सोमवार, 6 सितंबर 2010

रोके नहीं रूक रहीं बीमारियां

इन दिनों भारत समेत लगभग पूरी दुनियां गंभीर रोगों की चुनौतियों से जूझ रही है। प्रचलित पुराने रोगों के अलावा नए उभरे रोग अधिक जानलेवा साबित हो रहे हैं। रोगों के खात्मे के नाम पर चलाए जाने वाले सरकारी कार्यक्रमों की या तो दिशा बदल दी गई है या उनकी मियाद बढ़ा दी गई है। दुनिया के स्तर पर सेहत की चैकसी करने वाला विश्र्व स्वास्थ्य संगठन भी सकते में है। इस संगठन ने वर्ष 2007 को अंतराष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा वर्ष के रूप में मनाया और दुनिया को आगाह किया कि घातक रोगों की चुनौतियों ने देशों की सीमाएं तोड़कर कहर बरपाने की तैयारी कर ली है। इसलिए जरूरत है कि सभी देश अपना स्वास्थ्य बजट बढ़ाएं तथा आपसी अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और मजबूत करें। भारत में जिन रोगों को भविष्य का खतरा बताया जा रहा है उनमें मलेरिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू के अलावा डायबिटीज, कैंसर, स्ट्रोक, हृदय रोग व तनाव सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। विश्र्व स्वास्थ्य संगठन ने भी पिछले वर्ष अपने वार्षिक रिपोर्ट में पर्यावरण विनाश तथा बढ़ती वैश्रि्वक गर्मी की वजह से गंभीर होते स्वास्थ्य संकट पर ध्यान केंद्रित किया था। उस रिपोर्ट की मुख्य चिंता यह थी कि वर्ष 2030 तक वातावरण में गर्मी बढ़ने से महामारियों, चर्म रोगों व कैंसर जैसी बीमारियों में काफी वृद्धि होगी और ये रोग भविष्य के सर्वाधिक मारक रोगों में गिने जाएंगे। संगठन की यह भी चिंता है कि रोगों के बढ़ने और जटिल होने के साथ-साथ अंग्रेजी दवाओं का बेअसर होना, महामारियों का और घातक होकर लौटना तथा रोगाणुओं व विषाणुओं का और आक्रामक होना भी भविष्य की बड़ी चुनौतियां होंगी। यदि हम स्वास्थ्य के अपने प्राथमिक ढांचे पर गौर करें तो सन 1972 में कुल 5,192 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र थे जो 1983 में बढ़कर 5,995 हो गए। ताजा आंकड़े के अनुसार मार्च 2007 तक देश में कुल 22,370 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोले जा चुके हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई है कि इनमें से लगभग 50 प्रतिशत स्वास्थ्य केंद्रों के पास न तो अपना भवन है और उनमें न ही पर्याप्त जरूरी सुविधाएं। नब्बे के दशक में वर्ष 2000 तक सबको स्वास्थ्य का लक्ष्य निर्धारित किया गया, तब कहा गया था कि देश में कम से कम 23 हजार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की जरूरत है, लेकिन 20 साल बाद भी न तो सबको स्वास्थ्य मिला और न ही स्वास्थ्य के प्राथमिक ढांचे ही खड़े हो पाए।। आजादी से पहले की बहुचर्चित भोर समिति ने सुझाव दिया था कि प्रत्येक 20 हजार की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के मुताबिक आज 27 हजार लोगों पर एक चिकित्सक है, जिनमें से 81 प्रतिशत चिकित्सक तो शहरों में हैं। सरकार की तमाम कोशिशों के बाद 18 प्रतिशत चिकित्सक किसी भी तरह से गांव के स्वास्थ्य केंद्रों में गए। इस पृष्ठभूमि में स्वास्थ्य का संकल्प और लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सर्वसुलभ बनाने का सपना अभी भी मृगमरीचिका लगाता है। प्रचलित बीमारियों को ही लें तो वर्षो तक उनके उन्मूलन अभियान चलाने के बावजूद मलेरिया, टीबी, डेंगू, स्वाइन फ्लू, कालाजार, खसरा, कालरा जैसे रोग आज पहले से भी खतरनाक हुए हैं। भारत में 1995 से पोलियो को खत्म करने का अभियान चल रहा है। पल्स पोलियो अभियान में 5 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को 6 खुराकें एक-एक महीने के अंतराल पर दी जाती है। इसमें 11 राज्यों के कोई 16 करोड़ बच्चों को शामिल किया गया, लेकिन तब भी पोलियो के विरुद्ध प्रचारित अंतिम युद्ध अंतिम नहीं बन पाया। यदि रोग उन्मूलन के नाम पर केंद्र सरकार का बजट देखें तो वर्ष 2006-07 में पल्स पोलियो के लिए 1004 करोड़ रुपये, अन्य टीकाकरण के लिए 327 करोड़ रुपये, क्षय रोग उन्मूलन के लिए 184 करोड़ रुपये का प्रावधन था, लेकिन रोगों की स्थिति लगातार बदतर ही हुई है। इन दिनों डेंगू, इंसेफलाइटिस, कालाजार, मलेरिया, मेनिंजोकाक्सीमिया जैसे घातक रोग लगभग सभी प्रदेशों में रोजाना किसी न किसी की जान ले रहे हैं। टीबी पहले से ज्यादा घातक होकर मल्टी ड्रग्स रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस के रूप में उभरा है। देश के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र मलेरिया, कालाजार एवं कालरा के चपेट में हैं। बिहार और उड़ीसा में सांप काटने से काफी मौतें हो रही हैं तो मध्य प्रदेश, राजस्थान में मलेरिया का आतंक है। उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के आसपास के क्षेत्रों में रहस्यमय दिमागी बुखार हजारों बच्चों की जान ले चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक अमीर देशों में सबसे ज्यादा मौतें हृदय रोग, मधुामेह, उच्च रक्तचाप, श्वांस जैसे रोगों से हो रही है। ये ऐसे रोग हैं जिन्हें महज जीवन शैली में बदलाव लाकर रोका जा सकता है। मध्यम आय वाले देशों में भी सर्वाधिक मौतें इन्हीं रोगों से हो रही हैं। लगभग यही आंकड़ा निम्न आय वाले देशों का भी है। 2002 में इन रोगों से पूरी दुनिया में कोई 5 करोड़ 70 लाख लोगों की मौतें हुर्इं। इनमें 72 लाख लोग हृदय रोग तथा 55 लाख हृदयघात से मरे। वजह धूम्रपान तथा मोटर गाडि़यों से उत्पन्न प्रदूषण बताया गया। वहीं निम्न तथा मध्यम आय वाले देशों में करीब डेढ़ करोड़ बच्चों की मौत पांच वर्ष से कम की उम्र में हो जाती है। हालांकि इनमें से 98 प्रतिशत को जरूरी चिकित्सा सुविधाएं देकर बचाया जा सकता है। रोग उन्मूलन के नाम पर राष्ट्रीय टीकारण कार्यक्रम भी बाजार की गिरफ्त में है। इस कार्यक्रम में फिलहाल 6 जानलेवा बीमारियों के लिए टीका लगाया जाता है। ये हैं टीवी, खसरा, डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटनेस तथा पोलियो। अब इस सूची में अनेक नए टीके भी जोड़े जा रहे हैं। इनमें हिपैटाइटिस बी, हिपैटाइटिस एच एन्फ्लूएंजा बी, चिकेनपाक्स, एमएमआर तथा न्यूमोकाक्स प्रमुख हैं। इन सबकी संख्या 11 होती है। प्राइवेट रूप से ये टीके लगभग 15 हजार रुपये में लगते हैं। अब बाजार का दबाव है कि इन टीकों को राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल कर लिया जाए। भारत जैसी तीसरी दुनिया के देशों में टीकाकरण को बढ़ावा देने और नए टीकों के प्रयोग को सरकारी कार्यक्रम में शामिल कराने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल एलाएंस फॉर वैक्सीन इनीशिएटिव बनाई गई है। इसका मुख्यालय भी विश्व स्वास्थ्य संस्था के जिनेवा स्थित भवन में है। इसके लिए सदस्य देशों ने मिलकर 20 हजार करोड़ रुपये का इंतजाम किया है। बाल चिकित्सकों के अखिल भारतीय संगठन इंडियन एकेडमी आफ पीडियाट्रिक्स की मदद से न्यूमोकाक्स वैक्सीन को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल कराने का तेज प्रयास जारी है। लगभग 3,500 रुपये कीमत का यह टीका 10 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा का बाजार खड़ा करेगा। यहां यह बताना भी जरूरी है कि इन टीकों की प्रमाणिकता अभी तक पूरी तरह विश्वसनीय तौर पर स्थापित नहीं हो पाई है। आज यह एक सर्वविदित तथ्य है कि दवा निर्माता कंपनियां चिकित्सकों की प्रभावशाली संस्थाओं का इस्तेमाल कर अपना प्रोडक्ट बेचती हैं। इन पर नियंत्रण के सरकारी अधिकार धीरे-धीरे खत्म किए जा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि इन बढ़ती बीमारियों की वजह आखिर है क्या? बढ़ता उपभोक्तावाद, बढ़ती भौतिक सुख-समृद्धि, बढ़ती तकनीक, रोगों के प्रति हमारी अज्ञानता और मूर्खतापूर्ण रवैया अथवा कुछ और?(डॉ.ए.के.अरूण,दैनिक जागरण,6.9.2010)

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत शोध के बाद तथ्यपरक जानकारी उपलब्ध कराई है आपने जो समस्या के प्रति चिंता भी ज़ाहिर करती है।

    गीली मिट्टी पर पैरों के निशान!!, “मनोज” पर, ... देखिए ...ना!

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  2. राधारमण जी,
    जिस देस में सिच्छा अऊर स्वास्थ दुनो को मिलाकर बजट में कुल खरच का दू प्रतिसत का प्रावधन रखा जाता है , ओहाँ देस का स्वास्थ का केतना चिंता होगा आसानी से समझा जा सकता है. आप त सचमुच सचेत करने वाला आँकड़ा सब दिए हैं. लेकिन नक्कारखाना में सीटी का आवाज के जईसा है ई सब.. अऊर सीटी बजाने वाला (व्हीसल ब्लोवर) को लोग बेकार समझता है.
    बहुत धन्यवाद जानकारी के लिए. अब लगले रहेगा आना जाना. लिस्ट में डाल लिए हैं.
    सलिल

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  3. राधारमण.....दो प्रतिशत देश का..औऱ 200 प्रतिशत सफेद कोट वाले खींच लेते हैं बाकी लोगो से अधिकतर....।

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