शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

बच्चे की मिरगी

बच्चे को मिरगी का दौरा पड़ने के साथ ही सारा घर डिस्टर्ब हो जाता है। बच्चे के दिमाग के 'इलेक्ट्रिक सर्किट सिस्टम' में कुछ समय के लिए व्यवधान उत्पन्न हो जाता है जिससे मिरगी का दौरा पड़ता है। कई बार बच्चा दौरे के दौरान बेहोश भी हो जाता है। मिरगी ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज को बार-बार दौरा आता है। अभी तक ४० प्रकार के मिरगी के दौरे चिकित्सा शास्त्रों में दर्ज हैं।

क्या होते हैं लक्षण
चूँकि मिरगी दिमाग के किसी भी हिस्से पर असर कर सकती है इसलिए लक्षण भी भिन्ना तरह के होते हैं। आमतौर पर बच्चों में इसकी शुरुआत असामान्य एवं चिड़चिड़े व्यवहार से होती है। एकाएक दिमाग के प्रभावित हिस्से की मांसपेशियाँ सिकुड़ जाती हैं जिससे बच्चे के फेफड़ों से हवा तेजी से निकल जाती है। शरीर ऐंठने लगता है तथा अपने आप ही झटके खाने लगता है। कभी बच्चा कराहता है और बेहोश होकर जमीन पर गिर जाता है। उसकी साँसें अनियमित हो जाती हैं, वह पीला हो जाता है तथा बेखयाली में खुद की जबान भी काट लेता है। यह दौरा कुछ ही मिनटों का होता है तथा मरीज उनींदा होकर गफलत में आ जाता है। थोड़ी देर बाद सो जाता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि हर दौरा अलग होता है। बेहोश होने से पहले बच्चा कुछ पलों के लिए सबसे जुदा हो जाता है। वह इन क्षणों में सबकी ओर देखता है और देखने वाले को ऐसा लगता है कि वह कोई दिवास्वप्न देख रहा हो।

क्या है कारण
*मिरगी का दौरा जन्म लेने के बाद किसी भी उम्र में पड़ सकता है। स्कूल जाने वाली उम्र के हर २०० में से एक बच्चे को मिरगी का दौरा पड़ता है। इनमें से १० प्रतिशत को गंभीर दौरे पड़ते हैं। ६० प्रतिशत मामलों में कोई प्रत्यक्ष कारण सामने नहीं आता।
*माता को गर्भावस्था में हुए दिमागी संक्रमण।
*दिमाग में रक्तस्राव।
*दिमाग में कोई गठान।
*निम्न रक्तचाप, दिमागी बुखार।
*दिमाग में किसी वजह से सूजन।
*विषैले पदार्थ का दिमाग में पहुँचना।
*आनुवांशिक कारण।
*अधिकांश मिरगी के दौरे एकाएक पड़ते हैं लेकिन संभावित रूप से तनाव एक ट्रिगर हो सकता है। मिरगी के रोगी अक्सर तेज गति से जलती-बुझती रोशनी के प्रति संवेदनशील होते हैं।

कैसे होती है जाँच
मिरगी के रोग का निदान हमेशा मुश्किल होता है, क्योंकि किसी एक टेस्ट से इसे सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। ईईजी, ब्रेन स्कैन तथा रक्त परीक्षण आदि टेस्ट भी किए जाते हैं।

उपचार
मिरगी के दौरे के दौरान बच्चे को सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है। बच्चे के कपड़े खोल दें। उसे आसानी से साँस लेने दें। ध्यान रखें कि वे अपने आपको नुकसान न पहुँचा सकें। खुद की जबान न काट सकें, इसके लिए उनके मुँह में कुछ रख दें। उनके साथ जबर्दस्ती न करें। मिरगी का इलाज आमतौर पर एंटीकन्वल्जन ड्रग या ब्रेन सर्जरी से किया जाता है। ब्रेन सर्जरी सभी मामलों में नहीं की जा सकती।

क्या है जोखिम
कुछ बच्चों को मरगी का दौरा बचपन में ही पड़ता है,लेकिन बाद में वे ठीक हो जाते हैं। कुछ बच्चे वयस्क होकर भी मिरगी से प्रभावित रहते हैं। कुछ बच्चे कभी भी मिरगी के दौरे के प्रभाव से नहीं निकल पाते। इसकी वजह से उनकी तथा उनके परिवारजनों
की ज़िंदगी प्रभावित हो जाती है।

परिवार को बच्चे की मिरगी के दौरे पड़ने के कारण कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इनसे निपटने की टिप्स-
 
*जिन बच्चों को मिरगी के दौरे आना शुरू हो गए हों उनके बिस्तरों पर पैडेड साइड रेल्स लगाना ठीक होता है।
*बच्चे को परिवार के साथ यदि बाहर ले जाने का अवसर आए तो उसका समुचित इंतजाम होना चाहिए। मसलन कार के सीट बैल्ट्स लगे हों। बाइक या किसी दोपहिया वाहन पर ले जाएँ तो हेलमेट पहनाना न भूलें।
*यदि पिकनिक पर साथ ले जा रहे हों तो याद रहे कि वह तालाब या नदी में अकेले तैरने न निकले। उसे नज़र की जद में रखें।
*बच्चे के स्कूल में स्पोर्ट्स टीचर सहित सभी को बता दें कि बच्चे को मिरगी के दौरे आते हैं और उसे यदि दौरा पड़ जाए तो कैसे संभालना है।
*बच्चे को स्कूल में दवाएं साथ ले जाने दें। ज़रूरत समझें तो दवाओं की कुछ खुराक स्कूल में भी रखवा दें।
*बच्चे को गले में पहचान-पत्र लटका दें। साथ ही,एक नोट भी लगा दें कि बच्चे को क्या बीमारी है।
(डॉ. विक्रम राठौर, सेहत,नई दुनिया,फरवरी द्वितीयांक,2011)

1 टिप्पणी:

  1. मेरे एक रिश्तेदार का लड़का बचपन से कभी कभी दिवास्वप्न की अवस्था मे एक दो मिनट के लिए आ जाता था। पानी वानी पिलाने पर ठीक हो जाता था। पता चला है कि उसे पहली बार तेज़ दौरा पड़ा है। क्या यह पूरी तरह क्योरेबल नहीं होता?

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