रविवार, 18 जुलाई 2010

स्वास्थ्य बीमा का फंदा

सुविधा को समस्या में तब्दील करने में हमारा कोई मुकाबला नहीं है। इलाज के लिए कैशलेस, बिना नकद भुगतान की सुविधा इसकी ताजा मिसाल है। स्वास्थ्य बीमा कंपनियों ने अपने ग्राहकों के लिए तत्काल भुगतान न कर कंपनी को बिल भिजवाने (कैशलेस) सुविधा इसलिए शुरू की थी ताकि वक्त-बेवक्त इलाज के लिए उन्हें पैसों के लिए कम-से-कम किसी का मोहताज न होना पड़े। बेशक इस सुविधा ने लोगों की जिंदगी आसान बनाई, लेकिन यह भी सच है कि इस सुविधा का दुरुपयोग भी खूब हुआ है। यह किसी से छिपा नहीं है कि अस्पताल प्रशासन, कुछ डॉक्टरों और जांच प्रयोगशालाओं के गठजोड़ से लोगों का मेडिकल खर्च बढ़ रहा है। कई डॉक्टर सिर्फ इसलिए बेमतलब की जांच को उत्सुक रहते हैं कि जांच बिल में उन्हें भी हिस्सा मिलता है। भुगतान दावों के बढ़ते बिल की वजह से ही सार्वजनिक बीमा कंपनियों को कैशलेस सुविधा के लिए शर्तें रखने के लिए मजबूर होना पड़ा है। अगर कोई बीमित मरीज बीमा कंपनियों द्वारा निर्धारित अस्पताल के अलावा कहीं और इलाज कराना चाहता है तो उसे खुद भुगतान करना होगा और बाद में वह भुगतान का दावा कर सकता है। दरअसल भारत में स्वास्थ्य बीमा अभी शैशवास्था में है। अभी महज दो फीसदी लोगों को ही स्वास्थ्य बीमा का कवर उपलब्ध है। बीमा प्रीमियम से लेकर बीमित व्यक्ति के इलाज तक के लिए अभी कोई कारगर फॉर्मूला नहीं बन पाया है। हमने कॉरपोरेट कल्चर की नकल तो कर ली है, लेकिन पेशेवराना दृष्टिकोण अब भी नहीं अपनाया है। बीमा कंपनियों के पैनल में शामिल होने और मोटे बिल पास कराने के लिए अस्पताल किस तरह के "हथकंडे" अपनाते हैं या बीमा कंपनियों के कर्मचारी अस्पतालों से जिस "सुविधा" की अपेक्षा करते हैं, वह कोई छिपा तथ्य नहीं है। इसके लिए किसी एक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आखिरकार भारत के हर नागरिक को स्वास्थ्य बीमा का संरक्षण तभी मिल पाएगा, जब इसका दुरुपयोग न हो(Nai Dunia,Delhi,17.7.2010)।

4 टिप्‍पणियां:

  1. भारत में, सरकारी बीमा कंपनियों और प्राइवेट बीमा कंपनियों में बस एक ही फर्क है. सरकारी बीमा कम्पनियाँ क्लेम देने में भ्रष्ट हैं तो प्राइवेट बीमा कम्पनियाँ, बीमा करने में भी भ्रष्ट हैं.

    प्राइवेट बीमा कम्पनियाँ सस्ते से सस्ता बीमा बेचने में होड़ करती हैं और क्लेम के वक़्त झट से नट जाती हैं कि फ़लां- फ़लां कारणों के चलते क्लेम दिया ही नहीं जा सकता. सरकारी बीमा कंपनियों के टॉप के बाबू निकम्मे ही नहीं हैं एकदम खाऊ भी हैं यही वह सबसे बड़ा कारण है कि सभी चारों सरकारी बीमा कम्पनियाँ केवल निवेश के मुनाफे पर ही चल रही हैं अन्यथा प्रतिवर्ष १०० रूपये के प्रीमियम पर १०० रूपये से ज्यादा के क्लेम दे रही हैं.

    १९७१ में साधारण बीमा उद्योग का राष्ट्रीयकरण भ्रष्टाचार व अव्यवस्था से उपजे घाटे के ही कारण किया गया था. आज फिर स्थितयां १९७१ जैसी ही हैं पर सरकार है कि कानों में रुई डाले सो रही है. हालत ये है कि लाखों करोड़ के इस पूरे उद्योग (जीवन बीमा सहित) को वित्त मंत्रालय में बस एक संयुक्त सचिव देखता है, मंत्री को तो इसके बारे में कोई हवा तक नहीं रहती कि उसकी नाक के नीचे हो क्या रहा है. IRDA के बारे में जितना कम कहा जाए उतना अच्छा.

    कुछ साल पहले वित्त मंत्रालय का एक ऐसा ही बड़ा बाबू आयं-बायं स्थानान्तार्ण की नीति बना चलता बना, जिसे सरकारी कम्पनियाँ आज भी भरत की तरह राम-खड़ाऊँ समझ पूज रही हैं, जिसके चलते रहा-सहा व्यवसाय भी प्राइवेट बीमा कंपनियों की झोली में बैठे-ठाले चला जा रहा है क्योंकि सरकारी कम्पनियों के जो लोग जी-जान लगाकर सालों की मेहनत से इन क्लाएंटों को कम्पनी से जोड़े रखते थे उनका स्थानान्तर्ण, पालिसी के नाम पर दूर-पार कर दिया जाता है. यही कारण है कि सक्षम लोग सरकारी बीमा कम्पनियाँ छोड़ कर चले जा रहे हैं और नालायक आज इन कंपनियों को चला रहे हैं. प्राइवेट बीमा कम्पनियाँ चुन-चुन कर केवल मुनाफे वाला बीमा कर रही हैं, सरकारी बीमा कम्पनियाँ बाक़ी बचा-खुचा घाटे का सौदा ले रही हैं. अंतर समझने के लिए, कभी किसी प्राइवेट बीमा कंपनी से अपने वाहन का वैधानिक 'Third Party Only' बीमा करवाने की कोशिश करके देखिएगा :-))

    सबसे मजे की बात तो ये है कि हरियाणा काडर के जिस बड़े बाबू ने सरकारी बीमा कंपनियों के लिए यह स्थानांतरण पालिसी बनाई थी उसके बारे में कहा जाता है कि वह कुछ ही महीनों के छोटे से अरसे के लिए वित्त मंत्रालय में नियुक्त रहा और प्राइवेट बीमा कंपनियों से मोटी रक़म लेकर सरकारी बीमा कंपनियों के लिए स्थानांतरण पालिसी बना कर चलता बना. ये बात अलग है कि बाद में CBI ने उसे धर दबोचा था. राम जाने उसके बाद क्या हुआ.

    यही कहानी TPAs (third party administrators) की भी है. सरकारी बीमा कंपनियों ने प्रशासनिक व्यय कम करने के नाम पर ३०% तक के कमीशन पर इन्हें नियुक्त किया. इन्होंने बीमित लोगों को काल-सेंटर के नंबर थमा अस्पतालों से यारी गाँठ ली. आम के आम और गुठलियों के दाम. प्रीमियम में से वैध कमीशन और अस्पताओं से भी बढ़ा-चढ़ा कर पेश किये जाने वाले बिलों में से कट. हींग लगी न फिटकरी और रंग भी चोखा चल निकट पर बकरे की मान कब तक खैर मनाती..डूबती लुटिया के चलते बीमा कंपनियों ने बचाओ बचाओ चिल्लाना शुरू कर दिया है ....यह बात दीगर है कि इस सबका खामियाजा अगर किसी को भुगतना है तो वह बस उपभोक्ता है. स्वस्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में भारत को अमरीका की नहीं, ब्रिटेन की नीति अपनाने की आवश्यकता है.

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  2. यही तो विडंबना है । यहाँ किसी भी योजना का सदुपयोग कम और दुरूपयोग ज्यादा होता है । यही हाल सरकारी योजनाओं का भी है । लेकिन इसके लिए जिम्मेदार भी तो कॉरपोरेट अस्पताल ही हैं ।

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  3. जब देश का चपरासी से लेकर राष्ट्रपति तक किसी समस्या का निदान खोजने या उसका कारगर निदान ढूँढने में कोई दिलचस्पी ना ले तो साडी सुविधा समस्या में बदलेगी ही | इस देश में अगले दस वर्षों में सिर्फ समस्या ही समस्या होगी क्योकि साडी नीतियाँ भ्रष्टाचार को बढ़ाने व बेईमान लोगों के फायदे के लिए बनायीं जा रही है | इंसानियत,देश व समाज के विकाश की चिंता ना तो देश के प्रधानमंत्री को है और ना ही देश के राष्ट्रपति को |

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