सोमवार, 29 मार्च 2010

फिजियोथैरेपिस्ट 'डाक्टर' हैं या नहीं ?

कल के टाइम्स ऑफ इंडिया में,इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजियोथैरेपिस्ट का एक विज्ञापन छपा है। संघ के महाचसिव डॉ. संजीव कुमार की ओर से जारी यह सार्वजनिक सूचना फिजियोथैरेपिस्ट की पीड़ा को बयां करती है। सूचना के अनुसार, कुछ लोग और संस्थाएँ यह भ्रम फैलाने में जुटी हैं कि फिजियोथैरेपिस्ट अपने नाम में डाक्टर शब्द नहीं जोड़ सकते। एसोसिएशन का तर्क है कि अन्य विधाओं की ही तरह फिजियोथैरेपी भी इलाज की एक विधि है जिसमें रोगों, गड़बड़ियों अथवा अशक्तता के मूल्यांकन,जांच और उपचार की शारीरिक प्रक्रिया अपनाई जाती है। विज्ञापन में इस बात पर गुस्सा जाहिर किया गया है कि कुछ अनधिकृत लोग इस बारे में गुमराह करने का काम कर रहे हैं और आम लोगों के मन में ऐसी छवि बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि फिजियोथैरापिस्ट दवा भी लिखने लगे हैं । विज्ञापन में कहा गया है कि यह आरोप गलत और फिजियोथैरेपी उपचार-प्रक्रिया के सिद्धांतों के विपरीत है। विज्ञापन में दावा किया गया है कि फिजियोथैरेपिस्ट केवल शारीरिक तरीकों से उपचार करते हैं और कभी कोई दवा नहीं लिखते।
इस सार्वजनिक सूचना में कहा गया है कि क्लिनिकल स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वाला हर पेशेवर अपने नाम के आगे पारम्परिक रूप से डाक्टर लिखता है और ऐसे किसी भी व्यक्ति को अपने नाम के साथ डाक्टर जोड़ने का अधिकार नहीं है जिसने पी.एच.डी. अथवा एम.डी. न की हो। विज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि फिजियोथैरेपिस्ट अपने नाम के पहले डाक्टर और नाम के अंत में पी.टी.(फिजियोथैरेपिस्ट का संक्षिप्त रूप)स्पष्ट रूप से लिखते हैं । इस बात की ओर ध्यानाकर्षण किया गया है कि फिजियोथैरेपिस्ट,स्वास्थ्य सेवा से जुड़े एकमात्र पेशेवर हैं जो अपने नाम में प्रत्यय जोड़ते हैं।
विज्ञापन में कहा गया है कि फिजियोथैरेपिस्ट को अपनी पढाई पूरी करने में साढे चार से दस वर्ष तक लगते हैं और फिजियोथैरेपी भारत समेत अमरीका,ब्रिटेन,कनाडा आदि में पूरी तरह से औषधिरहित स्थापित चिकित्सा-पद्धति है। विज्ञापन में साफ कहा गया है कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को भारत में फिजियोथैरेपी पेशे को न तो विनियमित करने का कोई संवैधानिक अधिकार है और न ही फिजियोथैरेपी पेशे के बारे में गलत सूचना प्रसारित करने का। विज्ञापन में सभी संबंधितों को चेतावनी दी गई है कि वे फिजियोथैरेपी और फिजियोथैरेपिस्ट को बदनाम करने से बाज आएं।
पाठकों को बताता चलूं कि सामान्य डाक्टर मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया से शासित होते हैं मगर फिजियोथैरेपिस्ट के लिए ऐसी कोई शासी परिषद् नहीं है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इँडिया का कहना है कि उसका अधिकार-क्षेत्र केवल एलोपैथिक दवाओं तक है और उसके अनुसार,डाक्टर वही है जिसने एमबीबीएस किया हो। एमसीआई का कहना है कि आयुर्वेद,यूनानी,होम्योपैथी,सिद्ध आदि समेत ऐसी कई देसी चिकित्सा पद्धतियां हैं जिनके पेशेवर कभी किसी संस्थान में प्रशिक्षित नहीं हुए। दूसरी तरफ फिजियोथैरेपिस्ट एसोसिएशन का तर्क है कि अन्य विधा के डाक्टर की ही तरह वे भी एनाटोमी और फिजियोलॉजी का अध्ययन करते हैं और उनकी पाठ्यक्रम अवधि भी उतनी ही है जितनी कि किसी एलोपैथ की। एमसीआई का कहना है कि कौन डाक्टर है कौन नहीं इस बारे में उसे राय रखने का पूरा हक़ है मगर फिजियोथैरेपिस्ट कहते हैं कि यह तय करना एमसीआई के अधिकार-क्षेत्र में है ही नहीं। संघ पूछता है कि केवल दांत या आंख का अध्ययन करने वालों को किस आधार पर डाक्टर माना जाता है । दरअसल,यह सारा विवाद तब खड़ा हुआ था जब पिछले साल तमिलनाडु सरकार ने एक आदेश जारी कर फिजियोथैरेपिस्ट के डाक्टर लिखने पर पाबंदी लगा दी थी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस जानकारी के लिए आभार

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  2. पहले तो physiotherapist स्वतंत्र कार्य नहीं करते थे और ज्यादातर अस्थि रोग विभाग के अंतर्गत तकनीसियन का काम करते थे . वैसे तो आजकल पता लगाना मुसकिल हो गया है कि सामने वाला कौन सी पद्धति का चिकित्सक है .
    यह एक गंभीर देशव्यापी समस्या है और सरकार को इस बारे में नियम बनाये जाने की जरूरत है .

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