सोमवार, 2 अगस्त 2010

आयुर्वेद व योग में 40 साल में सिर्फ सात पेटेंट

आयुर्वेद, योग जैसी भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की हम बातें चाहे जितनी भी करें, लेकिन नया शोध करने और उसे दुनिया की नजर में साबित करने के मामले में हम आज भी नाकारा साबित हो रहे हैं। हालत यह है कि पिछले चार दशक में हमारी शोध संस्थाओं को सिर्फ सात पेटेंट मिले जबकि इसी दौरान लगभग छह हजार पेटेंट जारी हुए। पिछले एक दशक में हमारे 32 आवेदन पेटेंट दफ्तरों की धूल खाते रहे जबकि लगभग तीन हजार ऐसे ही पेटेंट दूसरों को दे दिए गए। स्वास्थ्य मंत्रालय के दस्तावेजों के मुताबिक आयुष विभाग के तहत आने वाली विभिन्न शोध परिषदों के अब तक सिर्फ एक शोध को अमेरिकी पेटेंट दफ्तर और छह को भारतीय पेटेंट दफ्तर की ओर से मान्यता दी गई है। इनके 32 दावे विभिन्न पेटेंट दफ्तरों में सालों से अटके पड़े हैं। जिन दावों को हमारे संस्थान साबित नहीं कर पा रहे, उनमें आयुर्वेद के 14 आवेदन हैं। ये फार्मूले सर्दी-जुकाम से ले कर कैंसर तक के इलाज का दावा करते हैं। मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप सहित विभिन्न पेटेंट दफ्तरों में अब तक पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों पर आधारित छह हजार से ज्यादा पेटेंट जारी किए जा चुके हैं। खास बात यह है कि इनमें से लगभग 2600 मामलों में आवेदकों ने खुद माना है कि इनका आधार आयुर्वेद, योग जैसी भारतीय पद्धतियां हैं। उधर, स्वास्थ्य मंत्रालय के आयुष विभाग के तहत काम करने वाले शोध संस्थानों की पिछले दस सालों की उपलब्धि के तौर पर सिर्फ तीन ऐसे पेटेंट हैं। सबसे पहला पेटेंट 1976 में मिला था। मिर्गी के इलाज के इस फार्मूले को आयुष- 56 नाम दिया गया। इसके बाद 1980 में मलेरिया की एक दवा, 1987 में त्वचा रोग के एक तेल और 1999 में ल्यूकेमिया के इलाज के फार्मूले को पेटेंट मिला। पेटेंट हासिल करने की प्रक्रिया से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि हमारे पिछड़ने की सबसे बड़ी वजह है अपनी चिकित्सा पद्धतियों का क्लीनिकल परीक्षण कर उनका प्रभाव साबित करने में हमारी उदासीनता। संतोष की बात है कि पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) परियोजना की वजह से अब हमारे पारंपरिक ज्ञान को हड़पना आसान नहीं है(मुकेश केजरीवाल,दैनिक जागरण,नई दिल्ली,2.8.2010)।

1 टिप्पणी:

  1. बेहद अफ़सोस जनक बात है..... अगर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए ही कुछ नहीं कर सकते हैं तो फिर और क्या उम्मीद की जाए?

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