रविवार, 1 अप्रैल 2012

ब्रॉन्कायल अस्थमा

ब्रॉन्कायल अस्थमा श्वसन तंत्र का क्रॉनिक रोग है जिसके लक्षण हैं बार-बार हाँफने व घरघराने के दौरे पड़ना; हर व्यक्ति में इन दौरों की गंभीरता व आवृत्ति भिन्न होती है। इस रोग से ग्रसित व्यक्ति में एक दिन या एक हफ्ते में कई बार लक्षण प्रकट हो सकते हैं और लोगों के लिए तो शारीरिक श्रम करते हुए या रात में स्थिति बदतर हो सकती है। अस्थमा के अटैक में ब्रॉन्कायल ट्यूब सूज जाती हैं, जिससे वायु पथ तंग हो जाते हैं। नतीजतन फेफड़ों में जाने वाली एवं बाहर आने वाली हवा का प्रवाह घट जाता है। बारंबार प्रकट होने वाले अस्थमा के लक्षणों से मरीज को रात में अनिद्रा, दिन में थकान, सक्रियता का स्तर कम होना आदि जैसी समस्याएँ पेश आती हैं और वह स्कूल/ दफ्तर में अनुपस्थित रहने लगता है। यह बहुत दुखद है, क्योंकि अस्थमा, रोगी व उसके परिवार पर बहुत बोझ डालता है। कई मामलों में जिंदगी भर मरीज की गतिविधियों में अड़चन देता रहता है।

अस्थमा के कारण 
 अस्थमा के बुनियादी कारणों को अभी भी पूरी तरह समझा नहीं जा सका है। अस्थमा होने के पीछे जो सबसे पुख्ता जोखिम हैं वे आनुवांशिक प्रवृत्ति व अन्य घटनाओं के संयोजन से उत्पन्न होते हैं जैसे पर्यावरणीय एक्सपोज़र या कुछ खास पदार्थों व कणों को श्वास के साथ भीतर खींच लेना। इससे एलर्जिक रिएक्शन या वायुपथ में परेशानी पैदा हो सकती है, जैसेः -भीतरी एलर्जी कारक (जैसे- बिस्तर, गलीचे व स्टफ्ड फर्नीचर पर मौजूद धूलि कण; प्रदूषण, पालतू पशुओं की रूसी) -बाहरी एलर्जी कारक (जैसे- पराग व फफूंद) एवं तंबाकू का धुआँ। -कार्यस्थल पर रासायनिक उत्तेजक पदार्थ।

वायु प्रदूषण 
अन्य कारकों में शामिल हो सकते हैं- ठंडी हवा, अत्यधिक भावनात्मक घटना जैसे गुस्सा या डर और शारीरिक सक्रियता। यहाँ तक की कुछ दवाएँ भी जैसे एस्प्रिन व अन्य नॉन-स्टिरॉयड एंटी-इंफ्लेमेट्री ड्रग्स भी अस्थमा को भड़का सकती हैं। शहरीकरण से भी अस्थमा के रोगियों की तादाद बढ़ी है, लेकिन इस संबंध की सटीक प्रकृति क्या है वह अब तक स्पष्ट नहीं है। 

शारीरिक सक्रियता से होने वाला अस्थमा 
शारीरिक सक्रियता से होने वाला अस्थमा उस स्थिति को कहते हैं जब कसरत या कड़ा परिश्रम करने से रोगी का ब्रॉन्कोसपाज़्म तीव्र हो उठता है और साथ में वायुपथ की प्रतिक्रिया बहुत बढ़ जाती है। शारीरिक सक्रियता से होने वाला ब्रॉन्कोसपाज़्म अक्सर अनदेखा रह जाता है, क्योंकि यह अस्थमा लगभग ५० प्रतिशत मरीजों में खामोशी के साथ मौजूद रहता है किंतु कसरत या कड़ा परिश्रम करने पर प्रकट होता है। कसरत से होने वाले ब्रॉन्कोसपाज़्म का पैथोजेनेसिस विवादास्पद है। यह रोग शायद वायुपथ का पानी कम होने,वायुपथ की गर्मी घटने या इन दोनों के संयोजन से हो सकता है। 

रोगी शिक्षा 
अस्थमा के मरीज़ को इस विषय पर शिक्षा देना महत्वपूर्ण है। मरीज़ों और चिकित्सकों के बीच सहभागिता स्थापित करके इस मर्ज़ की अच्छी प्रकार देखभाल की जा सकती है। 

रोगी शिक्षा के अहम बिंदु इस प्रकार हैं 
-अस्थमा के इलाज के हर पहलू पर मरीज को शिक्षित किया जाना चाहिए। 

- हैल्थकेयर टीम के सभी सदस्यों; जिनमें नर्सें, फार्मासिस्ट व रेस्पिरेटरी थेरपिस्ट शामिल हैं,को पर्याप्त शिक्षा दी जाना चाहिए।

-डॉक्टरों को चाहिए कि वे मरीजों को अस्थमा के सैल्फ-मैनेजमेंट के बारे में बताएँ, जिनमें शामिल विषय हैं-अस्थमा के बुनियादी तथ्य, सैल्फ-मॉनीटरिंग तकनीकें, दवाओं की भूमिका, इन्हेलर का इस्तेमाल और पर्यावरण नियंत्रण के उपाय।

-मरीज व उसके परिवार के लिए इलाज संबंधी लक्ष्य निश्चित किए जाने चाहिए।

-एक लिखित, वैयक्तिक व दैनिक सैल्फ-मैनेजमेंट योजना विकसित करना चाहिए(डॉ. आर के सिंघल,सेहत,नई दुनिया,मार्च तृतीयांक 2012)। 


अटैक आने पर क्या करें 
अस्थमा के अटैक आने पर लेटें नहीं, बल्कि कमर सीधी करके बैठ जाएं। शांत, सहज और तनाव-मुक्त रहने की कोशिश करें तथा कसे हुए कपड़ों को ढीला कर दें। बिना देर किये चिकित्सक के कहे अनुसार रिलिवर दवा का खुराक लें। पांच मिनट तक अगर आराम नहीं मिलता है तब चिकित्सक की सलाह के अनुसार रिलिवर दवा का अतिरिक्त डोज लेनी चाहिए। बावजूद आराम महसूस न हो तो तत्काल चिकित्सक से संपर्क करें। 


कैसे करें देखभाल 
अस्थमा मरीजों के लिए अलग-अलग दवाइयां लेना, वायु मार्ग खोलने के लिए एलर्जी कारकों के प्रति रोगी के शरीर की प्रतिक्रिया कम करने के लिए, एलर्जी संबंधी परीक्षण, दमे के दौरे को रोकने और जांचने के लिए पिक फ्लो मीटर का उपयोग करनी चाहिए। जब सांस में घरघराहट हो तो दूध के उत्पादों का सेवन बंद कर दें, क्योंकि इससे रोगी का श्लेष्मा गाढ़ा हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए जरूरी है कि दमे का दवा सदैव साथ रखनी चाहिए। ठीक हो जाने पर भी चिकित्सक की सलाह के बिना दवाइयां लेना बंद नहीं करें। सिगरेट, पाईप तथा सिगार के धूएं से बचनी चाहिए। 


उपचार की पद्धति 
अस्थमा की रोकथाम के लिए बाजार में आवश्यक दवाइयां उपलब्ध है। कुछ साल पहले तक यह इसका इलाज एक बड़ी समस्या थी लेकिन अब परिस्थिति काफी हद तक सामान्य है। चिकित्सक की सलाह के अनुसार अपनी दवाइयां, जैसे- इन्हेलर या प्रिवेन्टर तथा एंटीबायोटिक अस्थमा मरीजों के लिए मददगार साबित होती है। आमतौर पर लोग अपने कोलेस्ट्रॉल एवं मधुमेह की बराबर जांच कराते हैं, वैसे ही अस्थमा रोगियों को इस रोग के बारे में ध्यान देना जरूरी है एवं आवश्यकता होने पर कम्प्यूटराइज्ड पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट करानी चाहिए(राष्ट्रीय सहारा,पटना,3.5.11)।

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    आपकी यह प्रविष्टि कल दिनांक 02-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ

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  2. सार्थक और ज्ञानप्रद पोस्ट आभार....

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  3. बहुत ही खतरनाक बीमारी है यह।

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  4. भलेष्म गाढ़ा हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए जरूरी है कि दमे का दवा सदैव साथ रखनी चाहिए। कृपया स्लेश्मा कर लें .अच्छी पोस्ट .एलर्जन्स की व्यक्ति विशेष के लिए पहचान ज़रूरी है उससे बचना भी .सैंकड़ों में है एलर्जी पैदा करने वाले पदार्थ .टेम्प्रेचर और स्ट्रेस भी ताकतवर एलार्जन हैं .एलर्जी पैदा करतें हैं .मौसम के बदलने पर दमा के रोगी की दिक्कतें बढ़तीं हैं .सावधानी ज़रूरी .धूल मिट्टी,धुएं से बचाव भी.बीडी सिगरेट दुश्मन हैं मरीज़ की .खुली साफ़ हवा .पहाड़ माफिक आता है इन्हें .

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  5. आभार मान्यवर। अपेक्षित सुधार कर दिया गया है।

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  6. bahut laabhkari post aaj kal ke pradooshit vatavaran me yeh bimaari har teesre vyakti me paai ja rahi hai.

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  7. ज्ञानवर्धक और सभी के लिये उपयोगी.

    आभार.

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