बुधवार, 2 जून 2010

वैद्य विशारद और आयुर्वेद रत्न नहीं कर पाएंगे इलाज़

सुप्रीमकोर्ट ने कल अपने एक अहम फैसले में कहा है कि हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से 1967 के बाद वैद्य विशारद व आयुर्वेद रत्न की डिग्री लेने वाले वैद्यों की डिग्री कानूनी नहीं है। इन लोगों को मरीजों का इलाज करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से पिछले 43 वर्षो में हिंदी साहित्य सम्मेलन से डिग्री लेकर मरीजों का इलाज कर रहे हजारों वैद्यों का बोरिया बिस्तर बंध जाएगा। न्यायमूर्ति बीएस चौहान व न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ ने देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं का निपटारा करते हुए यह फैसला सुनाया है। राजस्थान, पंजाब-हरियाणा और दिल्ली हाईकोर्ट ने भी यही कहा था। उन फैसलों को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा, हिंदी साहित्य सम्मेलन न तो विश्वविद्यालय है, न डीम्ड विश्वविद्यालय और न ही शैक्षणिक बोर्ड है। यह संस्था सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत है। यह आयुर्वेद या चिकित्सा क्षेत्र सहित किसी भी विषय में शिक्षा देने वाली शिक्षण संस्था नहीं है। न तो कोई स्कूल कालेज या शैक्षिक संस्था इससे संबद्ध है और न ही यह खुद किसी विश्वविद्यालय या बोर्ड से संबद्ध है। कोर्ट ने कहा कि 1967 के बाद हिंदी साहित्य सम्मेलन ने किसी अधिकृत विधायी संस्था से मान्यता नहीं ली और न ही संस्था ने कानून के तहत मान्यता लेने के लिए आवेदन या प्रयास ही किया। सुप्रीमकोर्ट ने हिंदी साहित्य सम्मेलन के कामकाज पर कहा कि वह इस बात की कोई जांच पड़ताल नहीं करता कि परीक्षा देने वाले अभ्यर्थी ने किसी मान्यता प्राप्त कालेज से आयुर्वेद की बेसिक शिक्षा प्राप्त की है कि नहीं। यह संस्था सिर्फ परीक्षा कराती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिनियम 1970 के बाद से दूसरी, तीसरी और चौथी अनुसूची में दी गयी योग्यता नहीं रखने वाले व्यक्ति को मेडिकल प्रैक्टिस यानी इलाज करने का अधिकार नहीं है। सिर्फ राज्य अधिनियम के तहत स्टेट रजिस्टर में नाम शामिल हो जाने भर से व्यक्ति इलाज करने के योग्य नहीं हो जाता। वैद्यों की रोजगार के अधिकार की दलील काटते हुए कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) में प्राप्त रोजगार का अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है। इस पर जरूरी नियंत्रण लगाया जा सकता है। जरूरी योग्यता के अभाव में मेडिकल प्रैक्टिस पर रोक लगाने से समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होता है। कोर्ट ने कहा कि अदालत का कर्तव्य है कि वह वैद्यों को प्राप्त रोजगार के अधिकार और निरीह भारतवासियों को प्राप्त जीवन के अधिकार, जिसमें स्वास्थ्य सुरक्षा उपाय शामिल है, के बीच संतुलन कायम करे और आम जनता को गलत इलाज से बचाए। एक अयोग्य और गैर कानूनी मेडिकल प्रैक्टिशनर्स को अवैध डिग्री व प्रमाणपत्र के आधार पर गरीब देशवासियों का शोषण करने की अनुमति नहीं दी जा सकती(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,2 जून,2010)।

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