शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

आर्थ्राइटिस सिर्फ बढ़ती उम्र की परेशानी नहीं

भारत में हर उम्र के करीब ४ करोड़ ६० लाख लोग आर्थ्राइटिस और इससे संबंधित बीमारियों से ग्रस्त हैं। आर्थ्राइटिस सदियों से मानव समाज को परेशान करता आ रहा है। इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन यूनानी व रोमन साहित्य में आर्थ्राइटिस के विभिन्ना रूपों का ज़िक्र मिलता है, कुछ तो यहाँ तक कहते हैं गुफा मानव भी इससे पीड़ित हुआ करता था। 

आज आर्थ्राइटिस इतना फैला हुआ है कि ६ लोगों में से १ तथा ३ परिवारों में से १ इससे पीड़ित है। अगले २० सालों में अनुमान है कि ऐसे मरीज़ों की संख्या ६ करोड़ ७० लाख हो जाएगी।

आर्थ्राइटिस क्या है? 
आर्थ्राइटिस यानी जोड़ों में सूजन, इसे आम भाषा में गठिया कहते हैं। वास्तव में "आर्थ्राइटिस" शब्द का इस्तेमाल जोड़ों की सौ से ज़्यादा बीमारियों के लिए किया जाता है।

ऑस्टियोआर्थ्राइटिस 
सबसे आम किस्म का आर्थ्राइटिस है। अधिकतर इससे वृद्ध व अधेड़ उम्र के लोग परेशान रहते हैं। यह जोड़ों के कार्टिलेज में विकार आने से होता है। कार्टिलेज जोड़ों में मौजूद कड़ी पर लचीली हड्डी होती है जिससे जोड़ों का मुड़ना संभव हो पाता है। इस रोग का वास्तविक कारण फिलहाल अज्ञात है।

फाइब्रोमयालजिया 
यह आर्थ्राइटिस का दूसरा सबसे आम प्रकार है। अधिकतर यह महिलाओं को होता है। ७०-९० प्रतिशत मरीज़ २०-५० आयु वर्ग की महिलाएँ होती हैं। इस मर्ज़ में पेशियों या जोड़ों में दर्द होता है और संक्रमण का कोई लक्षण नहीं होता। इसे अक्सर गलती से क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम यानी अत्यधिक थकान समझ लिया जाता है। आमतौर पर इसमें सर्जरी की आवश्यकता नहीं होती। इसमें संयोजक ऊतकों में परिवर्तन होने लगते हैं। इसमें जोड़ों की मैम्ब्रेन लाइनिंग में जलन होती है जिससे दर्द, अकड़न व सूजन हो जाती है। परिणामस्वरूप मरीज़ को चलने-फिरने में मुश्किल होती है, जोड़ का आकार बिगड़ जाता है, वह एक सीध में नहीं रहता और कई बार जोड़ पूरा ध्वस्त हो जाता है। पुरुषों के मुकाबले यह महिलाओं को तीन गुना अधिक शिकार बनाता है। मरीज़ अक्सर ही आर्थ्राइटिस को अनदेखा करते हैं और इसे बढ़ती उम्र की वजह से होने वाली पीड़ा समझ लेते हैं। कई लोग खुद ही इसके लिए पेनकिलर खाने लगते हैं और उचित तरीके से इसके उपचार के बारे में नहीं सोचते। इससे उन्हें बहुत पीड़ा झेलनी पड़ती है और स्थिति बिगड़ती जाती है। इस मामले में कोई लापरवाही न बरतें। आर्थ्राइटिस बहुत ही गंभीर बीमारी है, जो मरीज़ को पंगु बना देती है। यहां तक कि यह जानलेवा भी साबित हो सकती है। इसलिए,इसके शुरूआती लक्षणों को अनदेखा नहीं करना चाहिए।(डॉ. अखिलेश यादव,सेहत,नई दुनिया,जनवरी तृतीयांक 2012)

5 टिप्‍पणियां:

  1. सच में आजकल सबसे ज्यादा जो परेशान कर रही है वो यही बीमारी है..एक बार कोई जोड़ damage हुआ तो फिर वापस ठीक नहीं होता..
    yahan to PREVENTION IS BETTER THAN CURE ...

    व्यायाम और कैल्शियम का सेवन...वक्त रहते करना होगा..
    जानकारी के लिए शुक्रिया..

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  2. जागरूकता से ही बचा जा सकता है..... अच्छी जानकारी मिली

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  3. yoga karne ka na mann karta ha or na hi time nikal pati hu par in sab bimariyo se bachne ke liye sahi ye hi hoga ke mujhe ab yoga suru kar dena chaiye, kyuki umr ab badhni hi hai , rukni ya ghatni nahi

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  4. बढ़िया अच्छी जानकारी है !
    आभार .....

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