रविवार, 9 मई 2010

यूपीःबिगड़ती सेहत,सिसकता इलाज़

यूपी में बीमारियां हैं पर उनसे निबटने के मुकम्मल इंतजाम नहीं। जहां अस्पताल हैं, वहां डाक्टर नहीं। जहां डाक्टर हैं, वहां दवाइयां नहीं। जहां दवाइयां हैं, वहां उपकरण नहीं। जहां यह सब कुछ है वहां संवेदना नहीं। यह है देश में सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं का परिदृश्य। सूबे के दूर-दराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल होगा जब राजधानी में ही इलाज कराने में तमाम दुश्वारियां हैं। मसलन, राजधानी के पॉश कालोनी के 20 एकड़ में स्थित हाई प्रोफाइल डा. राममनोहर लोहिया अस्पताल को ही ले लीजिए। दस साल से ज्यादा पुराने इस सरकारी अस्पताल में आज भी आईसीसीयू, डायलिसिस, क्रिटिकल केयर, हृदय रोग सर्जरी, न्यूरो सर्जरी, पीडियाट्रिक सर्जरी, बर्न केयर, आन्कोलाजी आदि के इलाज की सुविधा नहीं है। वैसे जानकर हैरत होगी कि इनमें कई मर्ज के इलाज के डाक्टर हैं तो मशीने नहीं है। मिसाल के तौर पर अस्पताल में किडनी रोग के डाक्टर तो हैं लेकिन डायलिसिस की मशीन नहीं है। अब उस चिकित्सा एवं स्वास्थ्य महानिदेशालय का हाल देखिए जहां से प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था संचालित की जा रही है। महानिदेशालय का काम कैसा चल रहा होगा जब महानिदेशक के दो पद में एक खाली पड़ा है। निदेशक के 20 पदों में सिर्फ पांच भरे हैं। अपर निदेशक के कुल 90 स्वीकृत पदों में से पिछले महीने तक 72 खाली थे। जिस विभाग के मुख्यालय का ही यह हाल हो वह प्रदेश में चिकित्सा व्यवस्था को कैसे गुणवत्तायुक्त बना पाएगा? जहां तक डाक्टरों की कमी दूर करने के लिए चयन प्रक्रिया की बात है तो यह जानकर आप चौंक पड़ेंगे कि जिस प्रदेश में बेरोजगारी एक विकट समस्या बनी हो, वहां चिकित्सा क्षेत्र में सरकारी नौकरी के लिए पूरे अभ्यर्थी ही नहीं मिल रहे हैं। खासतौर से विशेषज्ञ डाक्टर तो सामने आ ही नहीं रहे हैं। चाहे एक्सरे या चेस्ट विशेषज्ञ हों, पैथोलाजिस्ट हों या फिर एनस्थेटिस्ट। इनके रिक्त पदों के लिए पूरे डाक्टर ही नहीं मिल रहे हैं। एनस्थेटिस्ट के तकरीबन डेढ़ सौ पद खाली होने से सरकारी अस्पतालों में बड़े व जटिल आपरेशन गिनती के ही होते हैं। क्रिटिकल सर्जरी के लिए करीब-करीब सभी गरीब मरीजों को निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ रही है। बदहाली का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि यहां राष्ट्रीय औसत के मुकाबले तकरीबन बीस फीसदी डाक्टर ही मौजूद हैं। देश में प्रति एक हजार जनसंख्या पर एक डाक्टर उपलब्ध है, जबकि सबसे बड़े राज्य उप्र में पांच हजार जनसंख्या पर एक डाक्टर। सरकारी हाल तो पूछिए ही नहीं। स्वास्थ्य विभाग में कुल चिकित्सकों के स्वीकृत पद लगभग साढ़े 12 हजार हैं जिसमें से लगभग चार हजार पद तब खाली हैं जबकि हाल के महीनों में बड़ी संख्या में डाक्टरों को रखने की कवायद की गई। दांत के डाक्टरों के कुल स्वीकृत 307 पदों में सौ से ज्यादा खाली चल रहे हैं। बच्चों के डाक्टरों के करीब 200 पद रिक्त हैं। ब्लडबैंक व पैथोलाजी चलाने को 150 पैथोलाजिस्ट की कमी है। पूरे स्वास्थ्य विभाग में एक भी माइक्राबायलोजिस्ट नहीं है। एक भी सरकारी अस्पताल में किसी भी प्रकार की कल्चर सेंसटिविटी जांच नहीं होती। अगर पैरा मेडिकल स्टाफ को देखा जाए तो फार्मेसिस्टों के 5222 स्वीकृत पदों में से ही लगभग तीन हजार, लैब टेक्नीशियन के 2150 स्वीकृत पदों में से चार सौ खाली पड़े हैं। मानकों के अनुसार सरकारी अस्पतालों के लिए 18 हजार नर्स चाहिए लेकिन स्वीकृत पद 4982 ही हैं उसमें भी 642 खाली चल रहे हैं। डेंटल हाइजेनिस्ट के 441 पदों में से 176 व आप्टोमेट्रिस्ट के 931 पदों में से लगभग 101 पद रिक्त चल रहे हैं। (दैनिक जागरण,लखनऊ,9.4.2010)

2 टिप्‍पणियां:

  1. हे राम.....जब कुछ है नहीं तो डॉक्टर क्या करेंगे आकर.....जब इतने पद खाली हैं तो क्या कर रही है सरकार..पहले मशीन तो पहुंचाओं फिर माहौल बनाओ , तब जाकर ही भर्ती निकालि जानी चाहिए..वैसे भी अब सेवा भाव से काम करने वाले डॉक्टर बचे ही कितने हैं..

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