बुधवार, 18 अगस्त 2010

एम्सःइलाज़ में अव्वल;शोध में फिसड्डी

विश्व में अखिल भारतीय आयुर्विान संस्थान (एम्स) की साख लगातार गिरती जा रही है। वर्ष 1995 में जहां एम्स दुनिया के नामचीन आयुर्विज्ञान संस्थानों में तीसरे नंबर पर था, वही अब यह गिरकर 10वें स्थान पर पहुंच गया है। पिछले डेढ़ दशक में दुनिया के टॉप 25 आयुर्विान संस्थानों की तीन बार से अधिक रेटिंग हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की देख-रेख में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट्स इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च टेक्नोलॉजी के एक संयुक्त सर्वे के बाद एम्स को यह रेटिंग दी गई है। सुखद बात यह है कि गंभीर रोगियों को चिकित्सा देने सर्जरी के मामले में एम्स दुनिया में पहले स्थान पर है। गौरतलब है कि यहां लगातार रोगियों का दबाव बढ़ता जा रहा है, लेकिन डॉक्टरों की संख्या कम होने के बावजूद रोजाना होने वाली सर्जरियों की संख्या बढ़ती जा रही है। वर्ष 2009 में संस्थान में 80 हजार सर्जरियां की गई थी जबकि ओपीडी के जरिये करीब तीन लाख 14 हजार लोगों ने अपना इलाज करवाया था। यही नही, कुल 1 लाख 20 हजार से अधिक रोगियों को भर्ती भी किया गया था। यह संख्या वर्ष 2008 2007 में 12 फीसद कम थी। कहने के लिए यहां पर 25 रिसर्च क्लीनिक्स हैं। लेकिन यहां अब भी जरूरत से 35 फीसद फैकल्टी डॉक्टरों की कमी है। जो डॉक्टर्स प्रैक्टिसरत है, उन पर क्षमता से कई गुना रोगियों का दबाव है। एम्स में लीवर हृदय प्रत्यारोपण की भी सुविधा है। पुन: अंग स्थापन कोष भी है। यहां पर मर चुके व्यक्तियों के प्रत्यारोपण लायक अंगों को संरक्षित तरीके से रखा जाता है। संस्थान में कृत्रिम परखनली शिशु गर्भाधान केंद्र नेत्र प्रत्यारोपण विंग भी विकसित किया गया है। केंद्र की स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव ने कहा कि एम्स में बढ़ते रोगियों के दबाव को कम करने के लिए जल्द ही यहां एक स्क्रीनिंग केंद्र स्थापित होगा, जहां पर रोगियों का पंजीकरण होगा और यदि जरूरी नही हुआ तो रोगी को दूसरे सरकारी अस्पताल में रेफर किया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि एम्स दुनियाभर में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए विख्यात है(राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,18.8.2010)

1 टिप्पणी:

  1. जहाँ भ्रष्टाचार पर गहन शोध चल रहा हो वहां चिकित्सा के शोध की क्या जरूरत है ,एम्स में अगर ईमानदारी से चिकित्सा शोध को प्रोत्साहन दिया जाता तो आज इस देश में करप्सन का वेक्सिन का अविष्कार हो चूका होता जिससे शरद पवार जैसे लोगों को भी इमानदार बनाया जा सकता था ...

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