मूलभूत संरचना के लिए बच पाता है। इसलिए नीतिकारों को इस और ध्यान देना चाहिए कि इस देश की ४१ करोड़ जनता की दैनिक आमदनी १.२५ डॉलर से भी कम है। इससे एक बात साफ तौर पर जाहिर होती है कि भारत का एक बहुत बड़ा तबका ऐसा है जिसकी जिंदगी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर करती है। इस ओर इसलिए भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि भारत की अर्थव्यवस्था विकास दर की परिधि में चक्कर काट रहा है। इस साल भारत का जीडीपी ७.४ फीसदी है और अगले साल आठ फीसदी से अधिक होगा, ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है। ऐसे में विकास के पथ पर उन लोगों को भी समाहित करने की जरूरत है जो हाशिए पर जिंदगी के अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वैसे भी भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां समाज के निचले तबके के कल्याण को प्राथमिकता मिलना चाहिए(कुमार विजय का यह आलेख नई दुनिया,5.11.2010 में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से जूझता भारत शीर्षक से प्रकाशित हुआ है)।

3 टिप्‍पणियां:

  1. अब बराक ओबामा आ रहें हैं परमाणु बिजली घर स्थापित करने अब स्वास्थ्य की स्थिति अच्छी हो जाएगी ......बेशर्म नेताओं ने इस देश और समाज को प्रदूषित कर दिया है .......10 प्रतिशत लोग पूरे देश और समाज के गद्दार और गुनेहगार हैं इन्होने अपने स्वार्थ के लिए पूरी व्यवस्था को बीमार कर दिया है.......लोकतंत्र और निचला तबका इन हरामियों और गद्दारों की वजह से एक मजाक बनकर रह गया है......

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  2. इसकी एक वज़ह यह भी है कि दुनिया का हर छठा व्यक्ति भारत में रहता है । उनमे से ३८ % गरीबी रेखा से नीचे हैं ।
    फिर भी यहाँ हर तरह का इलाज़ उपलब्ध है । सारी दुनिया से सस्ता ।

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  3. यथार्थपरक, सामयिक और विचारोत्तेजक प्रस्तुति. आभार
    सादर,
    डोरोथी.

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