शुक्रवार, 4 जून 2010

मेडिकल शिक्षा की निगरानी

आम जनता को इससे कोई मतलब नहीं कि मेडिकल कालेजों का नियमन मानव संसाधन विकास मंत्रालय करे अथवा स्वास्थ्य मंत्रालय? उसके लिए महत्वपूर्ण यह है कि मेडिकल कालेज मानकों के हिसाब से चलें। मेडिकल शिक्षा को नियंत्रित करने को लेकर इन दोनों मंत्रालयों में खींचतान जारी रहना शुभ संकेत नहीं। प्रधानमंत्री को न केवल इस खींचतान पर रोक लगानी चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में वैसे मामले सामने न आएं जैसे मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया के अस्तित्व में रहते समय आए। इससे उत्साहित नहीं हुआ जा सकता कि मेडिकल शिक्षा को प्रस्तावित राष्ट्रीय स्वास्थ्य मानव संसाधन परिषद के हवाले करने की तैयारी हो रही है, क्योंकि निगरानी के अभाव में अव्यवस्था को अराजकता में तब्दील होने से रोकना मुश्किल है और इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि देश के ज्यादातर मेडिकल कालेज मानकों का उल्लंघन कर चलाए जा रहे हैं। यह ठीक है कि केतन देसाई का गोरखधंधा उजागर होने के बाद मेडिकल कौंसिल को भंग कर दिया गया, लेकिन कोई नहीं जानता कि केंद्र सरकार डेंटल कौंसिल के कामकाज से संतुष्ट क्यों नजर आ रही है? यथार्थ यह है कि डेंटल कौंसिल का कामकाज भी कुप्रबंधन की कहानी कहता है। केंद्र सरकार को इससे अवगत होना चाहिए कि मेडिकल कालेजों की तुलना में डेंटल कालेज कहीं अधिक मनमाने तरीके से संचालित हो रहे हैं। इन कालेजों में शिक्षक ही नहीं, प्रधानाचार्य भी पार्ट टाइमर हैं। मेडिकल कौंसिल का भ्रष्टाचार उजागर होने के बाद आवश्यकता इस बात की थी कि मेडिकल शिक्षा के ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन करने के कोई ठोस प्रयास किए जाते, लेकिन अभी भी ऐसा होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। एक संस्था को भंग कर उसी तरह की दूसरी संस्था बनाने का तब तक कोई मूल्य नहीं जब तक मेडिकल कालेजों को संचालित करने के तौर-तरीकों में तब्दीली नहीं लाई जाती। एक अनुमान के अनुसार देश में निजी क्षेत्र में चार सौ से अधिक मेडिकल और डेंटल कालेज स्थापित हो गए हैं, लेकिन उनमें प्रवेश के नाम पर कुल मिलाकर मनमानी ही अधिक होती है। नि:संदेह ऐसे ज्यादातर कालेजों के भवन भव्य हैं, लेकिन कोई भी यह देखने वाला नहीं है कि उनमें मेडिकल शिक्षा के लिए उपयुक्त संसाधन हैं या नहीं? यह कहने में हर्ज नहीं कि निजी क्षेत्र के ज्यादातर मेडिकल और डेंटल कालेज नीम-हकीमों की फौज तैयार करने में लगे हुए हैं। मेडिकल शिक्षा की अव्यवस्था से परिचित होने के बावजूद किसी को भी इसकी आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है कि निजी क्षेत्र के मेडिकल और डेंटल कालेजों में प्रवेश के लिए कोई राष्ट्रीय परीक्षा आयोजित की जाए। यह भी एक पहेली ही है कि मेडिकल की परास्नातक शिक्षा हासिल करने वाले लोगों के लिए सीमित स्थान क्यों रख छोड़े गए हैं? इसका कोई औचित्य नहीं कि परास्नातक स्तर पर महज 15000 सीटें ही रखी जाएं। चूंकि मेडिकल शिक्षा का स्तर गिरता चला जा रहा है इसलिए इस पर आश्चर्य नहीं कि स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा भी चरमराता हुआ दिख रहा है। केंद्र सरकार इस पर गर्व नहीं कर सकती और न ही उसे करना चाहिए कि देश में निजी क्षेत्र के ऐसे अस्पताल बढ़ रहे हैं जहां विदेशी नागरिक भी अपना इलाज कराने आ रहे हैं, क्योंकि सरकारी ढांचा आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है(संपादकीय,दैनिक जागरण,4 जून,2010)।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आम जनता से किसको मतलब है ?

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 06.06.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

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