मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

युवा हो रहे हैं इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर के शिकार

इंटरनेट का ज्यादा उपयोग करने वालों में तेजी से इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर नामक बीमारी घर करती जा रही है। इंटरनेट का आवश्कता से अधिक उपयोग ही इस रोग का प्रमुख लक्षण है। इस रोग में रोगी सूचनाओं के जाल में कुछ इस तरह उलझ जाता है कि वह केवल इंटरनेट की दुनिया में खोया रहता है। वह अपने घर-परिवार, मित्रों, परिचितों सभी से कटकर साइबर समाज में पहुंच जाता है और यहां उसके संवाद के माध्यम होते हैं ऑनलाइन डिस्कशन, ई-चैटिंग, वॉयस मेल। ऐसा रोगी घंटों ऑनलाइन गेम्स खेलता है तथा पोर्नोग्राफी साइट्स भी देखता है। नेट के जरिए वह कैसिनो में दांव भी लगाता है। इस सब में वह पढ़ाई, खेलकूद और करियर को पूरी तरह भुला देता है और जीवन की मुख्य धारा से पूरी तरह कट जाता है। 

चिड़चिड़ेपन का शिकार रोगी : इंटरनेट एडिक्शन के कारण केवल रोगी की सामाजिकता ही नष्ट नहीं होती, अपितु धीरे-धीरे वह चिड़चिड़ा एवं अवसादत भी हो जाता है। वह भ्रम की स्थिति में जीने लगता है। ऐसे में उसके आसपास के लोग भी उसे सनकी समझने लगते हैं और धीरे-धीरे रोगी अकेलेपन का शिकार होने लगता है। 

शारीरिक रोगों की जकड़न: मानसिक रोगों के अतिरिक्त कई शारीरिक रोग भी इस एडिक्शन के कारण हो सकते हैं। चूंकि रोगी की शारीरिक गतिविधि लगभग न के बराबर होती है इसलिए वह जल्द ही मोटापे का शिकार हो जाता है। साथ ही घंटों कंप्यूटर स्क्रीन के आगे बैठने से उसकी आंखों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। घंटों कुर्सी पर बैठे रहने से व्यक्ति पीठ या कमर दर्द का शिकार भी हो सकता है।

सबसे ज्यादा प्रभावित युवा : इंटरनेट एडिक्शन डिसआर्डर से प्रभावित होने वाले लोगों में ज्यादा संख्या युवाओं की ही होती है, क्योंकि हमारे देश में यही तबका इंटरनेट का ज्यादा प्रयोग करता है। वैसे अब अवकाश प्राप्त बुजुर्ग भी इसकी चपेट में आने लगे हैं। 

भटक रहे युवा : विशेषज्ञ नरेश गुप्ता ने बताया कि ज्यादातर युवा इंटरनेट का प्रयोग अच्छे उद्देश्य के लिए शुरू करते हैं, परंतु उन्हें भटकने में ज्यादा समय नहीं लगता और जल्द ही वे पोर्नोग्राफी, सैक्स साइट्स, गैंबलिंग, अश्लील चैटिंग आदि के चंगुल में फंस जाते हैं। व्यापार, विकास, करियर, सूचना, पढ़ाई आदि के उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाते हैं।

45 फीसदी परीक्षाओं में फिसड्डी : एक सर्वेक्षण के अनुसार इंटरनेट का ज्यादा प्रयोग करने वाले लगभग 45 प्रतिशत बच्चे अपनी परीक्षाओं में फेल होते हैं, तो शेष अपने खराब रिजल्ट से जूझते हैं। देश में इंटरनेट एडिक्शन डिसआर्डर के रोगियों की संख्या पश्चिमी देशों की तुलना में कम है, परंतु जैसे-जैसे हमारे समाज में इंटरनेट का प्रयोग बढ़ेगा वैसे-वैसे इन रोगियों की संख्या में भी इजाफा होगा। अत: इसके बचाव के प्रयास अभी से शुरू करने होंगे। 

पता नहीं होता मर्ज : नरेश गुप्ता ने बताया कि इस एडिक्शन की गिरफ्त में फंसे लोगों को अकसर यह पता नहीं चलता कि वे बीमार हैं। यदि कोई व्यक्ति हमेशा इंटरनेट के प्रयोग के बारे में सोचता रहता है और घंटों कंप्यूटर पर वेबसाइट्स ढूंढता है, जिसमें उसे समय का भी ध्यान नहीं रहता तो यकीनन वह इंटरनेट एडिक्शन डिसआर्डर से पीडि़त है(राजेश मलकानियां, दैनिक जागरण,पंचकूला,26.4.11)।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही चेतावनीपूर्ण आलेख है राधारमण जी । स्थिति दिनों दिन चिंताजनक होती जा रही है इसमें कोई संदेह नहीं ..

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  2. युवा ही नहीं , बड़े भी हो रहे हैं शिकार । विशेषकर ब्लोगर्स ।

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