गुरुवार, 12 जनवरी 2012

बच्चों को भी कराएँ ध्यान का अभ्यास

कई बच्चों में ध्यान के प्रयोग कराने के सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं। बच्चों को ध्यान यानी मेडिटेशन कराने को लेकर कुछ लोग नाक भौं सिको़ड़ सकते हैं। ध्यान को किसी धर्म से जो़ड़कर देखना ़ग़लत है क्योंकि यह एकाग्रता ब़ढ़ाने की विशुद्ध वैज्ञानिक प्रक्रिया है। 

आजकल की शिक्षा पद्धति न तो बालक को शारीरिक दृष्टि से सक्षम बनाती है, न ही मानसिक संतुलन बनाए रखती है, न ही उसे समाज का एक सुसभ्य, सच्चरित्र, निष्ठावान, उत्तरदायी व्यक्ति बनाती है। आज के इस विज्ञान युग में किडनी, हृदय प्रत्यर्पण जैसे जटिल ऑपरेशन आसान हो गए हैं। चंद्र, मंगल आदि ग्रहों पर बस्ती बसाने का विचार भी इंसान कर रहा है, परंतु मानवता कहीं खो गई है। बच्चा अब सीधे वयस्क हो जाता है उसे बाल्यकाल की सुलभ क्रियाकलापों का पता ही नहीं रहता। वह जल्दी-जल्दी बू़ढ़ा हो रहा है और मानसिक तनावों से ग्रस्त होता जा रहा है। मनोचिकित्सकों का मानना है कि बच्चों में अवसाद, अपराधी प्रवृत्तियाँ और व्यवहार में आने वाले परिवर्तन ब़ढ़ते जा रहे हैं। इस सबसे बचने के लिए आवश्यक है उसे बचपन को जीने दें। इन परिस्थितियों का सामना करने के लिए उसे शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक रूप से परिपूर्ण बनाना होगा। इसकी शुरुआत ध्यान साधना से की जा सकती है। 

क्या होगा फायदा 
 कम उम्र में ध्यान साधना से बच्चों में आत्मविश्वास, आत्मतृप्ति, आत्मसंयम जैसे गुण विकसित होंगे। वह एकाग्रचित्त हो सकेगा। उसमें दूसरों के प्रति सहिष्णुता जैसे गुण पैदा होंगे। बुद्धि की कुशाग्रता में वृद्धि, स्मरण शक्ति ब़ढ़ेगी, आत्मविश्वास ब़ढ़ेगा और विपरीत परिस्थितियों में मन का संतुलन भी बना रहेगा।

कैसे कराएँ साधना 
 बचपन से ही बच्चों को एकाग्रता पर जोर देना सिखाना चाहिए। ध्यान का पहला चरण है धारणा। मसलन किसी एक वस्तु पर, फोटो, मूर्ति या ज्योति पर ध्यान एकाग्र करने का अभ्यास कराएँ। ध्यान साधना शुरुआत में १२ सेकंड की होती है। १२ धारणाएँ मिलकर १ ध्यान होता है। १४४ सेकंड यानी २ मिनट २४ सेकंड का पूर्ण ध्यान होता है। इसलिए यह न समझें कि बच्चों का बहुमूल्य समय ध्यान जैसे काम में नष्ट किया जा रहा है। दिन भर में इसे केवल ३ बार करना ही पर्याप्त है। ध्यान का समय, स्थान और वस्तु निश्चित हो तो ज्यादा अच्छा नतीजा आता है। बच्चों को बताएँ कि ध्यान करते समय वे अन्य विचारों को मन में न आने दें। इस अवधि में बार-बार दूसरे विचार आएँगे। प्रयत्न से इन्हें दूर ढकेला जा सकता है।

कब कराएँ 
 ध्यान सुबह उठने के बाद भोजन के पूर्व एवं सोने के पहले प्रार्थना कराना चाहिए। सभी धर्मावलंबी अपने अपने इष्ट देवता को याद करते हुए ध्यान साधना कर सकते हैं। प्रार्थना करने से समर्पण की भावना विकसित होगी और परिणामों की चिंता जाती रहेगी। ध्यान साधना करने वाले बच्चों के चित्त में स्थिरता आ जाती है और वे परीक्षा के तनाव को आसानी से झेल जाते हैं(डॉ. माधवी पटेल,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर पंचमांक 2011)।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बच्चे बड़ी सरलतासे ध्यान को उपलब्ध हो सकते है !
    बहुत अच्छी पोस्ट !

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  2. व्यक्तित्व और जीवन दोनो को उन्नत करने के लिए एकाग्रता जरूरी है।
    एकाग्रता के लिए बचपन में ही ध्यान की आदत बहुत ही जरूरी है।

    सुन्दर प्रेरक आलेख

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    1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति

      शुक्रवारीय चर्चा मंच पर

      charchamanch.blogspot.com

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति

    शुक्रवारीय चर्चा मंच पर

    charchamanch.blogspot.com

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  4. बचपन से ध्यान की आदत डाल लेना अच्छा रहेगा ....

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