सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

बिहार में बीआरएमएस

नई दुनिया,दिल्ली संस्करण के 14 फरवरी के अंक में बिनोद बंधु जी की एक छपी रिपोर्ट जिसमें बिहार के स्वास्थ्य ढांचे का जायजा लिया गया है और बीआरएमएस की सफलता की संभावना पर प्रकाश डाला गया हैः बिहार गांवों का प्रदेश है । राज्य में ४५ हजार से अधिक राजस्व गांव हैं । अस्सी फीसदी से अधिक आबादी गांवों में निवास करती है । राज्य के शहरी का औसत ११ फीसदी है और बाजार का आकार ४.८ फीसदी। चार वर्षों में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने के तमाम प्रयासों के बावजूद हर एक हजार की आबादी पर एक अस्पताल का लक्ष्य अभी कोसों दूर है । राज्य में १४ हजार उपकेन्द्र की आवश्यकता है, लेकिन अभी इनकी संख्या नौ हजार ही है । आबादी के अनुसार पीएचसी की संख्या २ हजार ७०० होना चाहिए, लेकिन यह संख्या ५३३ । ये तो चिकित्सा क्षेत्र में आधारभूत संरचना का मसला है, राज्य सरकार की इससे भी बड़ी चुनौती है, मौजूदा अस्पतालों में चिकित्सक उपलब्ध कराना । डेढ़ दशक के लालू- राबड़ी राज में चिकित्सकों की नियुक्ति हुई ही नहीं । १९९० से पूर्व चिकित्सकों के स्वीकृत पदों में ४२ प्रतिशत अभी रिक्त हैं । बीते वर्ष अनुबंध पर राज्य सरकार ने २ हजार २०० चिकित्सकों की नियुक्ति की, इनमें ६०० ने काम छोड़ दिया।
ऐसे में साढ़े तीन वर्षों के बीआरएमएस कोर्स कराकर गांवों में डाक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की योजना को एक बेहतर विकल्प के बतौर देखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि अभी तो सुदूर ग्रामीण इलाके नीम- हकीमों के मोहताज हैं । ऐसे में साढ़े तीन वर्ष का मेडिकल कोर्स करने वाले चिकित्सक ग्रामीण जीवन के लिए संजीवनी साबित हो सकते हैं । कम से कम उनके पास प्राथमिक चिकित्सा की शिक्षा और प्रशिक्षण तो होगा ही । राज्य के स्वास्थ्य मंत्री नंदकिशोर यादव ने कहा कि अभी इसका गाइड-लाइन आया नहीं है, इसलिए वह ठोस कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं । साढ़े तीन वर्ष का कोर्स करने वाले इन बीआरएमएस चिकित्सकों के लिए शर्त होगी कि वह गांवों में चिकित्सा करेंगे, यह एक अच्छा प्रयास दिख रहा है । उधर, बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ के प्रवक्ता डा. रंजीत कुमार ने बताया कि केंद्र या राज्य सरकार का यह तर्क गलत है कि डॉक्टर गांव में नहीं रहना चाहते । सच तो यह है कि चिकित्सकों की वैकेंसी वर्षों से जारी नहीं की गई है । जो डाक्टर कार्यरत हैं, उन्हें सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जा रही है । अगर सुविधा मिले तो डॉक्टर गांव में क्यों नहीं रहना चाहेंगे । बीआरएमएस के भविषय पर दिनांक 14 फरवरी के ही नई दुनिया में डॉ. केतन देसाई काआलेख भी उल्लेखनीय हैः डॉक्टरी एकमात्र ऐसा पेशा है जिससे मानवता जुड़ी हुई है। इंजीनियरिंग, कानून सहित किसी भी पेशे पर किसी आदर्श का "टैग" नहीं लगा हुआ है । यही कारण है कि अभी भी कई इलाकों में चले जाइए, उन्हें भगवान का दर्जा दिया जाता है लेकिन जैसे-जैसे इसके साथ व्यावसायिकता का तत्व जुड़ रहा है, पेशे की यह विशेषता धूमिल होती जा रही है । हम नए व वैकल्पिक चिकित्सा शिक्षा के जरिए इस पेशे की उसी विशेषता को बचाना चाहते हैं । इस पेशे के भी व्यावसायिक होते चले जाने की सबसे बड़ी वजह है कि चिकित्सा शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही हैं । सस्ते व वाजिब शुल्क लेने वाले जो सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं, उनमें सीटें बहुत कम हैं । आम छात्रों के लिए ११,००० सीटें हैं । पूरे देश के १२ लाख लड़के दाखिले की परीक्षा में बैठते हैं । इसलिए अब इन मेडिकल कॉलेजों में लगभग उन्हीं बच्चों को दाखिला मिल रहा है जो अच्छे स्कूलों में पढ़े होते हैं, जिनके पास नेट सहित अन्य तकनीकी सुविधाएं होती हैं, वे कोचिंग वहन कर सकते हैं । शहरों में रहने वाले धनी वर्ग के ही अधिकतर बच्चे इस पेशे में जा रहे हैं । ये बच्चे जब डॉक्टर बन कर निकलते हैं तो वे गरीबों और गांव वालों का दर्द महसूस नहीं कर सकते । उनका कोई दोष भी नहीं है । इसलिए उनके दिलोदिमाग पर व्यावसायिकता का हावी होना लाजमी है । वे गांवों में नहीं जाना चाहते हैं तो हम उन्हें दोष नहीं दे सकते । उन्हें जो माहौल मिलता है, उसके अनुसार ही उनकी सोच बनती है । इतना ही नहीं गांवों से प़ढ़े जो छात्र भी शहरों के मेडिकल कॉलेजों में पढ़ लेते हैं, उन्हें शहर की हवा लग जाती हैं । वे भी गांवों में काम करने से तौबा कर लेते हैं । गांवों की बात तो छोड़िए, शहरों के गरीबों का दर्द भी वे नहीं जानते । शहरों में भी तो गरीब रहते हैं, झुग्गियां हैं । इसलिए डॉक्टरों की एक ऐसी जमात तैयार करना जरूरी है जो गांवों के स्कूलों से पढ़ कर अभी-अभी निकला हो, जिन्होंने गांवों की सीमा नहीं लांघी हो और जिन्हें शहरों में रहने की आदत नहीं लगी हो, तो वे गांव छोड़ कर शहर भागने की फिराक में नहीं रहेंगे । एमसीआई के प्रस्ताव की खासियत यह है कि हम साइंस से टेन प्लस टू पास करते ही गांवों के बच्चों को वहीं के जिला अस्पताल में शुरू "मेडिकल स्कूल" में साढ़े तीन साल के पाठ्यक्रम में दाखिला दे देंगे । उन्हें इलाज की वे तमाम ट्रेनिंग देंगे जो गांव वालों के काम आ सकते हैं । हम उन्हें हर वह ट्रेनिंग देंगे जो एमबीबीएस को देते हैं लेकिन साथ यह भी तय कर देंगे कि कि वे कौन इलाज कर सकते हैं, कौन सा इलाज नहीं । बेचलर ऑफ रुरल हेल्थ केयर (बीआरएच) को दिल की बीमारी, अंग प्रत्यारोपण जैसे कठिन रोगों के इलाज की जिम्मेदारी नहीं होगी । उन्हें क्या करना है, क्या नहीं करना है, यह स्पष्ट रूप से लिखित रहेगा । वैसे तो अभी भी देश के अधिकतर हिस्सों में एमसीआई और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के इस साझे प्रस्ताव को भारी समर्थन मिल रहा है लेकिन कुछ वर्षों के बाद यह सचमुच में गांवों के लिए वरदान बनने वाला है । हम यह बता देना चाहते हैं कि मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता के साथ कोई खिलवाड़ करने की हमारी मंशा एकदम नहीं है । जब पारंपरिक डिग्री लेने वालों को गांवों में काम करना ही नहीं है तो उन्हें अपने भविष्य का डर क्यों । फिर इस पाठ्यक्रम के डॉक्टरों के गांवों में तैनात होने से नकली डॉक्टरों का तो सफाया होना तय है ।

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