सोमवार, 8 नवंबर 2010

हरियाणाःफलों को विषाक्त बनने से रोकने के लिए 5 साल में भरे गए सिर्फ 5 सैंपल

24 घंटे डयूटी बजाने का रोना रोने वाले सरकारी अधिकारी कितनी ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों की पूर्ति करते हैं यह स्वास्थ्य विभाग के चिकित्सा अधिकारियों द्वारा की गई डयूटी से पता लगता है। घातक रसायनों से तैयार फलों को रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने पिछले पांच साल में केवल पांच सैंपल ही भरे हैं और इस दौरान किसी विक्रेता के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। यह खुलासा सूचना के अधिकार के तहत हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के ओल्ड कैंपस निवासी विजय गुप्ता द्वारा स्वास्थ्य विभाग से मांगी गई सूचना में हुआ है। गुप्ता ने पूछा था कि विभाग ने ऐसे कितने थोक व खुदरा फल विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई की जो घातक रसायनों से फलों को तैयार करते हैं और कितने सैंपल लिए गए हैं। इसके जबाव में स्वास्थ्य विभाग ने विभाग अब तक एक भी फल विक्रेता के खिलाफ कार्रवाई नहीं की और फलों के केवल पांच सैंपल की लिए हैं। विभाग ने यह माना है कि 29 अप्रैल 2009 को प्रधान सचिव ने पत्र लिखकर सिविल सर्जन, डिप्टी सिविल सर्जन, वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी, चिकित्सा अधिकारी व जहां वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी नहीं है वहां चिकित्सा अधिकारी को उनके अधीन क्षेत्र में खाद्य निरीक्षक के रूप में तैनात करने की अधिसूचना जारी की थी। जिले भर में लगभग डेढ़ सौ चिकित्सा अधिकारी तैनात है। सूचना में स्वास्थ्य विभाग ने यह भी माना है उन्हें यह जानकारी ही नहीं है कि कैल्शियम कार्बाईड व अन्य घातक रसायनों से मनुष्य को कौन-कौन से बीमारी हो सकती है। इसके अलावा विभाग ने बताया सैंपल लेने के लिए अधिकृत अधिकारियों ने पिछले पांच साल में कुछ नहीं किया है। यहां गौरतलब है कि जिले में अधिकांश फलों को घातक रसायनों के माध्यम से तैयार किया जाता है जो मनुष्य के शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। इसमें काफी रसायन तो ऐसे हैं जिनकी बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध है। बावजूद इसके जानकारी होते हुए भी स्वास्थ्य विभाग आंख मूंदे बैठा हुआ है। आक्सीटोक्सीन की बिक्री व प्रयोग की नहीं जानकारीः सूचना के जबाव विभाग ने बिना लाइसेंस के आक्सीटोक्सीन के इंजेक्शनों की बिक्री व इसके प्रयोग के बारे में किसी प्रकार की जानकारी होने से इंकार किया है। यहां तक कि आज तक किसी भी ऐसी डेयरी में छापा नहीं मारा गया है जहां दूध बढ़ाने के मकसद से पशुओं को आक्सीटोक्सीन के इंजेक्शन लगाए जाते हो जबकि अधिकांश पशु पालक धड़ल्ले से इस इंजेक्शन का इस्तेमाल कर रहे हैं(दैनिक जागरण,हिसार,8.11.2010)।

1 टिप्पणी:

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    जानकारी के अभाव में यदि कोई ऐसे कृत्य करे तो क्षम्य है, लेकिन यहाँ तो लोग जानते-बूझते हुए भी ऐसे कार्यों में संलग्न है । गैर-जिम्मेदारी की मिसाल है हमारा समाज। हम अपने दाइत्वों को भूल रहे हैं। शायद गिरते हुए नैतिक सामाजिक मूल्य ही इस पतन का कारण हैं

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