बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

वसंत ऋतु में वमनकर्म

वमनकर्म आयुर्वेदीय पंचकर्म में पहला क्रिया विधान है। वमन का शाब्दिक अर्थ होता है उल्टी करना। उल्टी रोग लक्षण भी है लेकिन शरीर के शोधन में जब वमनकर्म की बात करते हैं तो अभिप्राय उल्टी करवाकर रोगों का निवारण करना होता है। 

सामान्यतः योग क्रियाओं में गरम पानी व नमक मिलाकर उल्टी करवाई जाती है। परंतु आयुर्वेदिक वमनकर्म की विधिपूर्वक क्रिया १५ से २० दिन में पूर्ण होती है, इसमें यह बात ध्यान रखने योग्य है कि इस पूरी अवधि में मात्र एक दिन वह भी ४ से ६ बार ही वमन के वेग आते हैं इसलिए यह भ्राँति बिलकुल दूर कर देनी चाहिए कि १०-१५दिन तक या फिर एक पूरे दिनभर वमन करना होता है। वमनकर्म द्वारा कफ दोष को शरीर से बाहर निकाला जाता है। 

जब परेशान हों इन बीमारियों से  
दमा, एसीडिटी, पेट के अल्सर, एलर्जिक खाँसी, पुरानी खाँसी, मधुमेह, आमवात (गठिया), शीत पित्त, कुष्ठ, सफेद दाग, सोराइसिस, गुदा से रक्तस्त्राव, ग्रंथियाँ, मोटापा,विषपान अथवा मद्यपान के बाद भी वमन कराकर विषैले तत्वों को शरीर से बाहर निकाला जाता है। अनेक रोगों में वमनकर्म के बाद विरेचन कर्म, वस्ति कर्म, रक्तमोक्षण आदि क्रियाएँ विशेषज्ञ के निर्देशानुसार अपनानी होती हैं। 

क्या करना होता है?
वमन के पहले : कुशल पंचकर्म विशेषज्ञ की देख-रेख में ३ से ५ दिन तक पाचक औषधियाँ ली जाती हैं। इसके पश्चात ५ से ७ दिन तक औषधियुक्त घृतपान प्रतिदिन बढ़ती हुई मात्रा में लिया जाता है। दिनभर में मरीज़ की स्थिति नोट की जाती है और उसके अनुसार अगले दिन के घृतपान की मात्रा तय की जाती है। जब घृतपान की संतृप्त अवस्था आ जाती है तब सुबह-शाम शरीर की मालिश एवं स्टीमबाथ किया जाता है। 

वमन के दिन : एक दिन रोगी को भर्ती रखकर प्रातः काल वमनकल्प पिलाया जाता है, जिससे ६ से ८ बार वमन के वेग आते हैं। विशेष दवाइयों से बने काढे द्वारा बार-बार कुल्ले करना होते हैं। इस दौरान दिनभर आराम करना होता है।

वमन के बाद : परहेज़युक्त खानपान के क्रम को संसर्जन क्रम कहते हैं, जिसमें भूख लगने पर क्रमशः दलिया या चावल का सूप,छिलके वाली मूँग की दाल का पानी,बघारी हुई मूंग की दाल,खिचड़ी,दाल-चावल,रोटी दी जाती है। इस प्रकार धीरे-धीरे आहार को 3 से 5 दिनों में बढ़ाते हुए पूर्ण आहार दिया जाता है तथा रोगानुसार औषधियां प्रारंभ की जाती हैं। 

सावधानियां 
मरीज़ को पंचकर्म विशेषज्ञ के निर्देशानुसार ही दिनचर्या व्यतीत करनी होती है। घृतपान वाले दिन से ही गुनगुना पानी पीना होता है। गरिष्ठ आहार,व्यायाम तथा वज़नी कार्य नहीं करना चाहिए। विधि अनुसार,वमनकर्म होने पर किसी प्रकार के दुष्परिमाम सामने नहीं आते हैं और वर्ष भर शरीर की फिटनेस बनी रहती है। इसलिए,प्रतिवर्ष वसंत ऋतु में वमनकर्म श्रेष्ठ परिमाम देता है(डॉ. विनोद बैरागी,सेहत,नई दुनिया,फरवरी द्वितीयांक 2012)

7 टिप्‍पणियां:

  1. yeh upchar kitna kasht dayak hota hoga padhkar hi mahsoos ho raha hai.kintu bimari se pareshaan vyakti kya kare yadi isse upchaar hota hai to karna chahiye.achchi jankariyan dete hain aap apni post me.aabhar aapka.

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  2. बहुत बढ़िया,बेहतरीन उपयोगी अच्छी प्रस्तुति,.....

    MY NEW POST...काव्यान्जलि...आज के नेता...

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  3. आपके पोस्ट के माध्यम से बहुत सी नई बातों को जानने का मौका मिल रहा है ,आभार

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