शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

कैशलेस विवाद का लाभ उठाने की कोशिश में अस्पताल

स्वास्थ्य बीमा ग्राहकों को कैशलेज इलाज सुविधा बहाल करने की राह में मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं। पहले इलाज के नाम पर भारी शुल्क वसूल कर बीमा कंपनियों को चूना लगाने वाले अस्पताल अब इस विवाद का लाभ उठाते हुए कई नई शर्तें मनवाने की कोशिश कर रहे हैं। कैशलेस इलाज विवाद हल करने के लिए इस माह की ८ तारीख को दिल्ली के अस्पतालों, टीपीए और पीएसयू बीमा कंपनियों के प्रतिनिधियों की बैठक होनी है। लेकिन अस्पताल जिस तरह से नई-नई शर्तें थोप रहे हैं, उससे नहीं लगता कि यह विवाद इतनी जल्दी हल हो पाएगा। कुछ अस्पतालों का कहना है कि अगर मसला सुलझाया ही जा रहा है तो सभी तरह की समस्याओं को हल किया जाए। सुविधाओं का वर्गीकरण, रेट का मानकीकरण, अस्पतालों की रेटिंग आदि मसलों पर एक राय नहीं बन पाई है। अब एक नया मसला यह उठाया जा रहा है कि टीपीए कैशलेस के मामले में भुगतान की समय सीमा घटाएं और तीन-चार दिन में ही भुगतान कर दें। इस तरह विवाद के इस मौके का फायदा उठाते हुए अस्पताल चाहते हैं कि अभी कैशलेस इलाज पर टीपीए उन्हें जो भुगतान महीने-पंद्रह दिन करते हैं, वह तीन-चार दिन में ही हो जाए। दिल्ली के एक बड़े अस्पताल के सीईओ ने इस मामले में कहा, "समय से भुगतान न मिल पाने से कैशलेस इलाज के मामले में अस्पताल हतोत्साहित होते हैं। इसी वजह से अस्पताल सीजीएचएस योजना के तहत भी इलाज करने में रुचि नहीं दिखाते क्योंकि वहां से भुगतान मिलने में कई महीने लग जाते हैं। यह अलग बात है कि सरकारी दबाव में केंद्र सरकार के कर्मियों को यह सुविधा बंद नहीं की जाती। लेकिन हमने करोड़ों का निवेश कर अस्पताल बनाए हैं, हमें हमेशा नकदी की जरूरत होती है। इसलिए हमने तो यहां तक कहा है कि जो कंपनियां जल्दी भुगतान करेंगी उन्हें हम रेट में रियायत दे सकते हैं। अगले हफ्ते होने वाली बैठक में इस बिंदु पर भी चर्चा होगी(दिनेश अग्रहरि,नई दुनिया,दिल्ली,3.9.2010)।"

2 टिप्‍पणियां:

  1. यह तो चिंताजनक बात है। हमने भी करा रखा है इस तरह का वीमा।

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  2. हां भई ये तो हमेशा ही नगद की कमी से जूझते रहते हैं। रेट में रियायत दे सकते हैं तो रेट को तय क्यों नहीं कर लेते। इस पांच सितारा अस्पतालों में सिर्फ दौलतमंद ही ईलाज करा सकते हैं। सरकार को ये लूटने के अलावा औऱ सरकार लूटने के अलावा कुछ करने से रही।

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