बुधवार, 22 अगस्त 2012

पशुओं के प्यार में रोग न पालें

पालतू पशु, ख़ासतौर से कुत्ते एवं बिल्लियाँ अमूमन बच्चों की ज़िद की वजह से पाले जाते हैं। लेकिन पशुओं को पालते वक्त इस बात को अक्सर तवज्जो नहीं दी जाती है कि कुछ रोग जानवरों के ज़रिये इंसानों में भी फ़ैल सकते हैं। ग्रामीण दूध के लिए गाय या भैंस पालते हैं। यदि ये स्वस्थ न हों तो इनसे भी मनुष्यों में बीमारिया फ़ैल सकती है। कई बार कच्चा दूध पीना या मांस खाना भी बीमारियों का कारण बनता है। 

माता : यह विशेषतः भैंसों का रोग है। रोगी पशु के थनों में चेचक के दाने पड़ जाते है। जब व्यक्ति इसके थनों को दुहता है तो यह रोग उस पर हमला कर देता है। उसे बुखार के साथ हाथों में दाने ,दर्द व सूजन आ जाती है। ऐसे पशु को दस्ताने पहन कर दुहना चाहिए। रोगग्रस्त पशु को अंत में दुहना चाहिए।

मुँह एवं खुरपका : गाय या भैंसो का यह विषाणुजनित रोग मनुष्यों में भी हो सकता है। इस रोग में पशु को खुरों और मुँह में छाले पड़ जाते हैं। यदि मनुष्य ऐसे पशु के संपर्क में आए तो उसे भी हाथों, तलवों में फफोले आ सकते हैं। इससे बचने के लिए चौपायों को हर वर्ष टीके लगाए जाते हैं।

टी.बी. रोग : पशुओ में टी.बी. एक आम रोग है। इंसानों में यह रोग हवा या दूषित पानी के ज़रिये पहुँचता है। टी.बी. ग्रस्त पशुओं का दूध बगैर उबाले पीया जाए तो यह रोग मनुष्यों में हो सकता है। टी.बी. ग्रस्त पशु को कफ़ हो जाता है, शरीर सूखता जाता है,, दस्त लग जाते हैं। पशुओं में यह लक्षण दिखने पर ग्वाले के भी रोगग्रस्त होने की आशंका होती है। इंसानों को लगातार ख़राश बने रहना, कफ में खून आना, तेज़ बुखार,वज़न में कमी,रात को पसीना आना,सीने में दर्द जैसे लक्षण सामान्य हैं। इस तरह रोगों से बचने के लिए दूध को हमेशा उबालकर ही पीयें। 

एंथ्रेक्सः यह रोग लगभग सभी प्राणियों में होता है। जिन क्षेत्रों में इसके रोगाणु होते हैं,वहां यह रोग लम्बे समय तक रहता है। इंसानों में यह रोग बीमार पशु के मल-मूत्र के सम्पर्क में आने से हो सकता है। इसके अलावा,संक्रमित बाल,चमड़े,मांस या दूध से भी फैल सकता है। मनुष्यों में यह रोग यदि संक्रमित चमड़ी द्वारा हो तो इससे नीले-काले रंग के फोड़े होने लगते हैं। इसके अलावा,तेज़ बुखार,दर्द और ज्वर तथा कमज़ोरी जैसे अन्य लक्षण भी सामने आते हैं। खाने के द्वारा यह संक्रमण होने पर गले में सूजन,आवाज़ में घरघराहट,खांसी तथा सांस लेने में तक़लीफ़ जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। एंथ्रेक्स से मृत पशु का पोस्टमार्टम कभी नहीं करना चाहिए। गांवों में प्रत्येक मृत पशु को फाड़ दिया जाता है जो अनजाने में ही ख़तरे का कारण बन सकता है।

खुजली या स्केबीज़ः कुत्तों में होने वाली खुजली अक्सर उनके मालिकों के लिए सरदर्द का कारण बन सकती है। इसमें कुत्ता खुजा-खुजा कर घाव कर लेता है। ऐसा होने पर दस्ताने पहनकर कुत्ते के घाव को बेंजाइल दवा लगाएं। रोगग्रस्त कुत्तों को पालने वालों को भी यह रोग हो सकता है। उन्हें गर्दन के नीचे वाले हिस्सों(हाथ-पैर) में हल्की खुजली होती रहती है जो रात के समय बढ़ जाती है। तंग बस्तियों में यह खुजली आम तौर पर पाई जाती है। प्रभावित व्यक्ति को सुबह चादर और तकिये का कवर और पहनने के कपड़े-सभी को खौलते पानी में भिगोकर साबुन से धोना चाहिए। 

रेबीज़ 
पिछले एक दशक में कुत्ता पालने का शौक बढ़ा है। तभी से रेबीज़ रोग के बारे में लोगो में चेतना बढ़ी है। यह पशुओं से होने वाली सबसे खतरनाक बीमारी है। रेब़ीजग्रस्त पशु या मनुष्य को बचाया नहीं जा सकता है, यह लाइलाज बीमारी है। कुत्तों के काटने से होने वाली इस बीमारी में विषाणु लार के ज़रिए घाव में प्रविष्ट होते हैं। कई बार यदि गाय या भैंस को पागल कुत्ता काट ले और अनजाने में पशुपालक पशु के मुँह को जाँचने के लिए उसके मुंह में हाथ डाल दें तो भी यह रोग हो सकता है। रेबीज़ ग्रस्त कुत्तो में इस रोग के लक्षण दो रूपों में दिखाई देते हैं। रोगग्रस्त पशु पागलों की तरह बर्ताव करता है या अपने आस-पास आने वाले सभी मनुष्यों एवं पशुओं को अकारण ही काटता है। रोगी कुत्ते के जबड़ों में लकवा हो जाता है। वह भौंकना व पानी पीना बंद कर देता है। दूसरे रूप में कुत्ता अनमना होकर एक कोने में पड़ रहता है। अंत में पैरो और जबड़ों के लकवे से कुत्ते की मौत हो जाती है। देश में इस रोग से हर साल ५०,००० व्यक्ति मारे जाते है। इस रोग के लक्षण २० वर्षो बाद भी देखे जाते हैं। रेब़ीजग्रस्त व्यक्ति को हल्का बुखार, सिर दर्द, बदन में जलन, मुँह से लार टपकना, पानी देखकर डर लगना, चक्कर आना, निगलने में परेशानी होने जैसे लक्षण दिखई देते हैं। रोग की अंतिम स्थिति में लकवा या नीम बेहोंशी की हालत हो जाती है। यदि एक बार यह लक्षण दिखने लगे तो फिर निश्चित तौर पर मौत होती है।
रेबीज़ से बचाव 
कुत्ते के काटे जाने के बाद घाव का तुरंत प्राथमिक इलाज करें, टीके लगवाएँ, गाय या भैंस के रोगग्रस्त होने पर उसका दूध फैंक दें। यह रोग लार द्वारा फैलता है एवं नसों के ज़रिये दिमाग तक पहुँचता है। यदि घाव गहरा हो, दिमाग के पास यानी चेहरे या कंधे पर हो तो टीकाकरण में ज़रा सी भी देर न करें। जिस कुत्ते ने काटा हो उसपर कुछ दिनों तक नज़र रखें। यदि वह कुछ दिनों में ही मर जाए तो टीके का कोर्स जल्द से जल्द पूरा कर लें। रेबीज़ एक संक्रामक रोग है, इससे बचाव के लिए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें, झाड़-फूँक के चक्कर में न पड़ें।

इन रोगों से बचने के लिए पालतू पशु की उचित देखभाल ज़रूरी है। पशुओं के साथ थोड़ी सावधानी रखी जाए तो इनके ज़रिए फैलने वाली बीमारियों का ख़तरा काफी कम हो जाता है(डॉ. संदीप नानावटी,सेहत,नई दुनिया,अगस्त द्वितीयांक 2012)।

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उपयोगी जानकारी ... आभार

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  2. अच्छी और उपयोगी जानकारी .
    हालाँकि माता के बारे में संदेह सा है की यह क्या है .

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  3. आपकी पोस्ट कल 23/8/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 980 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  4. उपयोगी जानकारी के लिए साधुवाद

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