बुधवार, 13 जुलाई 2011

ईयरफोन की लत कहीं बहरा न बना दे

कानों में हेडफोन लगाए म्यूजिक की मस्ती में मस्त यंगस्टर्स आजकल कहीं भी नजर आ जाते हैं , लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना कानों के लिए काफी नुकसानदायक हो सकता है , इतना नुकसानदायक कि धीरे - धीरे इससे सुनने की क्षमता में कमी आती जाती है। कानों से संबंधित ऐसी ही कुछ और समस्याओं और उनका हल एक्सर्पट्स से बात करके बता रहे हैं प्रभात गौड़ :

कैसे काम करता है कान
कान के तीन हिस्से होते हैं। आउटर ईयर , मिडल ईयर और इनर ईयर। आउटर ईयर वातावरण से ध्वनि तरंगों के रूप में आवाजों को ग्रहण करता है। ये तरंगें कैनाल से होती हुई ईयरड्रम तक पहुंचती हैं और इनकी वजह से ईयरड्रम वाइब्रेट करने लगता है। इस वाइब्रेशन से मिडल ईयर में मौजूद तीन बेहद छोटी हड्डियों में गति आ जाती है और इस गति के कारण कान के अंदरूनी हिस्से में मौजूद दव हिलना शुरू होता है। इनर ईयर में कुछ हेयर सेल्स होते हैं , जो इस दव की गति से थोड़ा मुड़ जाते हैं और इलेक्ट्रिक पल्स के रूप में सिग्नल दिमाग को भेज देते हैं।

दो तरह का लॉस
हियरिंग लॉस दो तरह का हो सकता है। पहला है कंडक्टिव हियरिंग लॉस , जो कान के बाहरी और बीच के हिस्से में आई किसी समस्या की वजह से होता है। इसे बीमारी की वजह से होने वाला बहरापन भी कह सकते हैं , जबकि दूसरी तरह की समस्या सेंसरीन्यूरल हियरिंग लॉस कान के अंदरूनी हिस्से में आई किसी गड़बड़ी की वजह से होती है। ऐसा तब होता है , जब हेयर सेल्स नष्ट होने लगते हैं या ठीक से काम नहीं करते। दरअसल , कान में तकरीबन 15 हजार स्पेशल हियरिंग हेयर सेल्स होते हैं। इनके बाद नर्व्स होती हैं।

हेयर सेल्स को नर्व्स की शुरुआत कहा जा सकता है। इन्हीं की वजह से हम सुन पाते हैं , लेकिन उम्र बढ़ने के साथ - साथ ये सेल्स नष्ट होने लगते हैं , जिससे नर्व्स भी कमजोर पड़ जाती हैं और हमारे सुनने की शक्ति कम होती जाती है। उम्र बढ़ने के अलावा और भी कई वजहें हैं , जिनसे ये सेल्स नष्ट होती जाती हैं। कुछ खास तरह की दवाओं और कुछ बीमारियों जैसे डायबीटीज और हॉर्मोंस के असंतुलन की वजह से भी कान के सुनने की क्षमता में कमी आ जाती है। इसके अलावा तेज आवाज भी इन सेल्स के लिए नुकसानदायक होती है। जब तक हमें यह पता चलता है कि हमें वाकई सुनने में कोई दिक्कत हो रही है , तब तक हमारे 30 फीसदी सेल्स नष्ट हो चुके होते हैं। एक बार नष्ट हुए सेल्स फिर ठीक नहीं होते। वे हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं।

सुनाई कम देने के लक्षण

सुनने की क्षमता में कमी आने के शुरुआती लक्षण बहुत साफ नहीं होते , लेकिन यहां ध्यान देने की बात यह है कि सुनने की क्षमता में आई कमी वक्त के साथ धीरे - धीरे और कम होती जाती है। ऐसे में जितना जल्दी हो सके , इसका इलाज करा लेना चाहिए। नीचे दिए गए लक्षण हैं तो डॉक्टर से जरूर मिलना चाहिए। 

- सामान्य बातचीत सुनने में दिक्कत होना , खासकर उस जगह जहां बैकग्राउंड में शोर है। 

- बातचीत में बार - बार लोगों से पूछना कि उन्होंने क्या कहा। 

- फोन पर सुनने में दिक्कत होना। 

- बाकी लोगों के मुकाबले ज्यादा तेज आवाज में टीवी या म्यूजिक सुनना। 

- नेचरल आवाजों को न सुन पाना मसलन , बारिश की आवाज और पक्षियों के चहचहाने की आवाज आदि। 

सुनने की क्षमता में कमी की वजह 
- सुनने की क्षमता में कमी पैदायशी हो सकती है। 

- कानों से पस बहना , इन्फेक्शन या कानों की हड्डी में कोई गड़बड़ी सुनने की क्षमता को कम कर सकती है। 

- कान के पर्दे का डैमेज हो जाना सुनने की क्षमता को प्रभावित करता है। 

- उम्र भी एक वजह है , जिसमें कान की नर्व्स कमजोर हो जाती हैं। 

इलाज 
- अगर छह महीने का बच्चा आवाज की तरफ रेस्पॉन्स नहीं देता तो उसे डॉक्टर को दिखाना चाहिए। हो सकता है उसे जन्मजात बहरेपन की शिकायत हो। ऐसे मामलों में डॉक्टर सर्जरी कराने की सलाह देते हैं। 

- इन्फेक्शन की वजह से सुनने की क्षमता में कमी आई है , तो इसे दवाओं से ठीक किया जा सकता है। 

- अगर पर्दा डैमेज हो गया है , तो सर्जरी करनी पड़ती है। कई बार पर्दा डैमेज होने का इलाज भी दवाओं से ही हो जाता है। 

- नर्व्स में आई किसी कमी की वजह से सुनने की क्षमता में कमी आई हो तो जो नुकसान नर्व्स का हो गया है , उसे किसी भी तरह वापस नहीं लाया जा सकता। ऐसे में एक ही तरीका है कि हियरिंग एड्स का इस्तेमाल किया जाए। हियरिंग एड्स दिक्कत को आगे बढ़ने से भी रोकता है और उस वक्त तो फायदा पहुंचाता ही है। ऐसी हालत में आप हियरिंग एड्स का यूज नहीं करते , तो कानों की नर्व्स पर स्ट्रेन बढ़ता है और समस्या बढ़ती जाती है। 

कान की मशीन 
अगर कान का पर्दा फट गया है और सुनाई नहीं देता , तो भी डॉक्टर हियरिंग एड्स यानी कान की मशीन लगा सकते हैं। इससे सुनाई देने लगता है , लेकिन आमतौर पर डॉक्टर ऐसा नहीं करते। डॉक्टर ऐसी स्थिति में सर्जरी कराने की ही सलाह देते हैं क्योंकि कान की मशीन लगाने से कान की समस्या जहां की तहां बनी रहती है , जबकि सर्जरी से उसे ठीक कर दिया जाता है। अगर कान से डिस्चार्ज हो रहा है तो किसी भी हालत में कान में मशीन लगाने की सलाह नहीं दी जाती। अलग - अलग तरह की कान की मशीनें आजकल बाजार में हैं। ये मोटे तौर पर दो तरह की हैं : 

एनालॉग : कान की इन मशीनों को काफी समय पहले यूज किया जाता था। अब इनका इस्तेमाल मोटे तौर पर बंद हो गया है। कंपनियां भी अब इन्हें नहीं बनातीं। एनालॉग मशीनों में वातावरण की आवाजें पूरी - की - पूरी अंदर कान में आ जाती हैं , जिससे सुनने वाले को असली आवाज सुनने में दिक्कत होती है। यानी गैरजरूरी साउंड को कंट्रोल करने की ताकत इनमें नहीं होती , इसीलिए अब इन्हें यूज नहीं किया जाता। 

डिजिटल : कान की इन मशीनों में खूबी यह होती है कि ये पूरी तरह प्रोग्राम्ड होती हैं और गैरजरूरी आवाज को कंट्रोल कर लेती हैं। बाहरी शोर भी कंट्रोल होता रहता है। मतलब इनकी मदद से आवाज ज्यादा साफ सुनाई देती है। इनसे संतुष्टि भी ज्यादा होती है। इनकी कीमत 10 हजार रुपये से शुरू होती है। जिस दिन डॉक्टर इन्हें लगाते हैं , उसके 10 दिन बाद मरीज को दोबारा बुलाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि अगर मशीन की प्रोग्रामिंग से मरीज को कोई दिक्कत महसूस हो रही हो तो डॉक्टर उसे ठीक कर देते हैं। 

जहां तक आकार की बात है तो कान की मशीनें चार तरह के मॉडल्स में हो सकती हैं । ये हैं : पॉकेट मॉडल , कान के पीछे लगाई जाने वाली , कान के अंदर लगाई जाने वाली और एक नई तरह की मशीन भी आ गई है , जिसे चश्मे के साथ लगाया जाता है। चारों तरह की मशीनें एनालॉग और डिजिटल दोनों कैटिगरी में उपलब्ध हैं। कान के अंदर लगाई जानेवाली मशीनें दिखाई नहीं देती , लेकिन लोगों को दिखने , न दिखने के चक्कर में नहीं फंसाना चाहिए। जब आंखों के लिए चश्मा का यूज कर सकते हैं तो कानों के लिए मशीन का इस्तेमाल करने में भी शर्म की कोई जरूरत नहीं है। 

कीमत : अच्छी क्वॉलिटी की डिजिटल मशीन ( सिंगल ) 15 से 20 हजार रुपये तक आ जाती है। वैसे , मार्केट में एक लाख रुपये तक की मशीनें मौजूद हैं। एनालॉग मशीन ( सिंगल ) की कीमत 3 से 10 हजार रुपये के बीच होती है। 

आईपॉड सुनते वक्त रखें ध्यान 
- आईपॉड या एमपी 3 प्लेयर को हेडफोन या ईयरबड्स की मदद से जरूरत से ज्यादा आवाज पर और लगातार लंबे वक्त तक सुनना कानों के सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। आजकल हियरिंग लॉस की यह एक बड़ी और महत्वपूर्ण वजह है। मेट्रो में म्यूजिक सुनने वाले यंगस्टर्स को मेट्रो के शोर के चलते आमतौर पर आवाज ज्यादा तेज रखनी पड़ती है। म्यूजिक सुनते वक्त हमारे कानों को होने वाला नुकसान इस बात पर तो निर्भर करता ही है कि हम कितनी तेज आवाज में म्यूजिक सुन रहे हैं , इस पर भी निर्भर करता है कि हम कितनी देर तक ऐसा कर रहे हैं। 

- म्यूजिक सुनते वक्त वॉल्यूम हमेशा मीडियम या लो लेवल पर ही रखें , लेकिन कई बार बाहर के शोर के चलते आवाज तेज करनी पड़ती है। तेज आवाज में सुनने से कानों को नुकसान हो सकता है इसलिए शोरगुल वाली जगहों के लिए शोर को खत्म करने वाले ईयरफोन का इस्तेमाल कर सकते हैं , लेकिन आवाज कम ही रखें। हालांकि ऐसे हेडफोन या ईयरफोन थोड़े महंगे हो सकते हैं। 

- कितनी आवाज कितनी देर तक सुनना ठीक है , इसके लिए 60/60 नियम फॉलो कर सकते हैं। इसमें आईपॉड को 60 मिनट के लिए उसके मैक्सिमम वॉल्यूम के 60 फीसदी पर सुनें और फिर ब्रेक लें। ब्रेक लेने से कानों को आराम मिल जाता है और कानों को नुकसान कम होता है। 

- आईपॉड को फुल वॉल्यूम पर रोजाना 5 मिनट से ज्यादा सुनना सही नहीं है और अगर 10 से 50 फीसदी तक वॉल्यूम पर सुन रहे हैं , तो सुनने की कोई लिमिट नहीं है। इसे आप कितनी भी देर सुन सकते हैं। उससे कानों को नुकसान नहीं होता। 

- म्यूजिक सुनने के लिए ईयरबड्स भी आती हैं और हेडफोंस भी। ईयरबड्स की बजाय हमेशा हेडफोन का इस्तेमाल करें। हेडफोन को चूंकि कान के ऊपर लगाया जाता है और ईयरबड्स को कान के अंदर , इसलिए हेडफोन , ईयरबड की तुलना में कान को कम नुकसान पहुंचाते हैं। ईयरबड्स हेडफोन के मुकाबले नौ डेसिबल ज्यादा आवाज देते हैं। अगर आप 60 डेसिबल के आसपास म्यूजिक सुन रहे हैं , तब तो यह कोई बड़ी बात नहीं है , लेकिन जैसे ही वॉल्यूम 70 या 80 डेसिबल पहुंचता है तो इस थोड़े से अंतर से ही कानों को काफी नुकसान हो सकता है। 

- कभी - कभी ऐसा मन हो सकता है कि आईपॉड को फुल वॉल्यूम पर सुना जाए , लेकिन ऐसा कभी न करें। पांच मिनट से ज्यादा फुल वॉल्यूम पर सुनने पर कान को नुकसान हो सकता है। 

- इसके अलावा ऐसे लोग जो काफी शोरगुल वाली जगह पर रहते हैं , उनकी हेयर सेल्स भी डैमेज हो सकती हैं। शॉर्ट टर्म में उनके सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। मसलन , अगर कोई एक घंटे के लिए किसी लाउडस्पीकर के पास खड़ा हो और उसके फौरन बाद उसका टेस्ट किया जाए तो सुनने की क्षमता में काफी कमी आ सकती है , लेकिन यही चीज अगर वह लगातार करता रहे , मतलब रोजाना एक घंटे के लिए ऐसा करे तो उसकी सुनने की क्षमता हमेशा के लिए जा सकती है। 

- इसी तरह जिन लोगों का काम ही ऐसा है , जिन्हें 7-8 घंटे तक फोन पर बात करनी पड़ती है , उन्हें भी कानों का रिस्क हो सकता है। इसमें आमतौर पर कॉल सेंटर आदि में काम करने वाले लोग आते हैं। ऐसे लोगों को भी रेग्युलर चेकअप कराते रहना चाहिए। 

- फैक्ट्री की आवाज या जेनरेटर की आवाज भी कानों के लिए नुकसानदायक हो सकती है। 
वॉल्यूम
प्रतिदिन सुनने का अधिकतम समय
50%
कोई सीमा नहीं
60%
18 घंटे
70%
साढ़े चार घंटे
80%
करीब डेढ़ घंटा
90%

करीब 18 मिनट
100%

करीब 5 मिनट

किसकी कितनी तेज आवाज
फुसफुसाने की आवाज
30 डीबी
सामान्य बातचीत 60
डीबी
वॉशिंग मशीन की आवाज
70 डीबी
कार का इंजन
70 डीबी
एमपी 3 ( अधिकतम आवाज )
105 डीबी
पटाखे की आवाज
150 डीबी

यहां बता दें कि जब भी डेसिबल में 10 की बढ़ोतरी होगी , आवाज में 10 गुना तेजी आ जाएगी। जैसे सामान्य बातचीत के मुकाबले कार का इंजन 10 गुना आवाज देता है। 

वैक्स है तो क्या करें 
स्वस्थ कान वैक्स पैदा करते हैं। वैक्स कानों के लिए एक तरह के सुरक्षा कवच का काम करती है। ऐसे में जब तक दर्द , चिड़चिड़ापन या कोई और दिक्कत न हो , तब तक वैक्स को लेकर कोई टेंशन नहीं लेनी चाहिए। दरअसल , वैक्स कान को बचाता है। बाहर की गंदगी को अंदर जाने से रोकता है। कान के बाल भी यही काम करते हैं। अगर कभी यही वैक्स ज्यादा बन रहा है तो वह धीरे - धीरे कान के अंदर जमा होने लगता है और कान की कैनाल को ब्लॉक कर देता है। इससे कान बंद हो जाता है और भारी - भारी लगने लगता है। कई बार सुनने में भी दिक्कत होने लगती है। ऐसे में सलाह यह है कि कान में कभी भी ईयरबड न डालें। इससे पर्दा डैमेज होने का खतरा होता है। ऐसे वैक्स को हटाने के लिए अपने ईएनटी विशेषज्ञ के पास जाएं और उनकी सलाह के मुताबिक काम करें। कान में तेल आदि न डालें। कई बार लोग ऐहतियातन आतनकान में तेल डाल लेते हैं , जो गलत है। हालांकि वयस्क लोग अगर कान के बाहरी हिस्से की सफाई निश्चित अंतराल पर खुद ही करते रहें , तो वैक्स जमा नहीं होगा क्योंकि वैक्स आमतौर पर कान के बाहरी हिस्से में ही पैदा होता है। 

कान के अंदर पानी चला जाना आम बात है , लेकिन अगर कभी ऐसा हो जाता है , तो पानी को जल्दी - से - जल्दी निकाल दें। इस काम में ईयरबड की मदद ले सकते हैं। पानी से कान को नुकसान हो सकता है। अगर पानी खुद नहीं निकाल पा रहे हैं , तो अपने डॉक्टर से मिलें। अगर कान की कोई समस्या है तो ज्यादा स्विमिंग करने से नुकसान हो सकता है। ऐसे में स्विमिंग से बचना ही अच्छा है। वैसे स्विमिंग करते वक्त कानों में ईयरप्लग लगाने चाहिए। इससे कानों को नुकसान पहुंचने की आशंका काफी कम हो जाती है। 

रेग्युलर चेकअप 
अगर आपकी उम्र 30 से 45 साल के बीच है और आपको लगता है कि आपकी सुनने की क्षमता ठीक है , तो दो साल में एक बार कानों का चेकअप करा लें। 50 साल की उम्र के आसपास कान की नसें कमजोर होने की शिकायत हो सकती है , इसलिए 50 साल की उम्र के बाद साल में एक बार कानों का चेकअप करा लें। चेकअप के लिए अगर आप ईएनटी विशेषज्ञ के पास जा रहे हैं तो वह आपके कान के पर्दे आदि की जांच करेगा , लेकिन कान की सेंसिटिविटी और उसके सुनने के टेस्ट के लिए ऑडियॉलजिस्ट के पास भी जा सकते हैं। वैसे बेहतर यही है कि कान की जांच के लिए ईएनटी विशेषज्ञ के पास ही जाएं। पूरी जांच के बाद अगर ईएनटी एक्सपर्ट को जरूरत महसूस होगी तो वह आपको ऑडियॉलजिस्ट के पास जाने को कह सकता है। 

एक्सर्पट्स पैनल 
डॉ . अरुण कुमार अग्रवाल , ईएनटी सर्जन , मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज 
डॉ . टी . के . मजूमदार , ईएनटी सर्जन , सुंदर लाल जैन हॉस्पिटल 
डॉ . मानसी माथुर , ऑडियॉलजिस्ट , एनएचसी हियरिंग केयर इंडिया
(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,3.7.11)

8 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा जी ये तो गंभीर बात है.

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  2. इतनी उपयोगी जानकारी देने के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद

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  3. हे भगवान!
    मैं रोज़ वाकिंग करते समय कान में एफ़ एम रेडियो ईयरफोन लगाकर सुनता हूं।
    लगता है आप सारे लेख मेरी स्वास्थ्य संबंधी लापरवाही के मद्देनज़र ही लिख रहे हैं।

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  4. बहुत ज्ञानवर्धक और अच्छा आलेख -शुक्रिया !

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  5. बहुत ही उपयोगी जानकारी,
    बधाई

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  6. सबके लिय उपयोगी जानकारी खासकर
    youngsters के लिये बहुत उपयोगी जानकारी है
    आभार आपका !

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  7. बहुत ज्ञानवर्धक और उपयोगी जानकारी देने के लिए आभार...

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