सोमवार, 19 जुलाई 2010

फ्लू के खिलाफ

बुखार हर साल नए-नए रूप धर कर आ रहा है। इंसान डाल-डाल तो बीमारी पात-पात। कभी बर्ड फ्लू, कभी स्वाइन फ्लू तो कभी कुछ और। तभी तो दुनिया में हर साल फ्लू से ढाई लाख से पांच लाख तक लोग मरते हैं और उनमें 36 हजार अकेले अमेरिका में। लगातार शक्ल बदलने वाले स्वाइन फ्लू के एच1एन1 वायरस ने तमाम औरतों, बच्चों की जान ली है। इसी तरह बर्ड फ्लू के एच5एन1 ने मारे तो ज्यादा नहीं, पर अपने ज्यादा खतरनाक होने की गुंजाइश बनाए रखी है।

कंपनियां जो दवा इस साल के लिए बनाती हैं, वह अगले साल काम करेगी, इसकी गारंटी नहीं रहती। लेकिन जल्दी ही इन्फ्लुएंजा के वायरस को यह अहसास हो जाएगा कि अगर वह डाल -डाल है तो इंसान पात-पात चढ़ने में कामयाब हो गया है।

वायरस को सबसे बड़ा घमंड इसी बात का रहा है कि इंसान उसकी भाषा नहीं समझ पाता। अगर किसी साल कड़ी मेहनत कर वह समझ भी लेता है तो अगले साल वायरस नई भाषा बोलने लगता है। साल दर साल म्यूटेशन करने वाले फ्लू वायरस ने अपनी नई- नई श्रृंखलाओं से वैज्ञानिकों और दवा कंपनियों को हैरान कर रखा था।

लेकिन अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फे क्शस डिजीजेज (एनआईएआईडी) ने ऐसी सार्वजनीन वैक्सीन बना लेने का दावा किया है, जिसके लगा देने से मनुष्य कई साल तक सभी तरह के इन्फ्लुएंजा वायरसों से सुरक्षित रहेगा। दो चरण में लगाई जाने वाली यह वैक्सीन मनुष्य को आजीवन सुरक्षित बना सकती है।

पहले चरण में प्राइमिंग यानी कवच चढ़ाया जाएगा और दूसरे चरण में बूस्टर दिया जाएगा। यह वैक्सीन हेमाग्लूटिनिन नाम के प्रोटीन पर आधारित एक डीएनए से तैयार की गई है, जिसका आकार कुकुरमुत्ते जैसा है। यह डीएनए प्रोटीन के स्टेम में छुपे फ्लू के वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी पैदा करेगा जो संरक्षित रहेगा और वायरस के हर साल आने वाले नए रूप-रंग से लड़ सकेगा। वैक्सीन एक तरफ हमारी रोग प्रतिरोधी क्षमता को मजबूत करेगी तो दूसरी तरफ वायरस की चालाकियों को पहचान कर उसे खत्म करेगी। वायरस और इंसान की आदिम जंग में यह एकदम नए किस्म का हथियार है। यह उन सभी वैक्सीनों से काफी अलग किस्म की है, जो मुर्गी के अंडे पर आधारित पुरानी प्रौद्योगिकी से बनाई जाती रही है। यह वैसे ही काम करेगी जैसे हेपेटाइटिस की वैक्सीन। चूहों, नेवलों और बंदरों पर पहले चरण के परीक्षण से गुजर रही वैक्सीन को बाजार में आने में अभी तीन साल का समय है।

इस बीच महामारी का रूप लेने वाले तमाम तरह के फ्लू हमें परेशान कर सकते हैं और उनके लिए दवाइयां बदलने का सिलसिला जारी रह सकता है। नई बायोटेक्नोलाजी की प्रौद्योगिकी और उसी के साथ मजबूत होते दवा उद्योग ने हमारी सभ्यता को बीमारियों से लड़ने की बड़ी ताकत दी है, लेकिन एक दूसरे के ज्यादा नजदीक आने के कारण कई बीमारियों ने दुनिया में तेजी से फैलने और महामारी बनने का उदाहरण भी पेश किया है। छूत की ये बीमारियां लोगों की जान ही नहीं लेतीं, अर्थव्यवस्थाओं को ठप भी कर देती हैं। इसलिए इस वैक्सीन के खोज लिए जाने पर यूरेका-यूरेका! जैसी खुशी जरूर हो रही है, लेकिन मानवता की वह खुशी तब बदलेगी जब इसे सभी के लिए उपलब्ध कराया जाएगा(संपादकीय,हिंदुस्तान,दिल्ली,18.7.2010)।

2 टिप्‍पणियां:

  1. कुमार राधारमण जी
    .फ्लू के खिलाफ आलेख में आपने अच्छी जानकारी दी
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.
    विजय तिवारी ' किसलय '

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  2. यार अपने देश में हैजा से ही कई मर जाते हैं। कब मिलेगी हमारे देश को आम बीमारियों से छुटकारा। बड़ी बीमारी में तो बरतन भांडे तक बिक जाते हैं।

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