रविवार, 8 अगस्त 2010

ग्राहकों से ज्यादा कीमत वसूल रहीं दवा कंपनियां

करों में राहत के बावजूद उसका फायदा ग्राहकों तक नहीं पहुंचाने के मामले में अब दवा कंपनियां भी शामिल हो गई हैं। ये कंपनियां उत्पाद शुल्क में कमी और सरकारी फार्मूले के तहत दवाओं की कीमत तय होने के बावजूद ग्राहकों को पुरानी कीमत में दवा बेचने का मौका नहीं छोड़ रही हैं। मरीजों से मुनाफा कमाने के फेर में पिछले एक साल में कंपनियां ग्राहकों से कीमत के रूप में करीब 42 करोड़ रुपये ज्यादा ले चुकी हैं। नियंत्रक व महालेखा परीक्षक की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दवा कंपनियों ने उत्पाद शुल्क में हुई कटौती का फायदा ग्राहकों को दिया ही नहीं। जबकि इसके लिए राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण ने बाकायदा कंपनियों को निर्देश जारी किए। सीएजी ने ऐसे 17 मामले पकड़े हैं, जिनमें दवा कंपनियों ने कीमतों में कमी नहीं की और ग्राहकों से 9.82 करोड़ रुपये ज्यादा वसूले। इतना ही नहीं कंपनियों ने दवा की कीमतों के बारे में सरकारी दिशानिर्देशों और आदेशों का पालन भी नहीं किया। सीएजी के मुताबिक लेखा परीक्षण के दौरान पांच मामले ऐसे पाए गए जिनमें दवा कंपनियों ने सरकार द्वारा दवा की कीमत तय कर देने के बावजूद बाजार में उससे ज्यादा की कीमत पर दवा बेची। ऐसा करके दवा कंपनियों ने ग्राहकों से 32.07 करोड़ रुपये ज्यादा वसूल लिए। सिर्फ ग्राहकों को ही नहीं दवा कंपनियों ने सरकार को भी चूना लगाया है। सीएजी ने ऐसे कई मामले पकड़े हैं, जिनमें दवा कंपनियों ने सरकार को सेवा कर का ही भुगतान नहीं किया। ऐसे मामलों में दवा कंपनियों ने सरकार को करीब 183 करोड़ रुपये का चूना लगाया है। इतना ही नहीं आयुर्वेदिक व होम्योपैथिक दवाओं की कीमतों का आकलन अधिकतम न्यूनतम मूल्य (एमआरपी) नीति के तहत नहीं होता। जबकि कंपनियां बाजार में इन्हें एमआरपी के हिसाब से ही बेचती हैं। सीएजी की राय है कि सरकार को इन उत्पादों को तुरंत प्रभाव से एमआरपी के दायरे में शामिल कर लेना चाहिए। ऐसा नहीं होने की वजह से पिछले एक साल में ऐसे 26 मामलों में सरकार को 37.79 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा है(दैनिक जागरण,दिल्ली,8.8.2010)।

1 टिप्पणी:

  1. शर्मनाक है ये व्यवस्था और इसके लिए दवा निरीक्षक और लोभी-लालची दवा निर्माताओं के साथ-साथ भ्रष्ट मंत्री भी जिम्मेवार हैं | इन दवा कंपनियों ने दवा पर 70 से 80 प्रतिशत तक मुनाफा दवा विक्रेता कमा सकें इसकी भी व्यवस्था कर रखी है | जेनरिक दवाओं पर दवा विक्रेताओं को इतना ही मुनाफा होता है और इथिकल दवाओं पर 20 से 25 प्रतिशत | दवा जैसे इंसानी जरूरत जैसी बेहद उपयोगी वस्तु पर इस तरह की मुनाफा खोरी बेहद शर्मनाक है और इससे पूरी सरकारी व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगता है ,दवा निर्माता तो हैवान हैं ही |

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