गुरुवार, 29 मार्च 2012

क्यों फूलती है सांस?

अक्‍सर ऐसा होता है कि बिना किसी बीमारी के भी काम करते हुए सांस फूलने लगती है या सीढ़ियां चढ़ने से सांस फूल जाती है। कई लोग सोचते हैं कि मोटे लोगों की सांस जल्दी फूलती है, लेकिन ऐसा नहीं है। कई बार पतले लोगों की सांस भी थोड़ा चलने पर ही फूलने लगती है। दिल्ली जैसे शहर में जहां हर तरह का प्रदूषण है, सांस फूलने की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। 

कई कारण हैं 
सांस फूलना या सांस ठीक से न लेने का अहसास होना एलर्जी, संक्रमण, सूजन, चोट या मेटाबोलिक स्थितियों की वजह से हो सकता है। सांस तब फूलती है जब मस्तिष्क से मिलने वाला संकेत फेफड़ों को सांस की रफ्तार बढ़ाने का निर्देश देता है। फेफड़ों से संबंधित पूरी प्रणाली को प्रभावित करने वाली स्थितियों की वजह से भी सांसों की समस्या आती है। फेफड़ों और ब्रोंकाइल ट्यूब्स में सूजन होना सांस फूलने के आम कारण हैं। इसी तरह सिगरेट पीने या अन्य टाक्सिंस की वजह से श्वसन क्षेत्र (रेस्पिरेट्री ट्रैक) में लगी चोट के कारण भी सांस लेने में दिक्कत आती है। दिल की बीमारियों और खून में ऑक्सीजन का स्तर कम होने से भी सांस फूलती है। 

बदलता मौसम भी है कारण 
एलर्जी से होने वाले अस्थमा (दमा) की वजह से भी सांस फूल जाती है। यह स्थिति जीवन के लिए खतरा भी बन सकती है। बदलता मौसम इसे और बढ़ाता है। फरीदाबाद के सर्वोदय अस्पताल और रिसर्च सेंटर के रेस्पिरेट्री के विभागाध्यक्ष डॉ. दानिश जमाल के अनुसार, ‘वसंत की गुनगुनी धूप की जगह गर्म हवाएं चलने लगी हैं। अधिकांश मरीज मौसमी दमे के शिकार हो जाते हैं। जो इसके मरीज हैं उन्हें इसके अटैक पड़ने लगते हैं। दिल्ली जैसे महानगर में तनाव भी इसकी बड़ी वजह है।’ 

नजरअंदाज न करें 
छाती में दर्द हो, लगातार कफ रहता हो, छाती में घरघराहट की आवाज सुनाई दे, तो फौरन डॉक्टर से संपर्क करें। कई बार इनहेलर और दवाइयां दी जाती हैं(सुमन वाजपेयी,हिंदुस्तान,दिल्ली,28.3.12)।

14 टिप्‍पणियां:

  1. सांस फूलने की समस्या दिल्ली ही नहीं हर शहर में गंभीर रूप ले चुकी है।
    अच्छी जानकारी !

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  2. साँसत में न जान हो, रखो साँस महफूज ।
    सूजे ब्रोंकाइल नली, गए फेफड़े सूज ।

    गए फेफड़े सूज, चिलम बीडी दम हुक्का ।
    प्राण वायु घट जाय, लगे गर्दन में धक्का ।

    रंगे हाथ फँस जाय, करे या धूर्त सियासत ।
    उलटी साँस भराय, भेज दे जब *घर-साँसत ।

    * काल-कोठरी

    अगर टिप्पणी अनर्गल लगे तो माफ़ करें ।

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    1. इस ब्लॉग पर सिर्फ रोग की बात होती है। सो लोगबाग बहुत अच्छी प्रस्तुति,बेहतरीन आदि भी बहुत मुश्किल से कह पाते हैं। वो तो आप ही हैं कि मरीज़ों में नई जान फूंकने का माद्दा रखते हैं अपनी कविताओं से। वास्तव में,आपकी आशुप्रतिभा बीमारों को दुरूस्त करने का इल्म जानती है। समस्त पाठकों की ओर से आभार स्वीकार कीजिए।

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    2. सच में....मुझे तो ब्लॉग पर आना ही पसंद नहीं.....
      मगर जीना पसंद है...सो आती हूँ मन मार के...
      :-)

      आपका बहुत आभार राधारमण जी.

      -जो बच्चे बहुत दुबले हैं उनके लिए कुछ लिखें....याने कुपोषित नहीं...खाते पीते घर के..

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    3. बिलुल राधारमण जी, रविकर जी के लिए आपके द्वारा कही गई बात से सहमत हूं।
      सांस तो सबके फूलते हैं। हमारे भी। कारणॊ पर जो प्रकाश आपने डाला है वह बहुत महत्वपूर्ण है।

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  3. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  4. bahut acchi jankari di aapne jo kai bar dr.bhi nhi bta pate hain.thanks nd aabhar.

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  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति भी है,
    आज चर्चा मंच पर ||

    शुक्रवारीय चर्चा मंच ||

    charchamanch.blogspot.com

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  6. ब्रोंन- काई -टिस,एस्मा ,एलर्जिक रिएक्शन और एलार्जन को ठीक से समझा गई यह पोस्ट .

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  7. मैं भी इससे परेशान हो जाता हूँ.

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  8. उपयोगी जानकारी .... यह ब्लॉग स्वास्थ्य के विषय में अच्छी जानकारी देता है ॥ आभार

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  9. मै जब करीब 6 साल का था तब भोपाल में गैस कांड हुआ था हमारा घर यूनियन कार्बाईट से मात्र 1 किलोमीटर की रेंज में था उस रात हवा हमारे एरिये की ओर ही थी तब ढेर सारी एमआईसी गैस फेफडों में चली गई जान तो बच गई लेकिन सांस फूलने की बिमारी तब से लेकर अब तक है। एक माह के लिये आंखों खोलने में भी परेशानी होती थी लेकिन जब सरकारी दवाएँ खाना बंद किया तब आंखे सही हुर्इं।

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  10. अच्छी जानकारी के लिए धन्यवाद , अभी कल ही मेरी भाभी साँस फूलने की बात कह रही थी

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  11. मैं तो तीन दिन से हॉस्पिटल में भर्ती हूँ साँस फूलती है और खांसी है बहूत ज्यादा खांसते खांसते बेफोश हो जथा हूँ जब होश आता है तो ऐसा लगता है जैसे की करोड़ की संख्या में चीटियाँ बदन में दोड़ रह्हे हूँ

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